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हाँ, हमने मोहम्मद शाहिद को देखा है .......

 Tahlka News |  2016-07-20 09:03:03.0

हाँ, हमने मोहम्मद शहीद को देखा है .......

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. हाकी की दुनिया के सबसे चमकदार सितारों में से एक मोहम्मद शाहिद की रूह ने जिस्म का साथ छोड़ दिया. मगर हाकी के मैदान में शाहिद साहब के कलाइयों का जादू उनके चाहने वालो के दिलों में हर उस वक्त रोमांच पैदा करता रहेगा जब वे हाकी के बारे में सोचेंगे.

हमारे दौर में पैदा हुए लोगो ने हाकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चन्द के किस्से सुने मगर हांकी का असली जादू शाहिद के साथ ही देखा. ओलंपिक्स में लम्बे समय के बाद भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में शाहिद की इस जादूगरी का ही हाँथ रहा. मैदान पर जब शाहिद साहब के पास गेंद जाती तो हिन्दुस्तानियों का दिल एक अतिरिक्त आत्म विश्वास से भर जाता था. बिजली की तरह दौड़ते शाहिद के स्टिक में गेंद चिपक जाती थी और यूरोपियन खिलाडियों को उनके कब्जे से बाल छीनने में सातो आसमान की सैर करनी पड़ जाती थी.


शाहिद डिब्लिंग के बादशाह थे. वे गेंद को अपनी स्टिक के जरिये मनचाहे तरीके से नचाते थे. उनके साथ खेले रविंदर पाल, आरपी सिंह और जगवीर सिंह जैसे खिलाडी मोहम्मद शहीद को भूलना नहीं चाहते.1980 के  मास्को ओलम्पिक की विजेता टीम के सदस्य रहे शाहिद की कप्तानी में 1985 में भारत ने हाकी का अजलान शाह कप भी जीता था.
1979 के जूनियर वल्ड कप में शाहिद के साथ डेब्यू करने वाले ओलंपियन रविंदर पाल बताते हैं – “ शाहिद मेरा साथी खिलाडी ही नहीं मेरा भाई था. हम दोनों ने एक साथ डेब्यू किया और 8-9 साल साथ खेले . दौरों में हम रूम मेट भी होते थे. दोनों लखनऊ से थे और इसलिए भी एक अलग लगाव था. शाहिद की सबसे बड़ी खूबी थी कि जब उसके पास बाल होती थी तो टीम के बाकी खिलाडी रिलेक्स हो कर किसी चमत्कार का इंतज़ार करने लगते थे.”


शाहिद के साथ खेलने वाले आर पी सिंह शाहिद साहब के बारे में बात करते हुए भावुक हो जाते हैं. आr.p.singhरपी सिंह ने अपने अनुभवों को बताते हुए कहा – “शाहिद न सिर्फ शानदार खिलाडी थे बल्कि इंसान भी शानदार थे. हाकी के जितने बड़े खिलाडी दादा ध्यानचन्द  थे , शाहिद भी उनके समकक्ष ही थे. जब भी कोई टीम मैदान पर होती है तो उसके पास 11 खिलाडी होते ही हैं.मगर खास बात ये होती है कि किसके पास अद्भुत खिलाडी है जो विपक्षी के सामने मुसीबत पैदा कर देता है. शाहिद ऐसे ही थे. सिर्फ उन्हें पकड़ने के लिए विपक्षी टीम के 3 खिलाडी फंस जाते थे और हम लोगो को अतिरिक्त मौका मिल जाता था. मास्को ओलम्पिक में स्पेन पर 4-3 से मिली एतिहासिक जीत के नायक शाहिद ही थे और उस जीत की वजह से ही हम ओलम्पिक जीत सके.”



शाहिद बहुत भावुक इंसान थे. अपने साथी खिलाडियों के साथ उनका अपने परिवार और लखनऊ हास्टल से भावनात्मक लगाव जगजाहिर था. शाहिद के साथ खले ओलम्पिक हीरो jagbeer singhजगवीर सिंह की यादो में शाहिद एक एक ऐसे हीरो थे जिसके जाने से हमने इंस्पिरेशन खो दिया है, कलात्मकता का एक जादूगर खो दिया है. जगबीर सिंह बाते हैं – “शाहिद वो खिलाडी थे जिन्होंने दुनिया को लम्बे समय बाद इन्डियन हाकी का कलात्मक जादू दिखाया. उनके साथ बिताये वक्त और उनकी भावुकता के बारे में जगबीर सिंह कहते है-“ एक ओलम्पिक के दौरान हम साथ थे. तब उनकी बेटी लुबना का जन्म हुआ था. लुबना की सेहत ठीक नहीं रहती थी. तब नया नया फोन कार्ड का चालान हुआ था. शाहिद मेरे साथ जा कर फोन से देर तक लुबना का हाल चाल पूछते रहते थे. उसकी सेहत की फिक्र शहीद को रहती थी और इसीलिए वे फोन पर बहुत पैसा खर्च कर देते थे. बात करने के बाद वे देर तक खामोश रहते और फिर रूम में आ जाते थे. मगर मैदान पर उनकी भावुकता आक्रामकता में बदल जाती थी.

लखनऊ हास्टल से उनके लगाव के बारे में जगबीर सिंह बताते है- शाहिद टीम के ऐसे सीनियर खिलाडी थे जो अपने जूनियर और साथी खिलाडियों के खेल को बहुत बारीकी से देखता था और जब भी जरुरी  समझता खुद आगे बाद कर उसे सही तरीका सिखाता. एक बार जब लखनऊ हास्टल के 11 खिलाडी जूनियर कैम्प में आये तो शाहिद ने कहा था कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब इण्डियन कैम्प में भी 11 खिलाडी लखनऊ हास्टल के ही होंगे.”

बात 1985 की है. बनारस में जन्मे मोहम्मद शाहिद गोरखपुर में कुछ समय के लिए कार्यरत हुए थे. तब गोरखपुर में हाकी का स्वर्णिम युग चल रहा था. मेरे जैसे लोग शौकिया खेलने रेलवे  स्टेडियम जाया करते थे. उसी स्टेडियम में ही शाहिद भी प्रैक्टिस किया करते थे. तब शहीद की टीम ने मास्को ओलम्पिक जीत लिया था और शाहिद नेशनल हीरो थे. हमारे लिए शाहिद को सशरीर देखना किसी सपने से कम नहीं था. जितनी देर शाहिद मैदान पर होते उनका आभामंडल हमें मंत्रमुग्ध करता. हाँथ में स्टिक पकडे नन्हे बच्चो को देखते शाहिद की आँखे चमकने लगती थी.वे खुद पास आते और सिखाने में जुट जाते थे.

आज शाहिद अनंत दुनिया की सैर पर चले गए. अपने पीछे छोड़ गए बहुत सी यादे. मैदान पर चमके शाहिद, बेटी के लिए फिक्रमंद शाहिद, साथी खिलाडियों की उर्जा शाहिद, नन्हे खिलाडियों की प्रेरणा शाहिद.. कितने विशेषण , मगर सब थोड़े ...

हमने दद्दा ध्यान चन्द के किस्से सुने हैं, कैप्टन रूप सिंह के बारे में पढ़ा है. मगर इस बात का गर्व है ....हाँ, हमने शाहिद को देखा है... अलविदा जादूगर..

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