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बिना गठबंधन बसपा और कांग्रेस की राह रहेगी मुश्किल

 Tahlka News |  2016-06-20 09:27:13.0

rahul maya
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. मिशन यूपी के लिए संगठन के तार कसने के साथ साथ ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने केंद्र और सूबे की सरकार पर हमलावर रुख अख्तियार कर लिया है. मायावती को लगता है कि बिगड़ती कानून व्यवस्था के मामले पर वे समाजवादी पार्टी को बखूबी घेर सकती हैं और दूसरी तरफ भाजपा को साम्प्रदायिकता बढाने वाली पार्टी बता कर वे सूबे में अल्पसंख्यक वोटो को अपनी तरफ कर भाजपा और सपा दोनों का खेल ख़राब कर सकती हैं. लेकिन इन सब के बीच अपनी सम्भावनाये तलाशते हुए मायावती कही न कही यूपी के सियासी समीकरणों की अनदेखी भी कर रही हैं.


मिशन यूपी के लिए अब समाजवादी पार्टी और भाजपा ने अपने गठबन्धनो को आकार देना शुरू कर दिया है. भाजपा ने अपना दल के साथ लोकसभा चुनावो में किए गठबंधन को आगे बढ़ने का फैसला किया है और साथ ही पूर्वांचल के 3 जिलों में प्रभावी भारतीय समाज पार्टी के साथ भी सीटों का तालमेल कर लिया है.

पूर्वांचल के बनारस से ले कर बलिया तक प्रभाव रखने वाले मुख़्तार अंसारी की कौमी एकता पार्टी का विलय भी समाजवादी पार्टी में होना लगभग तय हो चुका है. कौमी एकता दल के साथ आने से गंगा पट्टी में समाजवादी पार्टी को मजबूती मिलने की उम्मीद है. पश्चिमी यूपी में अपनी बिगड़ी गणित को सम्हालने के लिए सपा अब राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. इस काम के लिए खुद अमर सिंह लगे हैं और मुलायम सिंह यादव के स्वीकृति भी मिल चुकी है.

इन दो दलों के अलावा पूर्वांचल में ही आधार रखने वाली पीस पार्टी के भी 2 विधायक सपा में शामिल हो चुके हैं और अब इस बात की संभावना जताई जा रही है कि पीस पार्टी समाजवादी पार्टी या कांग्रेस के साथ जायेगी.

इन दोनों बड़ी पार्टियों के अलावा सूबे में अपनी दावेदारी कर रही मायावती गठबंधन को ले कर अभी तक खामोश है. समय समय पर वे अपने कार्यकर्ताओं से अकेले लड़ने की बात तो जरूर कर रही हैं मगर मायावती सरीखी मझी राजनेता की दृष्टि इन नए समीकरणों पर न हो ऐसा संभव नहीं लगता.

लोकसभा के चुनावो में मिली करारी हार के बाद मायावती ने सबक लेते हुए अपने संगठन को कसा और उसका नतीजा भी पंचायत चुनावो में उन्हें मिला. 2014 में डूबती दिखाई दे रही बसपा ने पंचायत चुनावो में ग्राम स्तर पर जिस तरह सफलता पायी उससे साबित हो गया कि सूबे की राजनीती में मायावती अभी कमजोर नहीं पड़ी हैं. अपने मूल दलित वोटो को सहेजने के बाद मायावती ने सर्वजन के फार्मूले को भी आगे बढाया. इस बीच उनकी निगाह अल्पसंख्यक वोटो पर भी रही.

सूबे में लगातार होते सांप्रदायिक तनावों की घटनाओं के बीच मायावती ने अल्पसंख्यक समुदाय को इस बात का सन्देश देने की कोशिशे की, कि इस तरह के मामले भाजपा और सपा की आपसी मिलीभगत का नतीजा हैं.

मायावती इस बार दलित मुस्लिम गंठजोड़ के सहारे मैदान में उतरने की रणनीति पर चल रही हैं. इस मुहीम में ब्राहमण भी साथ लेने की उनकी योजना है. मगर मायावती के सामने खतरे भी हैं. भाजपा ने 2014 के चुनावो में दलित वोटो में एक बड़ी सेंध लगायी थी और यूपी में मुस्लिम मतदाता भी सपा के पक्ष में ही रहा था.

यूपी कि सियासत का दरवाजा खटखटा रहे ओवेसी भी मायावती के इसी वोट बैंक पर निशाना लगाये बैठे हैं. जय भीम जय मीम के नारे के साथ उपचुनावों में उन्होंने मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश भी की थी. भाजपा अभी भी दलित वोटो के लिए लगातार प्रयास कर रही है.

वही सूबे में लस्त पस्त पड़ी कांग्रेस अब तक अपनी रणनीति ही नहीं बना पायी है. बीते विधानसभा चुनावो में उसे 29 सीटो पर सब्र करना पड़ा था मगर आज का आलम तो ये है कि यदि कांग्रेस आला कमान ने जल्दी गठनबंधन का निर्णय नहीं लिया तो इसकी आधी सीटे भी आने मुश्किल लग रही हैं.

प्रशांत किशोर के चमत्कार तो कभी प्रियंका के नाम के सहारे सूबे के कांग्रेसी खुद को सांत्वना देते नजर आते हैं मगर वास्तविकता यही है कि अगर कांग्रेस ने किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं किया तो उसकी नैया पार लगना मुश्किल है. पीके की रणनीति में भी कांग्रेस का छोटे दलों से गठबंधन करना शामिल रहा है और वे बिहार जैसा ही एक मजबूत गठबंधन यूपी में भी चाहते हैं. मगर निर्णय में देरी होने से सूबे के छोटे मगर प्रभावी दल छिटकते जा रहे हैं.

कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक भी दलित मुस्लिम ब्राह्मण का रहा है. कांशी राम ने कांग्रेस से गठबंधन कर जो चुनाव लड़ा था उसके बाद कांग्रेस का यह आधार पूरी तरह से सिमट गया. तब से कांग्रेस फिर कोई मजबूत समीकरण नहीं बना सकी.

भाजपा की हिंदूवादी राजनीति के उभर ने सूबे के अल्पसंख्यको को अपना रास्ता खोजने पर मजबूर कर दिया है. खास तौर से पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाता का भरोसा अभी भी कांग्रेस पर बना हुआ है. कांग्रेस के साथ यह एक अच्छी स्थिति है कि उसे गैर सांप्रदायिक राजनीती का चेहरा अभी भी माना जाता है.

अब अगर बसपा और कांग्रेस एक साथ आते हैं तो सूबे का चुनावी परिदृश्य बदल जायेगा. तब यह चुनाव पूरी तरह से सपा बनाम बसपा कांग्रेस गठबंधन हो जायेगा और भाजपा के लिए राह मुश्किल हो जाएगी.

कांग्रेस भी यदि सौ सीटों की अपनी मांग को छोड़ कर 70 से 80 सीटों पर भी समझौता करती है तो भी इस गठबंधन में आने से वह 40 से 50 सीटे पाने की स्थिति में होगी. यही फायदा बसपा को भी होगा क्योकि तब मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद यह गठबंधन ही रहेगा.

लेकिन मायावती का हठ और कांग्रेस की अनिश्चितता इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुयी है. यदि मायावती अपने हठ पर कायम रही तो इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर ले. ऐसे में फिर मायावती की राहे बहुत मुश्किल होने वाली हैं.

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