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न्याय तक महिलाओं की पहुँच अभी भी दूर: आली

 2017-03-08 15:44:25.0

न्याय तक महिलाओं की पहुँच अभी भी दूर: आली

तहलका न्यूज़ ब्यूरो
लखनऊ: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, एसोसिएशन फॉरएडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स (आली) संस्था, लखनऊ द्वारा प्रेस क्लब में, महिला हिंसा के खिलाफ़ तथा महिला मानवाधिकारों की उपलब्धि की ओर काम करने वाली संस्थाओं व पत्रकारों के साथ सम्मलेन/संगोष्ठी का आयोजन किया गया था | आकड़े बताते हैं की शिकायतें बढ़ी हैं, मगर आली द्वारा उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में किए गए शोध से यह निकल कर आया कि महिलाओं की न्याय तक पहुँच अभी भी दूर है | राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन०सी०आर०बी०) के 2015 के आकडे यह बताते हैं कि, धारा 376 भारतीय दण्ड संहिता (भा०दं०सं०) के अंतर्गत कुल 34,651 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं और महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा के 35,527 मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश जिले में दर्ज हैं, जो कि संबंधित अपराधों का 10.9 प्रतिशत है | हाल ही के राष्ट्रिय विधिक आकड़ों के अनुसार "उत्तर प्रदेश राज्य के न्यायालयों में देश के सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं"| जुलाई 2016 तक लगभग 40 लाख फौजदारी मामले न्यायालयों में लंबित हैं | उत्तर प्रदेश में लगभग 2,500 से ज्यादा मामले प्रति न्यायाधीश के समक्ष लंबित हैं |

इस बैठक का मुख्य उद्देश्य है, राज्य के न्याय तंत्र की वास्तविक स्थिति को उजागर करना, ताकि महिलाओं से सम्बंधित कानूनों के क्रियान्वयन पर सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करायी जा सके | चर्चा के दौरान आली द्वारा पत्रकारों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ यौनिक हिंसा के प्रति चुप्पी तोड़ने में उनकी भूमिका के बारे में भी बात चीत हुई, जिससे कि न्याय की उम्मीद करती यौनिक हिंसा से पीड़िता/संघर्षशील महिलाओं को सहायता प्रदान की जा सके |

वर्ष 2016 में आली द्वारा उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में, यौनिक हिंसा के मामलों में न्याय प्रणाली की कमियों को चिन्हित करने के लिए एक शोध किया गया | शोध के अवलोकन के दौरान आली के सामने काफी चौका देने वाले परिणाम सामने आए, जिसमे यह निकल कर आया कि, यौनिक हिंसा से पीड़िता/संघर्षशील महिला को मामले की शिकायत दर्ज कराने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है | लगभग 79 प्रतिशत मामले एसे हैं, जिनकी रिपोर्ट घटना के दिन दर्ज नहीं की गयी थी, जबकि सिर्फ 21 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में घटना के दिन रिपोर्ट दर्ज हुए थे, यही बालकों का यौनिक हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2012 (पोक्सो) के मामलों में सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों की शिकायत घटना के दिन ही दर्ज की गयी थी | वर्ष 1983 से कानूनी प्रावधानों के अनुसार यौनिक हिंसा के मामलों का विचारण "इन कैमरा" होना चाहिए, जिसका मतलब यह है कि मामले से सम्बन्धित व्यक्ति के अलावा कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय कक्ष में मौजूद नहीं होगा, शोध के दौरान सबसे चौंकाने वाली जानकारी यह थी कि उत्तर प्रदेश राज्य में "इन कैमरा" परीक्षण नहीं होता है |

शोध के परिणामों के अनुसार, यह देखा गया की 50 प्रतिशत मामलें मे पीड़िता/संघर्षशील महिला का बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के 10 दिन बाद तक दर्ज हुआ है | जबकि सर्वोच्च न्यायलय द्वारा नोंअविनाकेरे पुलिस, र्नाटका सरकार बनाम शिवन्ना@तरकारी शिवन्ना में दी गयी गाइडलाइन के अनुसार यौनिक हिंसा की पीड़िता/संघर्षशील महिला का बयान 24 घंटे के अन्दर दर्ज हो जाना चाहिए | आली के लगभग 2 दशको के अनुभव में बयान दर्ज कराने में विलम्ब से पीड़िता/संघर्षशील महिला को और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है क्योंकि इस दौरान विलम्ब होने से विपक्षी/अभियुक्त, समाज/समुदाय एवं परिवार द्वारा शिकायत वापस लेने या बदनामी के डर से शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जाता है |

तकरीबन 84 प्रतिशत यौनिक हिंसा के मामलों में चिकित्सीय जांच के दौरान "टू फिंगर टेस्ट" किया जाता है जिसमे की 5 साल तक के बच्चे भी शामिल है | जबकी इस टेस्ट की निंदा सर्वोच्च न्यायलय ने भी कई बार की है क्योंकि यह टेस्ट व्यक्ति की निजता एवं गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकारों का उल्लंघन करता है | वर्ष 2014 में लागू क गयी नयी मेडिकल दिशानिर्देशों के अनुसार कुछ मानक तय किये गए जो कि पूरे देश में लागू किया गया है| पहली बार चिकित्सीय सेवा में 'बलात्कार को साबित करने' के बजाय चिकित्सा व देखभाल की दृष्टि से देखा गया है|

यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना जरुरी है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में, फॉरेंसिक जांच की रिपोर्ट को एक एहम दर्जा दिया गया है, लेकिन कभी भी इसे अभिलेख के रूप नहीं रखा गया है जो कि साक्ष्य एकत्रित करने में एक कमी है | शोध के दौरान विश्लेषण में केवल कुछ केसों में आली ने पाया कि फॉरेंसिक जांच की रिपोर्ट न्यायालय के सक्षम प्रस्तुत की गयी |
महज अपराधी को दंड के अलावा, पीड़िता/संघर्षशील महिला को काउंसलिंग की जरूरत होती है | उत्तर प्रदेश में अस्पतालों, पुलिस थाना व न्यायालय, या किसी सरकारी संस्था में मानसिक स्वास्थ्य से सम्बंधित कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है | न्याय से तात्पर्य, यौनिक हिंसा की पीड़िता/संघर्षशील महिला के दोषियों को सिर्फ सजा दिलाना नहीं बल्कि बुरे अनुभव से बाहर निकल कर ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की क्षमता पर ध्यान देना है |

यौनिक हिंसा पीड़ित/संघर्षशील महिला एवं बच्चों के आसान पुनर्वसन हेतु उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पीड़ित मुआवज़ा योजना भी निकली गयी है | लेकिन मुआवजा देना अभी भी प्रारंभिक चरण में है, यौनिक हिंसा की पीड़िता/संघर्षशील महिलाओं एवं बच्चों को गरिमापूर्ण एवं हिंसामुक्त जीवन प्रदान करने में सरकार अभी भी असफल है | पीड़ित मुआवज़ा योजना की ज़िम्मेदारी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को सौपी गयी है, मुआवज़ा हेतु तहरीर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के दफ्तर में दी जा सकती है |

पैनालिस्ट रेनू मिश्रा कार्यकारी निदेशक आली ने कहा की "पीड़िता/संघर्षशील महिलाओं को घटना की शिकायत करने के लिए काफी हिम्मत जुटानी पड़ती है मगर कानूनी चुनौतियाँ उन्हें हताश करती हैं जिससे न्याय मिलने में भी देरी होती है" । वहीँ ताहिरा हसन महासचिव, ऑल इंडिया प्रोग्रेस्सिव वीमेन एसोसिएशन (ऐपवा) ने कहा कि "पुलिस विभाग और न्याय प्रणाली को यौनिक हिंसा की पीड़िता/संघर्षशील महिलाओं के प्रति सम्वेदनशील होने की आवश्यकता हैं। हितभागियों द्वारा पक्षपातपूर्ण नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष दृष्टिकोण होने की ज़रूरत है |"

एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनीशिएटिव्स् (आली) एक नारीवादी कानूनी पैरोकारी एंव संदर्भ केन्द्र है। जो वर्ष 1998 से महिला मानवाधिकारो की स्थापना के लिए तकनीकि समर्थन एवं कानूनी सदर्भ केन्द्र के रूप में अधिकार आधारित समझ एंव नारीवादी परिपेक्ष्य के साथ कार्य करती रही है। आली अपनी स्थापना के समय से ही महिलाओ तथा बच्चो के साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ उत्तर प्रदेश, झारखण्ड व अन्य राज्यो में साथी संस्थाओं के सहयोग से काम करती आ रही है तथा उनसे सम्बन्धित कानूनो के प्रति जागरूकता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सक्रिय प्रयास करती रही है।

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