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जब नेहरु ने फ़िराक से पूछा, अभी भी नाराज़ हो

 Sabahat Vijeta |  2016-08-29 12:16:14.0

firaq

वसीम अकरम त्यागी

आज फ़िराक़ का जन्म दिन है नई नस्लें फ़िराक़ से अनजान भी हो सकती हैं। फ़िराक़ को जानने के लिये बस इतना जरूरी है कि एक बार उन्होंने चैंबर ऑफ कामर्स की बैठक में कहा था "मैं तुम्हें उर्दू पढने के लिये इसलिये कहता हूं ताकि अफसर बनने के बाद तुम अफसर नजर भी आओ" फ़िराक़ को उर्दू का आशिक कह दिया जाये तो कोई अतिश्योक्ती नहीं होगी।


1948 में जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार इलाहाबाद आए तो उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी साहब को मिलने के लिए आनंद भवन बुलवाया। फ़िराक़ पहुँचे तो वहाँ बैठी रिसेप्शनिस्ट ने उनसे कहा कि आप कुर्सी पर बैठें और अपना नाम पर्ची पर लिख दें। फ़िराक़ ने पर्ची पर लिखा रघुपति सहाए। रिसेप्शनिस्ट ने दूसरी स्लिप पर आर. सहाए लिख कर उसे अंदर भिजवा दिया। पंद्रह मिनट इंतज़ार करने के बाद फ़िराक़ के सब्र का बाँध टूट गया और वो रिसेप्शेनिस्ट पर चिल्लाए- "मैं यहाँ जवाहरलाल के निमंत्रण पर आया हूँ, आज तक मुझे इस घर में रुकने से नहीं रोका गया है। जब नेहरू को फुर्सत मिले तो उन्हें बता दीजिएगा... मैं 8/4 बैंक रोड पर रहता हूँ।"


फ़िराक अमूमन तेज ही बोलते थे शायद इसीलिए अंदर से नेहरू जी ने उनकी आवाज़ पहचान ली। वो बाहर आ कर बोले, रघुपति तुम यहाँ क्यों खड़े हो? फ़िराक़ ने कहा- घंटों पहले मेरे नाम की स्लिप आपके पास भेजी गई थी। नेहरू ने कहा, पिछले तीस सालों से मैं तुम्हें रघुपति के नाम से जानता हूँ, ये आज आर.सहाए से मैं कैसे समझता कि ये तुम हो?


अंदर आकर फ़िराक़ बिल्कुल चुप थे तो नेहरू ने पूछा, तुम अभी भी नाराज़ हो?


फ़िराक़ थोड़ा मुस्कराए और शेर से जवाब दिया-


"तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो
तुमको देखें कि तुम से बात करें"


ऐसे थे फ़िराक़ जिससे प्रधानमंत्री ने खुद मालूम किया कहीं वो नाराज तो नहीं है। प्रधानमंत्री का दोस्त होने के बावजूद भी फ़िराक़ उस परंपरा को नहीं तोड़ पाये जिसमें साहित्यकारों को हाशिये पर डाल दिया जाता है। हम भारतीय पश्चिम की ओर तो भागते हैं मगर हमारे हुक्मरां साहित्यकारों का वैसा सम्मान नहीं करते जैसा पश्चिम में किया जाता है। फ़िराक़ के इस दुनिया से चले जाने के बाद नगर निगम ने उनका 8/4 वाला एड्रेस भी खत्म कर दिया और उनका सामान निकालकर बाहर सड़क पर फेंक दिया। उर्दू अदब के पाठयक्रम में फ़िराक़ तो पढाया जाता है मगर सरकार की उस बैगैरती पर कोई रौशनी नहीं डालता जिसने एक शायर/साहित्यकार की कोई निशानी तक नहीं छोड़ी। इसे साहित्यकारो की बदकिस्मती कहें या फिर सियासतदाओं की बेशर्मी कि जिनकी किताबें पढकर वे बात करने का सलीका सीखते हैं कुर्सी पाते ही उन 'अदीबों' का जरा भी ख्याल नहीं करते जिन्होंने उन्हें बात करने लायक बनाया। कैसी विडंबना है कि हमारे हुक्मरानों कालीदास मार्ग तो याद रहता है मगर कालीदास के वारिसों को बेगौर ओ फिक्र छोड़ दिया जाता है। विडंबना देखिये मरने के बाद वे फ़िराक़ भी उस उपेक्षा का शिकार हो गये जो कहकर गये थे कि -


आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम असरो
जब भी उनको ये ध्यान आयेगा तुमने फ़िराक़ को देखा है।

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