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शिक्षा में व्यावहारिक शिक्षा का बड़ा महत्व : पटनायक

 Utkarsh Sinha |  2017-03-07 14:32:42.0

शिक्षा में व्यावहारिक शिक्षा का बड़ा महत्व : पटनायक

तहलका न्यूज ब्यूरो

लखनऊ. परम्परा और आधुनिकता के मध्य सेतु के रूप में समसामयिक तत्त्व होता है जैसे विवाह संस्कार के अन्तर्गत जयमाल परम्परागत रूप से प्राप्त नहीं होता परन्तु आधुनिक समाज में जयमाल ही विवाह संस्कार के सम्पन्न होने का प्रतीक हो गया है. इसी क्रम में शास्त्रों में कहे गए शान्तिपाठ को भी आधुनिकता का प्रमाण बताया जिसकी पुष्टि ब्रिटिश विद्वान श्री टिन मार्टिन के द्वारा की गयी जिसमें कहा गया है कि हमें अपने और अपने आस-पास स्थित वातावरण के लिए सदैव विचार करना चाहिये और उनको उन्नत करने के लिए प्रयास करना चाहिए, जैसा कि शान्तिपाठ में कहा गया है.
यह विचार यूपी वेतन समिति के अध्यक्ष जी बी पटनायक ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानं के लखनऊ परिसर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किये. संगोष्ठी का विषय "परम्परा और आधुनिकता : समाज और साहित्य के सन्दर्भ में" था.

पटनायक ने संस्कृत भाषा को निरपेक्ष बताते हुए उसके अन्तर्गत योग, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, खगोल आदि विषयों के वैज्ञानिक प्रसार पर बल दिया. उन्होंने संस्कृतभाषा को आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (A. I.) का सशक्त माध्यम बताया जिसकी खोज में आधुनिक वैज्ञानिक संस्कृत भाषा के व्याकरण को अत्यन्त उपयोगी मान रहे हैं.

मंगलवार को राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के गोमतीनगर, लखनऊ परिसर में इस द्विदिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी के सम्पूर्ति-सत्र का आयोजन हुआ. कार्यक्रम का आरम्भ माँ सरस्वती के प्रति वैदिक तथा लौकिक मंगलाचरण के साथ हुआ, उसके बाद संस्थान के आधुनिक विभाग के संकायाध्यक्ष प्रो० शिशिर कुमार पाण्डेय ने द्विदिवसीय कार्यक्रम की विवेचना प्रस्तुत करते हुए सभी का कार्यक्रम में स्वागत किया तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गोपबन्धु पटनायक को सन्दर्भित करतेहुए कहा कि शिक्षा के क्रम में व्यवहारिक शिक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और मुख्यातिथि में इस ज्ञान को छात्रों में स्थानान्तरित करने की कुशलता है.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो० सुरेन्द्र पाठक ने आधुनिकता और परंपरा के कई प्रसंगों का उल्लेख किया. इस अवसर पर श्री पटनायक ने वैदिक और प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को अंगवस्त्र और उपहार देकर सम्मानित किया. कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन डॉ एस पी सिंह तथा सञ्चालन डॉ कविता बिसारिया के द्वारा किया गया. सम्पूर्ति-सत्र में प्रो० उमारमण झा(पूर्वप्राचार्य-रा०सं०सं०), प्रो०रामसागर मिश्र, डॉ अवधेश चौबे, प्रो०मदन मोहन पाठक, डॉ अमित शुक्ल, प्रो०अवनीश अग्रवाल, डॉ ज्योतिप्रसाद दाश, डॉ रामबहादुर दुबे, डॉ अनिल कुमार पोरवाल अन्य विद्वान तथा शोधछात्र उपस्थित थे.

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