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वसीम बरेलवी की शायरी उजाला फैलाने वाली रौशनी है

 Sabahat Vijeta |  2016-11-27 16:14:47.0

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने आज प्रोफेसर वसीम बरेलवी के 75वें जन्मदिवस पर लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित अमृत महोत्सव समारोह में उन्हें सम्मानित करते हुए शतायु होने की शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर प्रख्यात कथावाचक मुरारी बापू, लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति एस.पी. सिंह, जिलाधिकारी लखनऊ सत्येन्द्र सिंह सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। अमृृत महोत्सव का आयोजन नागरिक सुरक्षा उत्तर प्रदेश, नागरिक समाज एवं इतिहास विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा किया गया था।


राज्यपाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रोफेसर वसीम बरेलवी जाने-माने उर्दू शायर हैं। प्रोफेसर वसीम बरेलवी का परिवार बहुत बड़ा है। वे केवल बरेली, उत्तर प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके चाहने वाले पूरे विश्व में फैले हैं। अमृत महोत्सव में मुरारी बापू की उपस्थिति दूध में शक्कर और केसर जैसी है। उन्होंने कहा कि प्रो. वसीम की शैली केवल आनन्द ही नहीं, बल्कि लोगों में एकता और देशभक्ति की चेतना का निर्माण करती है।


श्री नाईक ने कहा कि हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं उर्दू भाषा हिन्दी के बाद सबसे ज्यादा समझी जाने वाली भाषा है। उन्होंने कहा कि यह सुखद संयोग है कि मंच पर बैठे वसीम साहब की मातृ भाषा उर्दू है, कथाचार्य मुरारी बापू की मातृभाषा गुजराती है और मेरी मातृभाषा मराठी है, लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति की भाषा हिन्दी है। राज्यपाल ने अपनी चार भाषा में प्रकाशित पुस्तक चरैवेति!चरैवेति!! मंचासीन महानुभावों को भेंट करके अभिनन्दन भी किया। उन्होंने कहा कि वास्तव में यह अमृत महोत्सव के साथ-साथ भारतीय भाषाओं का सम्मेलन और संगम भी है।


कथावाचक मुरारी बापू ने राज्यपाल की पुस्तक को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्होंने पुस्तक नहीं अपना मन दिया है। उन्होंने प्रो. वसीम बरेलवी की प्रशंसा करते हुए कहा कि प्रो. वसीम बरेलवी अपनी शायरी के माध्यम से लोगों के दिलों तक पहुंचे हैं। वसीम बरेलवी का जीवन उस दीपक के जैसा है जिसका कोई मजहब नहीं होता, सिर्फ उजाला फैलाता है। उन्होंने प्रो. वसीम बरेलवी को उनका एक चित्र स्मृति स्वरूप भेंट किया।


प्रो. वसीम बरेलवी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कलाकार और कलमकार की बात ही कुछ और है, वह किसी का भी नहीं होता है और सबका होता है। समाज को करीब से देखने और संतुलित करने में साहित्य का बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान की संस्कृति अजीम है जिसमें लोगों को जोड़ने की भावना है। कार्यक्रम में अशोक बाजपेयी, कुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय एस.पी. सिंह, सिराज मेंहदी सहित अन्य लोगों ने भी अपने विचार रखे।

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