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राज्यपाल ने नेता विरोध दल की मान्यता के सम्बन्ध में भेजा संदेश

 shabahat |  2017-03-28 11:44:00.0

राज्यपाल ने नेता विरोध दल की मान्यता के सम्बन्ध में भेजा संदेश

लखनऊ. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नेता विरोधी दल के रूप में राम गोविन्द चौधरी को मान्यता दिये जाने के संबंध में 'भारत का संविधान' के अनुच्छेद 175(2) अतंर्गत नवगठित विधान सभा के विचारार्थ संदेश भेजा है. राजभवन द्वारा भेजे गये संदेश में कहा गया है कि नवगठित विधान सभा, निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा 16वीं विधान सभा के अंतिम कार्यदिवस दिनांक 27 मार्च, 2017 को नवगठित 17वीं विधान सभा के लिए राम गोविन्द चौधरी, सदस्य विधान सभा एवं नेता समाजवादी पार्टी, विधान मंडल दल को दिनांक 27 मार्च, 2017 से नेता विरोधी दल के रूप में अभिज्ञात करने हेतु लिए गए निर्णय/अधिसूचना दिनांक 27 मार्च, 2017 के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक औचित्य (democratic and constitutional propriety) के प्रश्न पर विचार करे."

ज्ञातव्य है कि विधान सभा सचिवालय उत्तर प्रदेश (संसदीय अनुभाग) द्वारा कल दिनांक 27 मार्च, 2017 को अधिसूचना जारी की गयी थी कि नवगठित 17वीं विधान सभा के लिये राम गोविन्द चौधरी को नेता विरोधी दल के रूप में अभिज्ञात किया गया है.

राजभवन की ओर से भेजे गये पत्र में कहा गया है कि विधान सभा के सामान्य निर्वाचन के फलस्वरूप नवगठित विधान सभा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा ही नवगठित विधान सभा में नेता विपक्ष को अभिज्ञात करने की हमेशा परम्परा रही है. नेता विरोधी दल को अभिज्ञात करने का कदाचित कोई अन्य उदाहरण देश के किसी राज्य में उपलब्ध नहीं है जब किसी विधान सभा के कार्यकाल के अंतिम दिवस पर विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नवगठित अथवा आने वाली नई विधान सभा, जिसका कि विधान सभा अध्यक्ष सदस्य भी निर्वाचित नहीं हो सका हो, अगले पाॅंच वर्ष के लिए नेता विपक्ष को अभिज्ञात किया गया हो.

पत्र में यह भी कहा गया है कि दीर्घ समय से देश के समस्त राज्यों की विधान सभाओं में नेता विपक्ष के चयन/अभिज्ञान के संबंध में चली आ रही स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का अनुपालन उत्तर प्रदेश की नवगठित 17वीं विधान सभा के नेता विपक्ष के चयन अथवा अभिज्ञान के प्रकरण में क्यों नहीं किया गया, यह उत्तर प्रदेश विधान सभा सचिवालय द्वारा निर्गत उपरोक्त अधिसूचना दिनांक 27 मार्च, 2017 से स्पष्ट नहीं होता है. विधान सभा में नेता विरोधी दल को अभिज्ञात करना अथवा नहीं करना विधान सभा अध्यक्ष का विवेकाधिकार है न कि संवैधानिक बाध्यता. राजभवन की ओर से भेजे गये पत्र में यह भी कहा गया है कि 27 मार्च को जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट नहीं है कि नेता विपक्ष के चयन का मामला यदि नवगठित विधान सभा के नये अध्यक्ष पर छोड़ा गया होता तो किस प्रकार की संवैधानिक शून्यता अथवा संकट (constitutional void or crisis) अथवा असंवैधानिकता (unconstitutionality) उत्पन्न होने की संभावना थी.

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