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हेरिटेज वाक, शानदार उर्दू शायरी, सितार से निकले संगीत और लखनवी खानों के नाम रहा सनतकदा फेस्टिवल

 shabahat |  2017-02-05 16:26:11.0

हेरिटेज वाक, शानदार उर्दू शायरी, सितार से निकले संगीत और लखनवी खानों के नाम रहा सनतकदा फेस्टिवल


तहलका न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ. महिन्द्रा सनतकदा फेस्टीवल के तीसरे दिन का शुभारम्भ प्रख्यात सितार वादक उस्ताद शाहिद परवेज़ के सितारवादन से हुआ. पृष्ठभूमि में बारादरी, सूरज की पहली किरणों से नहाया आसमान और एक संगीतज्ञ जो अपनी कला के शिखर पर हैं मंच पर अपने संगीत का जादू बिखेर रहा है, यह एक ऐसा अनुभव था जिसने श्रोताओं को एक ऐसी दैवीय अनुभूति कराई जो केवल संगीत ही दे सकता है. पद्मश्री उस्ताद शाहिद परवेज़ ख़ान को संगीत की दुनिया में मौजूद हर सम्मान से नवाज़ा गया है. गायन के शब्दों के लिए राग में बदलाव करने के लिए मशहूर इन सितार के दक्ष संगीतज्ञ इटावा घराने से संबन्ध रखते हैं.

आज फिर सुबह 9 बजे लखनऊ के पुराने घरों की तरफ़ कार टूर हुआ जहाँ मेहमान लखनऊ के पुराने घरों में गए और वहाँ रहने वालों से मिले. उसी समय हैरिटेज वॉक भी क़ैसरबाग़ से होती हुई गई जहाँ मेहमानों को पुराने महल के घरों से परिचित कराया गया.

आज के दिन की ख़ास बात थी अवधि घर का बना खाना फ़ेस्टिवल, जिसका सबसे ज़्यादा इन्तज़ार किया जाता है. इस साल के मेन्यू की कुछ चीज़ों में पुरानी पसंदीदा डिशे शामिल थीं जैसे लाल मिर्च का क़ीमा, रोस्टेड रान, मटन की निहारी, पसंदा, अदरकी गोश्त, सरसों की मछली, शब-देग़, और स्थानीय जायक़े जैसे सरसों का साग, मक्के की पिट्टी, मारवाड़ी थाली, बुन्देली कचौरी अन्य डिशों के साथ शामिल थीं. मीठे का भी इन्तेज़ाम था जिसमें पालक का हलवा, इमरती, चने का हलवा और शाही टुकड़ा शामिल थे. फ़ूड फ़ेस्टिवल के दौरान बारादरी का मुख्य चबूतरा खाने के शौक़ीनों से पूरा भर गया; मौजूद लोगो में प्रख्यात राजनीतिज्ञ मणिशंकर अय्यर उनकी पत्नी और नाती पोते भी थे. खाना हमेशा की तरह जल्द ही स्टाल से ग़ायब होकर लोगों की प्लेट तक पहुँच गया जिसमें लाल मिर्ची का क़ीमा सबसे पहली डिश थी जो शुरू होते ही ख़त्म हो गया.

फ़ेस्टिवल में साहित्यिक सत्रों के लिए सलेमपुर हाउस जैसी शानदार जगह चुनी गई थी और आज सलेमपुर हाउस में तीन कार्यक्रम हुए, निमरानाफि़केशनः अमन नाथ द्वारा खण्डहरों को पुनर्जीवित करना और जिर्राड कुन्हा द्वारा इन्डो पुर्टगीज़ हाउस की कहानी पर व्याख्यान.

अमन नाथ एक भारतीय लेखक, वास्तुकला नवीनीकरण विशेषज्ञ हैं और होटल के व्यवसाय में हैं. वे निमराना होटल श्रंखला के संस्थापक और फ्रासिंस वैक्जि़र्याग के साथ सह अध्यक्ष हैं. उन्होंने 1991 में शुरूआत की और तब से अब तक 25 हैरिटेज सम्पत्तियों को लेकर नवीनीकरण के बाद उनको हैरिटेज होटल का रूप दिया. आज के व्याख्यान में अमन नाथ ने अपने तिजारा और अलवर में किए काम के बारे में बताया साथ ही उन्होंने हैरिटेज सम्पत्तियों के संरक्षण के लिए बदलते समय के साथ उसको नया संदर्भ देते हुए संरक्षण की बात पर ज़ोर दिया.

दूसरा व्याख्यान गिर्राड डॉ. कुन्हा द्वारा दिया गया जो गोवा में रहने वाले एक भारतीय वास्तुविद हैं. व्याख्यान का शीर्षक था, ''इन्डो पुर्टगीज़ हाउस की कहानी''. उन्हें उत्तम शहरी प्लॉनिंग और डिज़ाइन जो उन्होंने जे एस डब्लू स्टील प्लान्ट के टाउनशिप जिसे विद्यानगर कहा जाता है, के लिए प्रधानमंत्री की ओर से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. गोवा के प्राचीनतम महलों में से एक रेइस मागोस फ़ोर्ट के नवीनीकरण के लिए उनकी सेवायें ली गई थीं जो बरसों से खण्डहर के रूप में था. आज यह एक टूरिस्ट स्थान है जो गोवा में आने वालों को वहाँ का इतिहास बताता है. आज के व्याख्यान में जिर्राड डा कुन्हा ने गोवा में अपने पुर्तगाली घरों के संरक्षण के काम के बारे में बताते हुए इन घरों की रिहाइश का विवरण दिया.

सलेमपुर हाउस में तीसरा कार्यक्रम के रूप में शाज़ी ज़मान की किताब ''अकबर'' का विमोचन हुआ. शाज़ी ज़मान एक प्रतिष्ठित हिन्दी उपन्यासकार और कहानीकार हैं, वे एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रौनिक मीडिया पत्रकार हैं और उन्होंने टॉमसन फ़ाउन्डेशन, सी एन एन, बी बी सी वर्ल्ड सर्विस ट्रेनिंग और भारतीय फि़ल्म और टेलीवीज़न इन्सटीट्यूट में काम किया है. अपने 20 साल के बहुमूल्य पत्रकारिता के अनुभव के साथ वे अब ए बी पी समाचार नेटवर्क के ग्रुप एडिटर हैं और ए एन एन नेटवर्क के सभी चैनल और वेबसाइट के संपादित विषय वस्तु को देखते है. वह जानी मानी ''प्रेम गली अतिसंकरी'' कहानी के लिए भी जाने जाते हैं; यह कहानी जेण्डर रिश्तों की जटिलतों को बताती है. किताब के विमोचन के बाद श्रोताओं को शाज़ी ज़मान और विरेन्द्र यादव के बीच की बातचीत सुनने का भी आनन्द मिला.

आज के दिन बरसों पुरार्नी उर्दू शायरी की प्रतियोगिता बेंत बाज़ी भी हुई. बेंत बाज़ी एक शेरो शायरी का खेल है जिसमें एक ख़ास शैली में उर्दू शायरी होती है और उर्दू की शेरों बनाए जाते हैं. अन्ताक्षरी की तरह ही, बेंत बाज़ी में उर्दू शायरी पढ़ी जाती है जिसके जवाब में विरोधी टीम को उसके जवाब में कोई शेर पढ़ना होता है. पुरानी परंपरा को निभाते हुए यह प्रतियोगिता पहली बार शहर के दो पुराने मशहूर कॉलेजो के बीच हुई, करामत कॉलेज बनाम इस्लामिया कॉलेज. दूसरा दौर फ़ेस्टिवल के हर साल बेंत बाज़ी प्रतियोगिता की परंपरा को निभाते हुए नसीमा इक़तेदार की टीम और सबीहा अनवर की टीम के बीच हुआ.

इस दिन का समापन नाटक ''हाँ मैं सावित्री बाई फुले'' से हुआ जिसे असाधारण सुषमा देशपाण्डे द्वारा अभिनीत किया गया. यह नाटक एक सशक्त एकाकी है जो शिक्षाविद् सावि़त्री बाई फुले के जीवन पर आधारित है. इसे मूल रूप से मराठी में लिखा गया था ''वाये, मी सावित्री बाई''. यह नाटक सावि़त्री के जीवन की कहानी को उनकी नज़र और दृष्टिकोण से बताता है. इस नाटक का लेखन, निर्देशन, अभिनय सुषमा देशपाण्डे ने किया है. उन्होंने वह थियेटर पत्रकारिता को ध्यान में रखते हुए इस नाटक को शुरू किया था. तब से पिछले 25 सालों से यह नाटक भारत और विदेश में 3000 से ज़्यादा मंचन करके एक प्रतिष्ठा हासिल कर चुका है.

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