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सपा संग्राम: पिता-पुत्र में सुलह के लिए कोशिशें तेज

 Girish |  2017-01-04 06:13:13.0


तहलका न्यूज़ ब्यूरो


लखनऊ. समाजवादी परिवार में झगड़े के बाद सुलह की कोशिशें तेज़ हो गयी हैं, जिन्हें समझदार माना जाता है वो मूर्खता पूर्ण काम कर रहे हैं. जिनसे कोई उम्मीद नहीं थी वो सुलह कराने में लगे हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो चाहते हैं सुलह न हो. ऐसे लोगों के चेहरे टीवी पर बयानबाज़ी करते दिखाई दे रहे हैं, कि सुलह होगी और साइकिल वाला निशान भी बचा रहेगा ऐसी उम्मीद सभी को है.

मेरी ऐसे कई विधायकों से बात हुई सब सहमे हुए हैं. उनका कहना है कि अगर चुनाव चिन्ह बदला और विवाद खत्म नहीं हुआ तो 2017 में विधानसभा का मुंह देखना मुश्किल होगा. ऐसे हालात में कई विधायक अपना नया आशियाना तलाश रहे हैं. आचार संहिता लगते ही उनका पाला बदल जाएगा. और मुख्यमंत्री के पीछे खड़ी जनाधार वाली भीड़ कम हो जायेगी.


बचेंगे वो लोग जिन्हें या तो विधायक नहीं बनना है या चुनाव लड़ के शहीद होना है. बहुत से ऐसे विधायक भी हैं जो हैं तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मगर चुनाव चिन्ह सायकिल से अलग हट कर चुनाव नही लड़ना चाहते हैं. अखिलेश समर्थक एक विधायक ने मुझ से कहा कि सुलह होने में वो लोग रोड़ा बने हुए हैं जिनमे ज़्यादातर या तो राज्यसभा में हैं या एमएलसी हैं.

प्रोफेसर रामगोपाल यादव ,किरण मय नन्दा, सांसद नरेश अग्रवाल ,नीरज शेखर, सुरेंद्र नागर,सांसद राज्यसभा में हैं. सुनील साजन, उदयवीर ,संजय लाठर ,आनंद भदौरिया, एमएलसी हैं. अखिलेश यादव के ये सिपहसालार उनकी आँखों पे पर्दा डाल रहे हैं. इन्हें चुनाव में उतार दिया जाए तो ज़मानत नहीं बचा पाएंगे.

ऐसे ही लोगों ने अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा कर बाप बेटे के बीच की खाई को गहरा कर दिया है. पूरा यादव समाज और मुस्लिम समाज हथप्रभ है कि मुलायम सिंह को उन्ही की बनाई हुई पार्टी से कोई कैसे हटा सकता है. बाप से बेटे को जुदा करने वालों के नामों का बखान प्रदेश के हर चट्टी चौराहे पे हो रहा है.

लोग पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को अध्यक्ष पद ऐ हटाये जाने से नाराज़ है. इसका नुकसान विधायकों को भुगतना पड़ेगा. अधिवेशन में जो लोग आए वो भी नाराज़ हैं ऐसे कई लोगों का कहना है कि मुझे पता होता कि नेता जी को हटाया जा रहा है तो वे कभी इस घृड़ित कार्य में शामिल न होते.

अखिलेश यादव के जो सलाहकार सच्चाई की आँखों पे पर्दा डालने का काम कर रहे हैं. ऐसे लोग अपना स्वार्थ देख दूसरे विधायकों का भविष्य खराब कर रहे हैं. ज़िलों जिलों में भाजपा और बसपा के प्रत्याशी जश्न मना रहे हैं. सपाइयों से ज़्यादा टीवी चैनलों पे ये लोग आँखें गड़ाए रहते हैं कि सपा में कहीं कोई समझौता तो नहीं हो गया.

आज़म खान की कोशिशों की सराहना चारो तरफ़ हो रही है वहीं प्रोफेसर रामगोपाल सबसे ज़्यादा समाजवादीयों की गाली खा रहे है. गाली खाने वालों में अमर सिंह पिछड़ गए हैं. शिवपाल यादव से भी लोग नाराज़ हैं मगर उनसे सहानुभूति भी दिखा रहे हैं.

सपा कार्यालय में अखिलेशवादियों के क़ब्ज़े के बाद शिवपाल के कमरे से उनकी नेम प्लेट उखाड़ फेंकी गयी. मगर कल अखिलेश यादव की टीम में शिवपाल के लिए सहानुभूति रखने वाले किसी भले इंसान ने उनकी नेम प्लेट वापस लगा दी.

आज के घटना क्रम पे नज़र रखिये हो सकता है सुलह हो जाए आज़म खान ने धमकी भी दी है प्यार भी जताया है. एक बड़ा वोट बैंक खिसकने का खतरा दोनों तरफ है इसलिए उम्मीद कीजिये कि समाजवादी पार्टी में सब कुछ ठीक हो जाएगा.

इन शर्तों पर रुकी बात-

1. मुलायम सिंह यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहें, अखिलेश अपना दावा वापस ले लें.

2. अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष की कमान वापस दे दी जाए और टिकट बंटवारे में उनकी अहम भूमिका रहे.

3. शिवपाल यादव को दिल्ली में राष्ट्रीय महासचिव बनाकर राष्ट्रीय राजनीति में भेज दिया जाये.

4. मुलायम के अमर और अखिलेश के रामगोपाल को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए.

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