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यहाँ शिवलिंग पर नही शंकर-पार्वती की मूर्ति पर चढ़ता है जल

 Anurag Tiwari |  2016-08-09 10:02:22.0

Shivdwar, Ghorawal, Shiv, Goddess, Parvati, Robertsganj, Sawan, Savan, Sonebhdra

तहलका न्यूज ब्यूरो

सोनभद्र. यूपी के दक्षिणी हिस्से में स्थित सोनभद्र जिले में भगवान शंकर और पार्वती की ऐसी दुर्लभ मूर्ति है जो कि प्रणय मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह दुनिया में भगवान शंकर की अकली मूर्ति है। साथ ही शायद यह देश की एकलौती जगह जहाँ भगवान शंकर के लिंग रूप पर जल न चढ़ाकर मूर्ति पर जल चढ़ाया जाता है।

सोनभद्र जिले के हेडक्वार्टर राबर्ट्सगंज से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर घोरावल कसबे में शिव मंदिर में यह मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति की खासियत है कि इसमें शिव-पार्वती की प्रणय मुद्रा दिखाई पड़ती है। यह प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है।

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भगवान शंकर ने किया था यहाँ अज्ञातवास

सोनभद्र जिले को सोनभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ के निवासी मानते हैं कि यहाँ की चट्टानों में भगवान शंकर के आसन की छवि दिखाई देती है। मान्यता है कि अहंकार के कारण दक्ष प्रजापति ने देवाधिदेव शिव को अनुष्ठान में नहीं बुलाया और पति के अपमान से दुखी सती ने पिता के अहंकार का नाश करने के लिए अपनी देह का त्याग कर दिया। इससे क्रुद्ध होकर  शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र की उत्पत्ति की और उसे दक्ष का वध करने का आदेश दिया। वीरभद्र ने दक्ष का वध किया तो शिव के गणों ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंश कर दिया। बाद में देवताओं के समझाने पर शिव ने दक्ष के कटे सर की जगह बकरे का सर लगा दिया।

पार्वती के सती होने से हुए शिव खिन्न

दक्ष के अहंकार का चूर-चूर करने के बाद भगवान शंकर पार्वती के सती होने के चलते बड़े ही खिन्न मन से वहां से चले गए। कहते हैं शिव ने सोनभूमि का रुख किया। यहाँ शिव ने सोनभूमि के अगोरी क्षेत्र में कदम रखा। जहाँ शिव ने इस इलाके में सबसे पहले चरण रखे, उसे आज शिवद्वार के नाम से जाना जाता है। कहा जता है कि दक्ष के यज्ञ से वापस लौटने पर वहां के घटना से शिव इतने खिन्न हुए कि यहाँ अगोरी क्षेत्र में उन्होंने अज्ञातवास का निर्णय ले लिया। शिव के गुप्त स्थान पर अज्ञातवास करने के चलते इस क्षेत्र को ‘गुप्तकाशी’ के नाम से जाना जाता है।

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shivdwar (5)भगवान शंकर के लिंग रूप में नहीं मूर्ति पर चढ़ता है जल

राबर्ट्सगंज के रहने वाले अनिल उपाध्याय बताते हैं कि सावन के महीने  में पूरे देश में भगवान शंकर के लिंग पर जल चढ़ाने की प्रथा है, लेकिन शिवद्वार में ही मूर्ति पर जल चढाने की प्रथा है। वे बताते हैं यहाँ कि काले पत्थर से बनी शिव-पार्वती की मूर्ति अलौकिक है। अनिल के मुताबिक़ देश में शायद ही कहीं और शिव की ऐसी प्रतिमा देखने को मिले। वे बताते हैं कि यह ग्यारहवीं शताब्दी में बनी लास्य शैली कि मूर्ति है। अनिल कहते हैं कि मंदिर के आसपास कई खंडित मूर्तियाँ पड़ी हैं । इन्हें देखा कर लगता है कि यह सभी या तो सोढरीगढ़ दुर्ग में मिलीं थीं या आस पास के खेतों से खुदाई के दौरान मिली जिन्हें लोग मंदिर के पास छोड़ गए। वे बताते है कि बह्ग्वान शिव और पार्वती की यह  मूर्ति भी खुदाई के दौरान ही मिली थी, जिसे आदि शंकराचार्य ने यहाँ स्थापित कराया और बाद में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। मान्यता है कि शिव भक्तों के लिए काशी के बाद इसी स्थान का सबसे ज्यादा महत्व है। अनिल कहते हैं कि यहाँ पहाड़ों में मिलने वाली मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है कि प्राचीन काल से यह इलाका शिव साधना का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। अनिल कहते हैं कि यहाँ देश के कोने-कोने से लोग आते हैं और यहाँ दर्शन करने वालों की मन्नत पूरी होती है।

 

साल भर लगा रहता है श्रद्धालुओं का तांता  

शिवद्वार गुप्त काशी स्थित मंदिर में  सावन के महीने , वसंत पंचमी और शिवरात्रि पर दर्शनार्थियों का हुजूम एकत्र हो जाता है। सावन के महीने में यहाँ कांवड़िए   मीरजापुर में गंगा नदी से और विजयगढ़ किले में स्थित तालाब से जल लाकर मूर्ति पर चढाते हैं। यहाँ मंदिर परिसर में श्रद्धालु अपनी मनौतियाँ पूरी होने पर कथा के साथ-साथ मुंडन, शादी जैसे आयोजनों के लिए भी आते हैं।

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