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उनके दरवाज़े पर क्यों नहीं टंगते वन्दनवार, क्यों नहीं बजती शहनाई

 Sabahat Vijeta |  2016-11-30 09:39:43.0

A transgender prostitute prepares for work - India April 2005

शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. शादियों और जन्मदिन समारोहों में बधाई गाने वाले किन्नरों की अपनी खुद की ज़िन्दगी में भी खुशियों की दस्तक होनी चाहिये इस मुद्दे पर सोचने की फुर्सत समाज के पास नहीं है. कोई नहीं सोचता कि उनके दरवाज़े पर कभी वन्दनवार सजे. उनके घर पर भी कभी शहनाई बजे. कभी उनके घर पर भी खुशियाँ चलकर आयें. यह बात न कोई सोचता है न सोचना चाहता है.


यह बातें लिखने की ज़रुरत इसलिये पड़ गई क्योंकि हमेशा दूसरों की खुशियों में शरीक होने वाले एक किन्नर की आँखों में अचानक आंसू देखने को मिल गये. किन्नर बहुत दुखी था. दरअसल उसकी बहन की शादी थी और उसके परिवार को 50 हज़ार रूपये की फ़ौरन ज़रुरत थी. उसकी माँ ने उसे फोन कर कहा कि कहीं से भी इंतजाम कर 50 हज़ार रूपये भेजो. तुम्हारी बहन की शादी है. मगर ध्यान रखना कि शादी में तुम मत आना. किसी को पता नहीं है कि हमारे परिवार में कोई हिजड़ा भी है. यह पता चल गया तो तुम्हारी बहन की शादी टूट जायेगी.


उस किन्नर की आँख में आंसुओं का सैलाब इसीलिये उमड़ा था क्योंकि उसके कमाये 50 हज़ार रुपयों से उसकी माँ को कोई एतराज़ नहीं था लेकिन अपने पेट में जिसे नौ महीने रखा था उसकी पहचान बताने में भी उन्हें दिक्कत थी.


सृष्टि के नियंता ने इस दुनिया को तीन जातियां दीं लेकिन समाज ने सिर्फ दो जातियों को ही स्वीकार किया. एक औरत दूसरा मर्द. तीसरी जाति को किन्नर कहें, हिजड़ा कहें या फिर ट्रांसजेंडर. यह तीसरी जाति है मगर समाज की मान्यता इसे नहीं मिली है.


ऐसे बहुत से लोग हैं जो ट्रांसजेंडर और हिजड़े को अलग-अलग मानते हैं. इसके पक्ष में यह दलील है कि हिजड़े के शरीर की बनावट में फर्क होता है जबकि ट्रांसजेंडर या तो औरत का शरीर रखता है या मर्द का शरीर. ट्रांसजेंडर को समलैंगिक भी मान लिया जाता है. कहा जाता है कि समलैंगिक मानसिक रूप से बीमार लोग हैं. समाज की मान्यता के विपरीत औरत औरत से और मर्द मर्द से सम्बन्ध रखता है. पश्चिमी देश इसे स्वीकारें तो स्वीकारें हम नहीं स्वीकार सकते.


चेन्नई में वालेंटरी हेल्थ सर्विसेज़ के कैपिसिटी बिल्डिंग आफीसर गिरीश कुमार से इस मुद्दे पर बात हुई तो उन्होंने कहा कि यह बात सही है कि ट्रांसजेंडर शरीर से या तो औरत होता है या मर्द लेकिन औरत औरत की ओर या फिर मर्द मर्द की ओर आकर्षित क्यों होता है इस पर भी तो सोचा जाना चाहिये. वह कहते हैं ऐसे लोगों की बहुत बड़ी तादाद है जिन्हें शरीर औरत या मर्द का मिला लेकिन एक समय उनकी ज़िन्दगी में ऐसा आता है जब उन्हें यह महसूस होता है कि उन्हें जन्म के समय गलत शरीर मिल गया है. अपनी आत्मा से तो वह विपरीत लिंगी हैं. मर्द के शरीर वाला व्यक्ति जब खुद को भीतर से औरत पाता है तो उसका आकर्षण दूसरे मर्द की तरफ होता है. इसी तरह औरत का शरीर पाने वाली औरत जब खुद को भीतर से मर्द पाती है तो वह दूसरी औरत की तरफ आकर्षित होती है. ऐसे लोग आपस में जोड़ा बना लेते हैं और साथ रहने लगते हैं.


गिरीश कुमार बताते हैं कि मेडिकल साइंस ने अब यह सुविधा दे दी है कि व्यक्ति का लिंग बदला जा सकता है. यह बात बहुत सोच विचार के बाद ही होती है क्योंकि इसमें यू टर्न संभव नहीं है. मर्द अगर खुद को औरत में बदलवाता है तो हमेशा के लिये औरत में बदल जाता है. यह काम वैध तरीके से हिन्दुस्तान के कुछ अस्पतालों में भी होता है. जेंडर बदलने के लिए कुछ इंजेक्शन दिये जाते हैं. छह महीने से दो साल के भीतर शरीर में बदलाव नज़र आने लगते हैं. शरीर में पर्याप्त बदलाव के बाद डाक्टर आपरेशन का फैसला करता है.


ट्रांसजेंडर एक लम्बे अरसे से यह मांग करते रहे हैं कि उन्हें समाज से जुड़ने का मौक़ा दिया जाये. उन्हें भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाये. ताकि वह भी समाज में इज्ज़त की ज़िन्दगी बसर कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पहले ही केन्द्र सरकार को आदेश दिया था कि ट्रांसजेंडर को ओबीसी कोटे के तहत रिज़र्वेशन दिया जाये. इस आदेश पर देश में अभी शायद ही कहीं अमल किया गया हो.


तमिलनाडू में एक ट्रांसजेंडर पुलिस आफीसर की नौकरी पाया है, लेकिन उसे यह नौकरी बतौर औरत हासिल हुई थी. नौकरी हासिल होने के बाद उसने यह घोषित किया कि वह औरत नहीं ट्रांसजेंडर है. इसी तरह से कर्नाटक में एक ट्रांसजेंडर प्रोफ़ेसर की ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से निभा रहा है लेकिन सच बात तो यह है कि वह जिस यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर है वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के माँ-बाप दिल से यह बात नहीं चाहते कि उनके बच्चों को कोई ट्रांसजेंडर पढ़ाये. दिल्ली में एक ट्रांसजेंडर मेट्रो चलाने का काम अच्छी तरह से करता है.


यह तीन ऐसे उदाहरण हैं जिसमें ट्रांसजेंडर अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभा रहे हैं तो फिर ज़रूरतमंद दूसरे ट्रांसजेंडर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रौशनी में नौकरी देने में क्या दिक्कत है. यह अभी तय नहीं हो पाया है. हालांकि नरेन्द्र मोदी सरकार ने ट्रांसजेंडर के पक्ष में हाल ही में एक विधेयक पास किया है. लेकिन उस विधेयक में इतने संशोधनों की ज़रुरत है कि इसे फिर से बनाकर पास कराना पड़ेगा.


कर्नाटक सरकार हालांकि ट्रांसजेंडर को सहूलियत देने के मुद्दे पर संवेदनशील है. कर्नाटक सरकार के निर्देश पर यह तय किया गया है कि पब्लिक टॉयलेट में मेल / फीमेल के साथ-साथ ट्रांसजेंडर टॉयलेट भी बनाया जाये. कई जगह ट्रांसजेंडर के लिये अलग टॉयलेट बन भी चुके हैं. इसी तरह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि हर अस्पताल में ट्रांसजेंडर के लिये अलग से यूनिट खोली जाये. इस आदेश पर अभी अमल नहीं हुआ है.


ट्रांसजेंडर की तरह हिजड़ों को भी सभी सुविधायें मिलनी चाहिये क्योंकि उनके शरीर में जो विकार है उसके लिये उनकी खुद की कोई गलती नहीं है. अपने शरीर के विकार की वजह से वह समाज से अलग-थलग हैं. एक ही शरीर में औरत और मर्द की निशानियाँ लेकर पैदा हो जाने भर से वह समाज से दूर हो जाते हैं. अपना पेट भरने के लिये वह दूसरों की शादियों और जन्मदिन समारोहों में नाचते गाते हैं और दूसरों की खुशियों से हासिल पैसों से अपना घर चलाते हैं. उनके नाचने-गाने की कीमत देकर समाज यह मान लेता है कि उसने कीमत चुका दी है. यह कोई नहीं सोचता कि हमारी खुशियों में जो अभी नाच गाकर गया है क्या इसके घर भी खुशियाँ नहीं आनी चाहिये. क्या इनकी बर्थडे कभी नहीं होती. क्यों इनके दरवाजों पर कभी वन्दनवार नहीं टंगते.


बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह बात जानते हैं कि हिजड़ों के भी घराने होते हैं. मुम्बई में हिजड़ों के 7 घराने हैं. दिल्ली में तीन, हैदराबाद में दो और पंजाब में इनका एक घराना है. हिजड़ों का मानना है कि वह मांगकर अपनी ज़िन्दगी चलाते हैं. मांगने के बजाये जो मारपीट करते हैं. जो ट्रेनों में लूट करते हैं उन्हें हिजड़े भी अपनी बिरादरी से अलग मानते हैं. उनका कहना है कि जिस तरह दूसरे समाज में अपराधी होते हैं उसी तरह से हमारे समाज में भी अपराधी आ गये हैं.

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