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लक्ष्य 2017 के लिए कांग्रेसी सेना तैयार, राज बब्बर के बाद अब शीला दीक्षित पर दाँव

 Tahlka News |  2016-07-14 11:27:15.0

sheela dixit
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. मिशन यूपी के लिए कमर कस रही कांग्रेस ने अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को कांग्रेस ने यूपी में सीएम का चेहरा घोषित किया है. इसके साथ ही संजय सिंह, प्रमोद तिवारी, रीता जोशी, जितिन प्रसाद ,प्रदीप जैन, जफर नकवी, आरपीएन सिंह, मोहसिना लक्ष्य 2017 की प्रचार अभियान टीम में शामिल करने की घोषणा भी कर दी गयी है.

काफी दिनों से शीला दीक्षित के नाम कि चर्चा सियासी गलियारों में चल रही थी. कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी ब्राह्मण चेहरे का फार्मूला दिया था. इसके बाद कयास लगाये जा रहे थे कि यूपी कांग्रेस का अध्यक्ष कोई ब्राह्मण ही होगा , मगर राज बब्बर को बतौर अध्यक्ष यूपी की कमान दे दी गयी.


सूबे में अपने वजूद की तलाश में लगी कांग्रेस ने इस बार चुनावों में खुद को गंभीर दावेदार दिखने की कोशिश में न सिर्फ जातीय समीकरणों का ध्यान रखा है बल्कि बीते कई सालो से यूपी कांग्रेस में कायम सिंडिकेट को भी तोड़ दिया है. राजबब्बर के नेतृत्व  में जिन 4 उपाध्यक्षो की नियुक्तिया हुयी हैं वे भी खेमे बाजी से बाहर रहने वाले नाम है. इसी तरह शीला दीक्षित का भी यूपी में कोई खेमा नहीं है.

कन्नौज से एक बार लोकसभा सांसद रही शीला बीते 20 सालो से यूपी की राजनीती से दूर रही है. दिल्ली में उन्होंने रिकार्ड समय तक मुख्यमंत्री रहने में कामयाबी हासिल की है. उनके कार्यकाल में हलाकि कामनवेल्थ सहित कुछ घोटालों के आरोप भी लगे मगर लोग मानते हैं कि शीला के ही समय दिल्ली का स्वरुप भी बदला और अब दिल्ली एक वर्ल्ड क्लास शहर है.

कांग्रेस के इस फैसले के पीछे कई वजहे हैं. कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल रहे उमा शंकर दीक्षित की बहू  शीला के नाम पर ब्राह्मण वोटो को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सकता है तो वही दिल्ली में बसे लाखो यूपी वालों के जरिये शीला के विकास को भी याद दिलाया जा सकता है.

शीला दीक्षित और राज बब्बर की टीम के जरिये कांग्रेस जिस सोशल इंजीनियरिंग को बढ़ा रही है वह सबसे ज्यादा बसपा पर असर डालेगी. बसपा के दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम वोट बैंक पर अब कांग्रेस अपना दावा करने की स्थिति में आ गयी है.

शीला दीक्षित, राज बब्बर और इमरान मसूद जैसे बड़े नामो के साथ कांग्रेस अल्पसंख्यक वोटो को अपनी ताकत दिखाना चाहती है. कांग्रेस का मानना है कि समाजवादी पार्टी के वक्त में हुए दंगों की वजह से मुस्लिम वोटर काफी खफा है. वही मायावती के अतीत में भाजपा के साथ सरकार बनाने को याद करते हुए वह बसपा पर भी पूरा भरोसा नहीं कर पा रहा . ऐसे में कांग्रेस अगर मजबूत दिखने लगी तो अल्पसंख्यक वोटरों की पहली पसंद बन सकती है.

कांग्रेस की इस मजबूती में नितीश कुमार का साथ भी मिल सकता है. एक हफ्ते बाद नितीश कुमार यूपी में डा अयूब की पीस पार्टी, मुख़्तार अंसारी के कौमी एकता दल और कृष्णा पटेल की अपना दल के साथ गठबंधन का ऐलान कर सकते हैं. संभावना यह भी है कि इस गठबंधन में देर सवेर कांग्रेस भी एक अहम् हिस्सा होगी. क्षेत्रीय क्षत्रपो के साथ आने से कांग्रेस का वजन और भी बढ़ जायेगा और कांग्रेस की धर्म निरपेक्ष छवि के साथ डा. अयूब, अफजाल अंसारी और इमरान मसूद का होना भी अल्पसंख्यक वोटरों के लिए आकर्षण होगा.

ब्राह्मण पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वोटर रहा है मगर बीते 30 सालों से वह पार्टी से दूर रहा है. बीते कुछ सालो से वह मायावती के साथ रहा मगर अब कांग्रेस अपने पारंपरिक वोटो को एक बार फिर सहेजने में जुट गयी है.

शीला और राज बब्बर की जोड़ी के साथ प्रियंका की सक्रियता कांग्रेस को कितनी संजीवनी दे पाती है यह 2017 के नतीजे ही बताएँगे.

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