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सवाल पूछने की ताक़त से ही चुनाव सुधार को बल: संजय सिंह

 Avinash |  2017-02-05 16:37:09.0

सवाल पूछने की ताक़त से ही चुनाव सुधार को बल: संजय सिंह

तहलका न्यूज़ ब्यूरो
लखनऊ. किसी लोकतन्त्र में संवैधानिक अधिकारों का निष्पक्ष मूल्यांकन उस लोकतन्त्र द्वारा अपनाई गयी चुनाव प्रणाली पर निर्भर करता है। चुनाव सुधारों के लिए नागरिक समाज की भूमिका तब अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जब राजनीति के अपराधीकरण का आंकड़ा एक चिंतनीय स्तर को छूने लगता है और प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता नीचे गिरने लगती है। चूंकि राजनैतिक व्यवस्था किसी समाज के द्वारा अपनाई गयी होती है इसलिए वह परोक्ष रूप से समाज के चिंतन और बहुमत को प्रदर्शित भी करती है। ऐसे में वर्तमान समय में मौजूदा सांसदों में लगभग 30% पर आपराधिक अभियोग लगा होना और पूरे देश के जनप्रतिनिधियों का लगभग 20% का अपराधिक अभियोग से ग्रसित होना एक गम्भीर चिंता का विषय है।

उपरोक्त बातें केंद्रीय ग्रन्थालय, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच एवं ए.पी.पी.एल के संयुक्त तत्वावधान में एम. बी.ए. विभाग के सभागार में आयोजित "चुनाव सुधार एवं नागरिक समाज" विषयक जनसंवाद में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के राष्ट्रीय समन्वयक मेजर जनरल (से.नि.) अनिल वर्मा ने कहीं। उन्होंने चुनावों में अज्ञात स्रोतों से काले धन के निवेश पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राजनैतिक वित्तपोषण का बड़ा स्रोत अज्ञात रहना अपने आप में संदिग्ध है। चूँकि राजनैतिक दलों को राजनैतिक चंदों में 100% छूट प्राप्त है इसलिए चार्टर्ड एकाउंटेंट के सहयोग से ऑडिट कराकर वे बड़ी आसानी से काले धन को सफ़ेद कर लेते हैं और इसकी कोई ठोस पूछताछ भी नहीं होती। संभवतः यही कारण भी रहा के हाल ही में चुनाव न लड़ने वाले लगभग 255 फ़र्ज़ी राजनैतिक दलों को चुनाव आयोग ने सख्त कार्रवाई करते हुए सूची से बाहर निकाल कर उनकी मान्यता रद्द कर दिया।

इस अवसर पर जनसंवाद के संयोजक व मानद ग्रन्थालयी प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के विषय में बताते हुए चुनाव सुधार के लिए किये जा रहे प्रभावी प्रयासों से उपस्थित जनसमूह को परिचित कराया। उन्होंने कहा कि भारत की वर्तमान चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए संघर्षशीलता की परम् आवश्यकता है। विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र एवं विश्व की जटिलतम चुनाव प्रणाली पूर्णतया दोषमुक्त नहीं कही जा सकती। राजनैतिक शुचिता, चुनावी पारदर्शिता, धनबल एवं बाहुबल के अवैध प्रयोग तथा बढ़ते आपराधिक वर्चस्व ने लोकतन्त्र में अलोकतांत्रिक तत्त्वों को बढ़ावा देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखा है। ऐसे में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा निष्पक्ष मूल्यांकन और जनसमुदाय में सत्य का निर्भीक प्रकाशन ही लोकतांत्रिक मूल्यों और चुनावी पवित्रता की रक्षा करने में समर्थ है।

उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच के संयोजक संजय सिंह ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा न्यायिक सक्रियता को उत्प्रेरित करने और उसके माध्यम से चुनाव सुधार के लिए किये गए क्रांतिकारी प्रयासों की चर्चा करते हुए कहा के वर्तमान समय में हमारा ध्यान चुनाव सुधार के लिए चार सूत्रों पर केंद्रित है। इनमें चुनाव निगरानी, राजनैतिक दल निगरानी, न्यायिक सक्रियता और संवाद शामिल हैं। अच्छे को चुनो और सच्चे को चुनो के नारे के साथ ए.डी.आर. ने चुनाव सुधार के लिए विभिन्न मोर्चों पर कार्य किया है जिसके माध्यम से जनजागरूकता के लिए प्रभावी प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अधिकाँश प्रबुद्ध समाज को भी चुनावों के संबन्ध में आधी अधूरी जानकारी होने के कारण अनेक भ्रांतियां उत्पन्न होतीं हैं। संस्था के द्वारा चुनाव सुधार के लिए विधि मंत्रालय को सुझाव एवं प्रारूप बहुत पहले भेजा जा चुका था लेकिन दुर्भाग्य से इसपर कोई अमल न हो सका। इसके अलावा राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे और वित्तपोषण का पारदर्शी और उत्तरदायी लेखा जोखा रखा जाना, उन्हें सूचना के अधिकार क़ानून के अधीन लाये जाने और चुनाव एवं मतदान संबन्धी जागरूकता के लिए गोष्ठियां, जनसंवाद, शिविर, चौपाल आदि का कार्यक्रम आयोजित करने जैसे विषयों पर भी ए.डी.आर. निरन्तर कार्य कर रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आधी आबादी के सशक्तिकरण की बात करने वाले इस देश में 10% भी महिलाओं का निर्वाचन संभव नहीं हो पाता। इन सभी समस्याओं को देखते हुए आज इस क्षेत्र में शोध और विशेष अनुसन्धान की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अध्यापकों में प्रो. सुधीर कुमार श्रीवास्तव, प्रो. विजय कुमार, प्रो. एन. पी. भोक्ता, प्रो. शिखा सिंह, प्रो. रविशंकर सिंह, प्रो. विनय कुमार सिंह, प्रो. हरिशरण, प्रो. वी.के. सिंह एवं डॉ. मनोज द्विवेदी ने भी अपने अपने विचार और सुझाव रखे।
इस अवसर पर डॉ. राजेश विक्रमी, छात्रसंघ उपाध्यक्ष अखिलदेव त्रिपाठी, महामन्त्री ऋचा चौधरी, चेतना पाण्डेय, शैवाल शंकर, अमित त्रिपाठी, अमरेंद्र मिश्र, आदित्य त्रिपाठी, कृष्णमुरारी, चन्द्रप्रकाश सहित बड़ी संख्या में छात्र, छात्राएं एवं प्रबुद्ध नागरिक समाज की उपस्थिति रही।
सञ्चालन अंग्रेजी विभाग के शोध छात्र आशीष श्रीवास्तव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विधि विभाग के छात्र शुभेन्द्र सत्यदेव ने किया।

ये रहे प्रमुख सुझाव और विचार

जनसंवाद में चुनाव प्रणाली में मौजूद दोष और सुधार के लिए उपस्थित प्रबुद्ध समाज द्वारा चुनौतियों एवं उपायों पर गम्भीर चर्चा हुई जिसमें अनेक बातें निकल कर सामने आईं जिनमें से प्रमुख निम्न रहीं :

1- चुनाव सुधार के लिए राजनैतिक दलों को आंतरिक लोकतन्त्र को और भी अधिक सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने का प्रयास हो जिससे उनमें व्याप्त परिवारवाद और व्यक्तिवाद समाप्त हो और पारदर्शी संगठन का ढांचा खड़ा हो सके।

2- आज के समय में अभिभावकों द्वारा अपने पाल्यों के लिए राजनीति में भी कैरियर की संभावना पर चिंतन करना चाहिए। इससे अच्छे और नए लोगों का राजनीति में प्रवेश सुनिश्चित हो सकेगा।

3- डिजिटल नॉमिनेशन और ऑनलाइन मतदान प्रणाली को विकसित किये जाने की बहुत आवश्यकता है। इसके द्वारा शत प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को हासिल करने में चुनाव में बाहुबल के प्रदर्शन को रोकने में सहायता मिलेगी।

4- चुनावी वर्ष में सत्तारूढ़ दल के पक्ष में सुचना जनसंपर्क विभाग विज्ञापन देना बंद करे।

5- चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन के मामलों का त्वरित निस्तारण किया जाना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए अलग से फास्ट ट्रैक न्यायाधिकरण की स्थापना पर विचार किया जा सकता है जिससे इससे संबंधित मामलों की त्वरित सुनवाई और शीघ्रातिशीघ्र कार्रवाई की जा सके।

6- आधी आबादी की कम हिस्सेदारी एक चिंतनीय विषय है। राजनैतिक दलों को टिकट बंटवारे में इसके लिए कोटा तय करना चाहिए।

7- मतदान के समय प्रत्याशियों का पूरा विवरण मतदान केंद्र पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। इससे मतदाताओं को अपने प्रत्याशियों को जानने का पूरा अवसर मिलेगा और वे सोच समझ कर मत देंगें।

8- बार बार चुनाव देश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं इसलिए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जाने की व्यवस्था बनाने हेतु एक पहल होनी चाहिए।

9- दो जगहों से चुनाव लड़ने की परम्परा पर प्रतिबन्ध लगाया जाना भी ज़रूरी है। यह दो बार चुनाव होने की संभावना और व्यर्थ में पैसे और समय की बर्बादी को बढ़ाता है। इससे सुरक्षित सीटों जैसी धारणा को बल मिलता है।

10- देश को अध्यक्षात्मक व्यवस्था पर भी विचार बनाना चाहिए। 51% नोटा होने पर चुनाव निरस्त होना और पूर्व प्रत्याशियों की प्रत्याशिता भी रोक देने का प्रावधान अमल में लाया जाना चाहिए। इससे राजनैतिक दलों को सही आदमी को टिकट देने हेतु बाध्य होना पड़ेगा।

11- मीडिया की शुचिता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। फ़र्ज़ी सर्वेक्षण, प्रायोजित समाचार और अंधाधुंध राजनैतिक विज्ञापन भी चिंता के विषय हैं जिनपर अंकुश लगाया जाना बेहद ज़रूरी है।

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