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तंजील अहमद को बचाने की कोशिश तो कर ही सकती थी यूपी पुलिस

 Sabahat Vijeta |  2016-04-05 10:34:19.0

तहलका न्यूज़ ब्यूरो


tanzeel-ahmed-nia-officerलखनऊ. 5 अप्रैल. एनआईए के डिप्टी एसपी तंजील अहमद के क़त्ल की जानकारी आम होने के बाद जिस तरह की हाय तौबा मची उससे लगा कि पुलिस किसी भी खोह में छिपे अपराधियों को खोज निकालेगी लेकिन सच्चाई की जो तस्वीर नज़र आ रही है वह बड़ी घिनौनी है.


यूपी की लापरवाह पुलिस अपने वरिष्ठ अधिकारी की चलती साँसों के थम जाने से पहले मौके पर नहीं पहुँची. मोहम्मद आलम नाम का एक चश्मदीद तंजील अहमद पर गोलियां बरसने के फ़ौरन बाद मौके पर पहुँच गया था. उसने 100 नंबर डायल कर पुलिस को सूचना भी दी थी कि वैगन आर कार सवार को गोलियां मारी गई हैं लेकिन उसकी साँसें चल रही हैं फ़ौरन उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाय तो जान बच सकती है. आलम पुलिस का जवाब सुनकर आवाक रह गया. उससे कहा गया कि अंग्रेज़ी बोलना बंद कर और पुलिस के पास आकर घटना की जानकारी दे.


आलम के अनुसार जब वह वैगन आर के पास पहुंचा तो तंजील अहमद और उनका पूरा परिवार घायल था. तंजील सबसे ज्यादा घायल थे लेकिन उनकी साँसें चल रही थीं. हालांकि वह बेहोश हो चुके थे. घटना स्थल से पुलिस चौकी थोड़ी ही दूर थी लेकिन घटना के आधे घंटे तक मौके पर पुलिस नहीं पहुँची.


एनआईए के तेज़ तर्रार अफसर तंजील अहमद पठानकोट हमले की पड़ताल कर रहे थे. कई आतंकी घटनाओं का पर्दाफाश करने वाले तंजील अपने परिवार के साथ बिजनौर में एक शादी में शरीक होने आये थे. पता चला है कि इस शादी में एक ऐसा बाइक सवार भी आया था जो न तो वर पक्ष से था न वधु पक्ष से. वीडियो फुटेज में मिले इस संदिग्ध युवक की पड़ताल शुरू हो गई है.


मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निर्देश के बाद प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक दलजीत चौधरी खुद मामले की जांच करने बिजनौर जायेंगे. एनआईए टीम खुद भी पूरे मामले की जांच कर सकती है. ऐसा उसने संकेत भी दिया है. इस हत्याकांड की जांच में यूपी पुलिस के साथ-साथ केन्द्रीय एजेंसियां भी जुटी हुई हैं. घटना स्थल की सीसीटीवी फुटेज भी खंगाली जा रही हैं लेकिन यह सारी कवायद तो सांप के गुजरने के बाद लाठी पटकने जैसी है. अगर मोहम्मद आलम का फोन सुनते ही पुलिस सक्रिय हो जाती तो शायद तंजील अहमद को समय से चिकित्स्यीय सहायता मिल भी जाती. 24 गोलियां लगने के बाद उनकी जान बचती या नहीं बचती यह दूसरी बात है लेकिन अगर पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी समय से निभाती तो कम से कम यह तो महसूस होता कि उन्हें बचाने की कोशिश हुई थी.

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