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पढ़ें स्वामी रामभद्राचार्य को क्या है वर्त्तमान रामचरितमानस से आपत्ति

 Vikas Tiwari |  2016-09-12 17:39:13.0

स्वामी रामभद्राचार्यतहलका न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ : स्वामी रामभद्राचार्य ने गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस अशुद्धियों से भरी होने का आरोप लगाया। उन्होंने गीताप्रेस की रामचरितमानस में 3000 से अधिक गलतियां ढूढ निकाली हैं। रामभद्राचार्य ने बताया कि जो रामचरितमानस अब तक पढ़ी जा रही थी, उसे तुलसीदास द्वारा लिखी गयी मूल रामचरितमानस नहीं माना जा सकता है । उन्होंने कहा कि वो इसके लिए शास्त्रार्थ करने को भी तैयार हैं।

यही नहीं रामभद्राचार्य ने तुलसीदास के सही रामचरितमानस की प्रतियां भी प्रकाशित कर वितरित करायी हैं और स्वयं देश विदेश में घूम-घूम कर खुद की रामकथा का वाचन भी कराते हैं. स्वामी रामभद्राचार्य ने पुरानी प्रतियों को अधिक विश्वसनीय माना है। क्यों कि नयी प्रतियाँ वर्तनी, व्याकरण और छन्द सम्बन्धी निम्नलिखित भिन्नता है. जिनमें श्री वेंकटेश्वर प्रेस (खेमराज श्रीकृष्णदास) और रामेश्वर भट्ट आदि पुरानी व सही प्रतियाँ हैं और गीता प्रेस, मोतीलाल बनारसीदास, कौदोराम, कपूरथला और पटना से मुद्रित नयी प्रतियाँ हैं।


रामभद्राचार्य ने एक चौपाई का उदाहरण दिया कि ‘ढोल गँवार छुद्र पशू रारी’ के स्थान पर ‘ढोल गँवार शूद्र पशू नारी’ हो गया क्योंकि ‘श’ ध्वनि संस्कृत की ध्वनि है अवधी की नहीं। इसके अलावा रामभद्राचार्य ने नयी रामायण में निम्न विरोध गिनाये:-
1- गीता प्रेस सहित कईं आधुनिक प्रतियाँ 2 पंक्तियों में लिखित 16 मात्राओं की एक चौपाई मानी है जब कि रामभद्राचार्य ने 32 मात्राओं की एक चौपाई मानी है, जिसके समर्थन में उन्होंने हनुमान चालीसा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा पद्मावत की समीक्षा के उदाहरण दिए हैं। उनके अनुसार इस व्याख्या में भी चौपाई के चार चरण निकलते हैं क्यूंकि हर 16 मात्राओं की अर्धाली में 8 मात्राओं के बाद यति है। परिणामतः तुलसी पीठ प्रति में चौपाइयों की गणना फ़िलिप लुट्गेनडॅार्फ़ की गणना जैसी है।
2- आधुनिक प्रतियों में प्रचलित कर्तृवाचक और कर्मवाचक पदों के अन्त में उकार के स्थान पर अकार का प्रयोग है। रामभद्राचार्य के मतानुसार उकार का पदों के अन्त में प्रयोग त्रुटिपूर्ण है, क्यूंकि ऐसा प्रयोग अवधी के स्वभाव के विरुद्ध है।
3- तुलसी पीठ की प्रति में विभक्ति दर्शाने के लिए अनुनासिक का प्रयोग नहीं है जबकि आधुनिक प्रतियों में ऐसा प्रयोग बहुत स्थानों पर है। रामभद्राचार्य के अनुसार पुरानी प्रतियों में अनुनासिक का प्रचलन नहीं है।
4- आधुनिक प्रतियों में कर्मवाचक बहुवचन और मध्यम पुरुष सर्वनाम प्रयोग में संयुक्ताक्षर न्ह और म्ह के स्थान पर तुलसी पीठ की प्रति में क्रमशः न और म का प्रयोग है।
5- आधुनिक प्रतियों में प्रयुक्त तद्भव शब्दों में उनके तत्सम रूप के तालव्य शकार के स्थान पर सर्वत्र दन्त्य सकार का प्रयोग है। तुलसी पीठ के प्रति में यह प्रयोग वहीं है जहाँ सकार के प्रयोग से अनर्थ या विपरीत अर्थ न बने। उदाहरणतः सोभा (तत्सम शोभा) में तो सकार का प्रयोग है, परन्तु शंकर में नहीं क्यूँकि रामभद्राचार्य के अनुसार यहाँ सकार कर देने से वर्णसंकर के अनभीष्ट अर्थ वाला संकर पद बन जाएगा।

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