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चढ़ावे के फूल भरेंगे रंग बनारसी साड़ियों और कालीन में

 Anurag Tiwari |  2016-06-27 05:39:56.0

[caption id="attachment_91814" align="aligncenter" width="1024"]temples of varnasi, BHU, Chemical Engineering, Agricultural Department, Varanasi प्रतीकात्मक चित्र[/caption]

तहलका न्यूज ब्यूरो

वाराणसी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में स्वच्छता अभियान और मेक इन इंडिया के क्षेत्र में एक और बड़ी पहल हुई है। अब बनारसी साड़ियों और कालीन को चढ़ावे के फूल, फलों और प्याज के छिलकों से तैयार नेचुरल रंगों से रंगा जाएगा। इस मामले में बीएचयू के केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट ने नई पहल की और बनारसी साड़ी और कालीन उद्योग में लगे लोगों को हर तरह मदद देने का भरोसा दिया है। इससे पहले बीएचयू के एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट नेचुरल डाई तैयार कर चुके हैं।


केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट मदद को तैयार

केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एचओडी प्रो पीके मिश्र के मुताबिक़ कहना है कि बनारसी साड़ी और कालीन की रंगाई के उद्योग में लगे लोग इस तकनीक को सीखकर अपने रोजगार में इसका उपयोग करना चाहते हैं तो उनका विभाग ऐसे लोगो की मदद के लिए हमेशा तैयार है। प्रो। मिश्र ने बताया कि अब विदेशों में भी केमिकल से बने रंगों से लोग परहेज करने लगे है और इनका प्रयोग अब कम हो रहा है। उन्होंने बताया कि इन्ही सब फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए बीएचयू ने नेचुरल डाई तैयार की है और इसमें किसी भी स्टेज पर केमिकल का यूज नहीं हुआ है। इस नेचुरल डाई को तोयार करने के लिए केवल फूलों से निकले रस, उसकी राख और पानी का प्रयोग कर यह नेचुरल डाई तैयार किया गया है।

एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट भी कर चुका है पहल

इससे पहले बीएचयू के ही एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट भी गुलाब, गेंदा, सूरजमुखी या अन्य कोई भी फूल, संतरे से लेकर अनार और प्याज के छिलके, बबूल और यूकेलिप्टस से निकलने वाले रस से ये डाई तैयार कर चुका है। इन नेचुरल डाई का पशमीना शाल और वूल पर भी इस्तेमाल किया गया जिसके परिणाम भी उत्साहजनक रहे हैं। फूलों से तैयार इस डाई को जर्मनी, कनाडा में होने वाले टेस्ट के लिए भेजा गया है।

एक दिन में निकलता है 15 क्विंटल चढ़ावे का फूल

बीएचयू के एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट ने अपनी स्टडी में पाया है कि वाराणसी के पांच प्रमुख मंदिरों काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, श्रीविश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन मंदिर और दुर्गा मंदिर में ही हर दिन चढऩे वाले फूलों का वजन लगभग 15 क्विंटल है। त्योहारों में इन मंदिरों में जो फूल चढ़ाई जाते हैं उसका आंकडा 15 क्विंटल प्रति मंदिर यानी 75 क्विंटल तक पहुँच जाता है। ऐसे में नेचुरल डाई तैयार करने के लिए अकेले वाराणसी में ही काफी संभावना है और बीएचयू का एग्रीकल्चरल और केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट आसपास के जिलों में रंगाई का काम करने वालों को इस मुहीम से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। इस मुहीम से न केवल मंदिरों में स्वच्छता बनी रहेगी बल्कि चढ़ावे के फोल्लों को गंगा में प्रवाहित करने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।

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