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यूपी चुनाव: सपा में बनते नए समीकरण

 Girish Tiwari |  2016-09-30 07:55:30.0

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कृष्णमोहन झा




उत्तरप्रदेश में पिछले साढ़े चार साल से सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने आखिरकार अपने मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव को अपने और फैसलों को शिरोधार्य करने के लिए विवश कर ही लिया। अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी है कि वे नेताजी अर्थात पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के उन सभी आदेशों का पूरा सम्मान करेंगे जिनका संबंध पार्टी, संगठन अथवा सरकार से हो। पिता की इच्छा का समाधान करते हुए अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव के सारे मंत्रालय उन्हें वापिस कर दिए है एवं अपने मंत्रिमंडल से विगत दिनों हटाए मंत्रियों को भी वापिस अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अब पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के उस फैसले से भी कोई गुरेज नहीं है जिसके तहत पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का पद उनसे छीनकर उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव को सौंप दिया गया था। पार्टी सुप्रीमो के इस फैसले से नाराज होकर अखिलेश यादव ने यहां तक कह दिया था कि अध्यक्ष पद भले ही उनके पास न हो परन्तु आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में पार्टी के उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने का अधिकार तो वे अपने पास ही सुरक्षित रखेंगे।

परन्तु अब वे ऐसा कोई बयान देने से परहेज कर रहे हैं जिन्हें पार्टी में प्रदेशाध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव के वर्चस्व को चुनौती के रूप में माना जा सके लेकिन अखिलेश यादव के समर्थक अभी भी पूरी तरह पार्टी में अपने सुरक्षित भविष्य के प्रति निश्चित नहीं हो पा रहे हैं। गौरतलब है कि सपा के प्रदेशाध्यक्ष शिवपाल यादव ने विगत दिनों अखिलेश यादव के समर्थक आधा दर्जन प्रमुख युवा नेताओं को पार्टी से बाहर का दरवाजा दिखाकर उन्हें यह संदेश दे दिया था कि पार्टी के नए प्रदेशाध्यक्ष के वर्चस्व को चुनौती देना हंसी खेल नहीं है और जो भी नेता या कार्यकर्ता ऐसी जुर्रत करेगा.

उसे अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा भले ही वह मुख्यमंत्री का कितना भी करीबी क्यों न हो। अखिलेश यादव अब जिस तरह समझौते के लिए तैयार हो चुके है उससे यही साबित होता है कि उनके पास बचाव की मुद्रा अपनाने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है। पार्टी में ताजा संकट के बाद अभी हाल में पार्टी सुप्रीमो मुलायमसिंह यादव ने अपने पुराने सहयोगी अमरसिंह को फिर से पार्टी में शामिल करके अखिलेश यादव और उपके समर्थकों को एक और तगड़ा झटका दे दिया है।

अमर सिंह को 6 सालों के बाद पुन: समाजवादी पार्टी के महासचिव पद की बागडोर सौंपकर मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव की ताकत में भी इजाफा कर दिया है। गौरतलब है कि अमरसिंह को शिवपाल यादव का करीबी माना जाता रहा है। अमरसिंह की समाजवादी पार्टी में ससम्मान वापिसी आजम खान और रामगोपाल यादव जैसे नेताओं को रास नहीं आ रही है लेकिन वे इसलिए मन मसोसकर रह गए हैं क्योंकि अमरसिंह को समाजवादी पार्टी के महासचिव पद की कुर्सी सौंपने का फैसला पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने किया है।

अमरसिंह अब पार्टी में कितनी ताकतवार हस्ती बन गए है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव ने स्वयं अपने हाथों से उनकी नियुक्ति का आदेश लिखा। अमर सिंह इतने गदगद हैं और अखिलेश यादव को वे राजनीति में बच्चा बताने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। यहां यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब पार्टी के अंदर मतभेदों के लिए ‘एक बाहरी व्यक्ति’ को जिम्मेदार ठहराया था तब उनका इशारा अमरसिंह यादव की ओर ही था। अखिलेश यादव सचमुच में हैरान है कि चुनाव नजदीक आते आते पार्टी में ऐसे परिवर्तन किए जा रहे हैं जिनसे उन्हें हाशिए पर भेजे जाने का संकेत मिल रहा है।

अब वे अपना विरोध दर्ज कराने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। वे यह बात भलीभांति समझ चुके है कि शिवपाल यादव और अमर सिंह मिलकर उनके कद को और घटाने के लिए संगठन में और बदलाव कर सकते है। अब यह उत्सुकता का विषय है कि अगले साल होने जा रहे राज्य विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी उम्मदीवारों के चयन में अखिलेश यादव की कितनी प्रभावी भूमिका रहती है। अखिलेश यादव निश्चित रूप से यही चाहेंगे कि पार्टी के उम्मीदवारों का चयन उनकी मर्जी से ही किया जाए परन्तु सपा के प्रदेशाध्यक्ष क्या ऐसा होने देंगे। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते शिवपाल यादव टिकिट बंटवारे में अखिलेश यादव का हस्तक्षेप स्वीकार कर लेंगे इसमें संदेह ही है।

अखिलेश यादव से पिछले दिनों मिली चुनौती के बाद वे अब अतिरिक्त सतर्कता दिखाएंगे और पार्टी की टिकिट उन्हीं लोगों को देना पसंद करेंगे जिनकी निष्ठा मुख्यमंत्री के प्रति न होकर प्रदेशाध्यक्ष के प्रति हो। इस तरह यह आशंका तो अभी भी बरकरार है कि राज्य में आगामी चुनावों के वक्त एक बार चाचा और भतीजे के बीच नए सिरे से मतभेद उभरकार सामने आएं।

विगत तीन दशकों से राज्य में भले ही किसी भी पार्टी को लगातार दो कार्यकालों तक सत्ता में रहने का मौका न मिला हो परंतु मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अभी भी यह उम्मीद है कि उनकी सरकार द्वारा कराए गए कार्यों को देखते हुए जनता एक बार फिर समाजवादी पार्टी को सत्ता की बागडोर सौंपने का मन बना सकती है इसीलिए वे अपने समर्थकों को ही बड़ी संख्या में पार्टी टिकिट दिलवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देंगे। अखिलेश यादव जैसी उम्मीद शायद शिवपाल यादव ने भी पाल रखी है इसलिए वे अपने समर्थकों को पार्टी टिकिट दिलाने के लिए कोर कसर बाकी नहीं रखेंगे।

मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष भले ही कितनी उम्मीदे पाल रखी हों परन्तु राजनीतिक प्रेक्षकों का अनुमान इसके उलट है। यह लगभग तय हो चुका है कि उत्तरप्रदेश में कानून व्यवस्था की दयनीय हालत और अपराधों का बढ़ता ग्राफ चुनावों में अखिलेश सरकार के प्रति जनता के आक्रोश का कारण बनेगा। अखिलेश यादव भले ही अभी प्रदेशाध्यक्ष पद की कुर्सी छीने जाने से नाराज हों परंतु चुनावों में पार्टी की पराजय के लिए उनके पास यह बहाना तो अवश्य रहेगा कि अध्यक्ष की कुर्सी भी उनके पास होती तो पार्टी को सत्ता के बाहर का दरवाजा नहीं देखना पड़ता।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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