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वो दर्द ज़माने के लिखता था : फरजंद अहमद स्मृति शेष

 Tahlka News |  2016-10-03 12:36:41.0

fharzand-sir

सगीर ए खाकसार
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

sageerवो दर्द ज़माने के लिखता था।कागज़ पर आग कलम से बोता था।कालाहांडी की भूख की खबर हो,या फिर जहाना बाद हत्याकांड में कोई बड़ा खुलासा।बेबाकी ,निर्भीकता,निष्पक्षता थी उनकी खास पहचान। हम बात कर रहे हैं कलम के उस सिपाही की जो अब हमारे बीच नहीं रहा।"राइट विद पैशन "उनका शगल था।जी,हाँ हम बात कर रहे है इंडिया टुडे के पूर्व संपादक,बिहार के पूर्व सूचनायुक्त और उप सरकार के सलाहकार फरजंद अहमद की।उनका अचानक यूँ दुनिया को अलविदा कहना पत्रकार जगत को अखर गया है।उनके निधन से पत्रकारिता का एक युग समाप्त हो गया है।


2 अक्टूबर को जब हम शांति के अग्रदूत महामानव गांधी जी और सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री को याद कर रहे थे।उसी सुबह को फरजंद अहमद ने लखनऊ में दुनिया ए फानी को अलविदा कह दिया। वो लंबे समय से बीमार थे।यूपी के यशस्वी मुख्य मंत्री माननीय अखिलेश यादव उनका न सिर्फ इलाज करवा रहे थे बल्कि उनकी सेहत को लेकर ब्यक्तिगत रूप से फिक्रमंद भी थे।ज्यूँ ही उनके निधन की खबर मिली श्रधांजलि देने उनके आवास पहुंचे।

मूलतः बिहार के रहने वाले फ़रजंदअहमद इंडिया टुडे का संपादक होने से पहले यूपी के ब्यूरोचीफ हुआ करते थे।उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत यू0एन0आई0 पटना से की थी।उसके बाद वो टेलीग्राफ से जुड़े। समाज में हाशिये के तबके के लोगों की समस्याओं को सरकारों तक पहुँचाना उनका धर्म था। वो बहुत ही सादगी पसंद और सरल स्वभाव के थे।कलम के सच्चे और ईमानदार सिपाही थे।

नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और अन्ना पूर्ण के प्रधान संपाक युबराज घिमिरे उनके समकालीन पत्रकारों में हैं। श्री घिमिरे से मेरी पहचान फ़रज़न्द अहमद ने ही करायी थी।श्री घिमिरे और फ़रजंद अहमद टेलीग्राफ में एक साथ काम करते थे।मज़ेदार बात यह है कि दोनों एक दूसरे को अपना गुरु मानते थे।जब मैं काठमाण्डू में घिमिरे जी से मिलता तब वो पूछते थे क़ि मेरे गुरु फ़रज़न्द साहिब कैसे हैं।फ़रज़न्द अहमद के निधन की खबर से श्री घिमिरे आवाक रह गए ।सहसा उनको यकीन नहीं हुआ।श्री घिमिरे ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता के इस महान स्तम्भ का जाना भारतीय पत्रकारिता के साथ साथ मेरी भी ब्यक्तिगत क्षति है।नेपाल का पत्रकारिता जगत भी उनके निधन से दुखी है।

गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद कामिल खान कहते हैं समाज में दबे कुचले और निचले पायदान के लोगों की आवाज़ थे फ़रज़न्द अहमद।वो सत्यवादी थे।समाज की समस्याओं को बड़ी ही निर्भीकता से उठाते थे।

गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ कुमार हर्ष फरजंद अहमद को याद करते हुए कहते हैं उनका जाना पत्रकारिता में शोध और खोजबीन की पहले से ही विलुप्त हो रही परंपरा पर गहरा आघात है।करीब दस वर्षों तक तकरीबन हर हफ्ते होने वाली बातों ,उनके साथ किये गए तमाम पत्रकारीय अभियानों में बहुत कुछ सीखा ,उनके भीतर का रिपोर्टर दरअसल एक ज़बरदस्त शोधार्थी था।जिसे सतह पर दिखती चीज़ों से से ज़्यादा मज़ा सतह से नीचे देखने में आता था।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा उन्हें अपना गुरु मानते हैं।श्री सिन्हा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर ते हुए कहते हैं हर स्टोरी लिखते वक्त उनका ध्यान रहता था।आइंदा भी रखूँगा।आप नहीं होंगे गलतियां बताने को या शाबाशी देने के लिए ।मगर जो बुनियादी उसूल आपने बताये हैं वो हमेशा मेरे लिए मार्ग दर्शन करते रहेंगे।

गोरखपुर न्यूज़ लाइन डॉट कॉम के संपादक मनोज सिंह कहते हैं फ़रजंद अहमद ने आदर्श पत्रकारिता की एक मिसाल अपने कलम से कायम की है।वो हमेशा हम लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।युवा लेखक मणीन्द्र मिस्र कहते हैं फ़रज़न्द अहमद का यूँ ही नश्वर जगत को अलविदा कहना पत्रकारिता जगत के लिए बड़ी क्षति है।

फ़रज़न्द अहमद से मेरी पहली मुलाकात करीब दो दशक पूर्व हुई थी।उस वक्त मैं हिंदुस्तान अख़बार में बतौर संवाददाता काम करता था।भारत नेपाल सीमा पर स्थित बढ़नी के "नो मेंस लैंड "पर ।साथ में थे गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार कुमार हर्ष ।इंडिया टुडे के लिए नेपाल पर स्टोरी कर रहे थे।वह दौर नेपाल में माफियाओ और तस्करों का था।मैं ने पहली मुलाकात में उनसे कहा कि सर आप तो बड़े पत्रकार है उन्हों बहुत ही सादगी से जवाब दिया नहीं भाई "मैं तो आदमी सड़क का हूँ"।उसके बाद मैं हमेशा के लिए उनसे जुड़ गया।अक्सर फ़ोन पर बात चीत में यह तंबीह किया करते थे।मुझ से खुलकर बात किया करो।तकल्लुफ की कोई ज़रूरत नहीं है।हमेशा ही गाइड किया करते थे।अपने से जूनियर और नए लोगों को पढ़ना और लिखना सीखना उन्हें बहुत ही पसंद था।वो पत्रकारिता में उच्च मानदंडों के पछधर थे।उनका मानना था कि पत्रकार को सदा ही पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए तभी उसकी निष्पक्षता बनी रहेगी।

आज जब फरजंद अहमद हमारे बीच नहीं है उनके बताये उसूल हम लोगों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। अलविदा फ़रज़न्द सर।

खुशबू कैसे महके मेरे गीतों में, मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ ।
लिखता हूँ मैं दर्द ज़माने के यारों, लिखता तो पीछे हूँ ,पहले रोता हूँ ।

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