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बिछड़ गया दुनिया से, 14 लाख से अधिक भूले-भटकों को मिलाने वाला

 Anurag Tiwari |  2016-08-20 11:42:52.0

भारत सेवा दल, राजाराम तिवारी, कुम्भ मेला, माघ मेला, संगम, इलाहाबाद, प्रतापगढ़ तहलका न्यूज ब्यूरो

प्रतापगढ़. बीते 66 सालों में 14 लाख से अधिक बिछड़ों को उनके परिजनों तक पहुँचाने वाले राजाराम तिवारी की जीवन यात्रा 88 वर्ष की आयु में थम गई। राजाराम तिवारी ने इलाहाबाद में शनिवार को भोर में लगभग 4 बजे अन्तिम सांस ली।

शनिवार दोपहर तक उनका पार्थिव शरीर पैतृक स्थान प्रतापगढ़ लाया गया, जहाँ उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। राजाराम को प्रशासन से जुड़े लोग और श्रृद्धालु उन्हें भूले-भटके के नाम से जानते थे। दूसरों के लिए जीवन बिताने वाले राजाराम तिवारी ने भारत सेवा दल के मुखिया के रूप में भूले भटकों को मिलाने का अभियान देश आजाद होने के एक वर्ष पूर्व 1946 में आयोजित माघ मेले से किया था।


भूले-भटके तिवारी के नाम से विख्यात राजाराम तिवारी का कहना था कि उन्हें इस काम की प्रेरणा पवित्र नदी से मिलती है। राजाराम तिवारी की लगन को देखकर सरकार ने भी उनकी मदद की। उन्होंने पहली बार 1946 कुंभ से भारत सेवा दल के मुखिया के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी, अब उम्रदराज होने की वजह से उनका बेटा उमेश उनके इस काम में मदद करने लगा था और वह खुद संचालक की भूमिका में होते थे।

इलाहाबाद में 1954 के कुंभ मेले में मची भगदड़ में एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और काफी लोग अपनों से बिछड़ गए थे, इस दौरान राजाराम तिवारी ने न केवल कई लोगों की जान बचाई बल्कि तमाम बिछड़े लोगों को अपनों से मिलाया।

भारत सेवा दल, राजाराम तिवारी, कुम्भ मेला, माघ मेला, संगम, इलाहाबाद, प्रतापगढ़

जब उनकी उम्र 16 साल की थी तो वे कुंभ मेला घूमने आए थे। इसी दौरान उन्हें एक बुजुर्ग महिला मिली, जो अपने परिवार से बिछड़ गई थी। उस जमाने में लाउडस्पीकर की व्यवस्था भी नहीं थी, जिससे अनाउंस कराकर उनकी फैमिली को ढूंढा जा सके। उन्होंने महिला को परिवार से मिलाने के लिए हर जगह छान मारा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। काफी जतन के बाद उन्हें वो जगह पता चल गई, जहां उनके घरवाले ठहरे हुए थे।

इस घटना के बाद से उन्होंने ठान लिया कि मेले में एक ऐसा शिविर लगाएंगे, जहां भूले-भटके लोगों को मिलवाया जा सके।साल 1946 में 18 साल की उम्र में राजाराम तिवारी ने गंगा तट पर भूले भटके शिविर की शुरुआत की। मेले में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक अगर कोई अपने परिवार से बिछड़ जाता है तो उसे इस शिविर में भेजा जाता है। यहां पूरी डिटेल पूछकर लाउडस्पीकर से अनाउंस किया जाता है। इसके बाद बिछड़ा हुआ व्यक्ति या उसका परिवार नाम सुनकर शिविर में आ जाता है।

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