बिना “मैं” के सितारे थे ओम पुरी : स्मृति शेष

 2017-01-06 07:05:49.0


उत्कर्ष सिन्हा

6 जनवरी की सुबह सुबह जब ओम पुरी की मृत्यु की खबर आई तो सहसा 12 सितम्बर 2012 की रात याद आ गयी. तब सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार नयी नयी बनी सरकार ने मशहूर कवि गोपाल दास "नीरज" को ने भाषा संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया था. लखनऊ के वीआईपी गेस्ट हॉउस के एक कमरे में मै और मशहूर व्यंगकार भाई सर्वेश अस्थाना रात 11 बजे नीरज जी के साथ बैठे उनसे देवानंद के किस्से सुन रहे थे कि अचानक उनका फोन बजा.नीरज जी ने फोन मुझे पकड़ते हुए कहा इसे यहाँ पहुँचने का रास्ता बता दो.. उधर की आवाज कुछ सुनी सुनी सी लगी बात हुयी फिर मैं उस गाडी को लेने बाहर सड़क पर निकला और गाडी से ओमपुरी निकले एक हाँथ में गुलदस्ता और दुसरे हाथ में नीरज जी के लिए एक व्हिस्की की बोतल ..


बहरहाल अन्दर पहुँचते ही ओम पुरी ने पहले तो गुलदस्ता नीरज जी को दिया और फिर दंडवत लेट गए.

ओम जी के साथ मशहूर थियेटर आर्टिस्ट सीमा कपूर थी. उस वक्त ये लोग काफी नजदीकी रिलेशन में थे. इतना बड़ा अदाकार किसी उत्साहित फैन की तरह अपने फेवरिट गीतकार से जिस तरह मिल रहा था वह अद्भुत था.
ओम पुरी ने कहा – दादा, मैं जब भी कोई गाना गुनगुनाता हूँ तो सीमा मुझसे कहती है ये नीरज जी का लिखा है. मैं आपसे मुम्बई में कभी मिला नहीं और मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि यार कौन है ये आदमी जिसके लिखे गाने इतने हिट हैं मगर ये मुम्बई में नहीं रहता ? आज जब मैं लखनऊ किसी शूटिंग के लिए आया हुआ था तब सीमा ने बताया कि आप यही हैं , मैं खुद को रोक नहीं पाया आपका पैर छूने से और इसी लिए इतनी रात में आ गया.

फिर तो बैठकी और जमी. मैंने प्रसंगवश कहा – ओम जी मैंने आपकी पत्नी द्वारा लिखी आपकी आत्मकथा पढ़ी है. ओम ने कसैला सा मुंह बनाया और बोले – जो आपने पढ़ा है वो पूर्ण सत्य नहीं है वो भी अर्ध सत्य ही है. नंदिता को ले कर कुछ खटास उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रही थी. फिर बहुत सी बाते हुई.

इन सबके बीच एक बात मैं बहुत शिद्दत से नोटिस कर रहा था. जिस अभिनेता के फैन पूरी दुनिया में हो और उससे मिलने के लिए बेक़रार हो वो खुद एक फैन की तरह अपने फेवरिट गीतकार से मिलने और बात करने के लिए किस कदर बेचैन था कि खुद उसके (मैं) एक बड़े फैन की बातो को तवज्जो नहीं देना चाहता था. अर्ध सत्य, पार और ईस्ट इज ईस्ट का नायक बच्चो जैसे भाव लिए राजकपूर और देवानंद के साथ नीरज जी के अनुभव को इस तरह तलीनता से सुन रहा था जैसा शायद मैं ओमपुरी के अनुभव को सुनता.

एक अन्तराष्ट्रीय स्टार बिना “मैं” के कैसे जी सकता है यह मैंने ओमपुरी से उस रात सीखा और समझा. रात 3.30 बजे तक...एक अमिट अनुभव को खुद के भीतर समेट कर....

अलविदा ओम पुरी ....

Tags:    
loading...
loading...

  Similar Posts

Share it
Top