सियासी मजबूरी क्या जोड़ पायेगी एक हादसे से टूटा गठबंधन !

 2017-03-10 08:17:21.0

सियासी मजबूरी क्या जोड़ पायेगी एक हादसे से टूटा गठबंधन !

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. यूपी के विधानसभा के लिए हुए चुनावो के बाद आये एग्जिट पोल्स ने आखिरी परिणामो की उत्सुकता और बढ़ा दी है.सभी का आंकलन है कि यूपी में भाजपा को बड़ी बढ़त मिली हैं मगर दो एजेंसियों को छोड़ बाकी सभी एक्जिट पोल बता रहे हैं कि यूपी में त्रिशंकु विधान सभा का संकेत है. हलाकि साल 2007 के बाद हुए सभी चुनावो में जनता ने हमेशा स्पष्ट जनादेश ही दिया है,मगर यह भी सच है की बीते एक दशक में यह पहला चुनाव रहा जिसमे तीनो प्रमुख पार्टियों ने मजबूती के साथ चुनाव लड़ा है और राजनितिक पंडित अभी भी कोई स्पष्ट राय बनाने से हिचक रहे हैं.

इसी बीच अखिलेश यादव के बीबीसी को दिए एक बयान ने सियासत के मैदान में एक नयी हलचल मचा दी है. अखिलेश ने कहा- " वैसे तो हम बहुमत की सरकार बनाने जा रहे हैं लेकिन अगर जरुरत पड़ी तो राष्ट्रपति शासन की बजाय हम बसपा से समझौता भी करने को तैयार हैं." अखिलेश यादव का यह बयान सियासत में नए शुरुआत की अटकले तेज कर गया क्योंकि यूपी में समाजवादी पार्टी और बसपा के एक साथ आने को लगभग असंभव माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे आग और बारिश का एक साथ आना.

लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है और इस खेल में अंतिम सत्य कुछ भी नहीं होता. राजनीति के लिए हमेशा कहा गया है कि "न कोई स्थायी दोस्त है और न कोई स्थायी दुश्मन." कश्मीर की सरकार फिलवक्त में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहाँ विपरीत ध्रुवो पर खड़ी भाजपा और पीडीपी मिल कर सरकार चला रहे हैं.

अखिलेश यादव के संकेत अगर वास्तविकता में बदलते हैं तो यह यूपी की सियासत के 360 डिग्री घूमने का कारण बनेगा और ढाई दशक के बाद सूबे में वह गठजोड़ दिखाई देगा जिसकी बुनियाद 1993 में मुलायम सिंह यादव की नव गठित समाजवादी पार्टी ने कांशी राम की बसपा से गठबंधन किया था.तब सपा ने 256 और 164 सीटों पर चुनाव लड़ा था. राम मंदिर आन्दोलन के बाद उभरे सांप्रदायिक विभाजन के बीच एक नारा उछला था "मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जय श्री राम" कमंडल की राजनीति पर मंडल की राजनीति भारी पड़ी थी नतीजतन सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली थीं. मायावती तब पहली बार मुख्यमंत्री बनी थी.

वोटो के गणित के लिहाज से यह एक अपराजेय माना जा सकने वाला गंठजोड़ था जहाँ पिछड़ी और दलित जातियां एक तरफ लामबंद हो गयी थी. लेकिन इस बीच हुयी एक घटना ने यूपी की राजनीति के इस अपराजेय गंठजोड़ को ऐसा तोडा की आने वाले वक्त में इस गठबंधन का दोबारा होना नामुमकिन मान लिया गया. लखनऊ के बहुचर्चित 'गेस्‍टहाउस कांड' में मायावती के साथ समाजवादी नेताओं ने इस हद तक दुर्व्यवहार किया कि उन्हें एक कमरे में छुप कर अपनी जान बचानी पड़ी और तब भाजपा के नेता स्व. ब्रह्म दत्त दिवेदी और लालजी टंडन के कारण मायावती बाच सकी थी. इस एक घटना ने दोनों दलों में तल्खियाँ इस कदर बढ़ा दी कि यूपी की सियासत के ये दो ध्रुव बन गए. 1993 से शुरू हुयी यह दोस्ती 1995 में एक बहुत ही कड़वे अनुभव के बाद टूट गयी.

तब से ये दोनों ही दल यूपी की राजनीति में अलग अलग ही सही मगर अपना दबदबा कायम किये रहे और भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टिया अपनी जमीन खोजने के लिए संघर्ष करती रही. लम्बे समय बाद 2014 में हुए मोदी के उभार ने भाजपा को संजीवनी दी है और 2017 में वह एक बड़ी ताकत के रूप में सामने आई है. अब निगाहें 11 मार्च पर लगी है जब जनता का फैसला आएगा.

मगर प्रश्न फिर वही है . क्या अखिलेश यादव का संकेत किसी बड़े बदलाव का सूचक है? क्या मायावती इस बार अपने कदम बढ़ाएंगी ? अगर ऐसा होता है तो फिर सरकार की कमान किसके हांथो होगी ?

दरअसल यूपी में अगर भाजपा गठबंधन बहुमत नहीं पाता और वह बहुमत से 20 सीट भी कम हो गयी तो उसके पास विकल्प बहुत सिमित होंगे. राष्ट्रीय लोकदल की हालत भी एग्जिट पोल के हिसाब से इतनी नहीं बन रही कि मात्र उनके समर्थन से सरकार बन सके. निर्दलियों की संख्या यदि पर्याप्त नहीं हुयी तो सपा, बसपा, कांग्रेस में से कौन उसकी मदद करेगा? ऐसे में इस बात की भी संभावना बनती है कि सपा और बसपा एक दूसरे को समर्थन दे कर सरकार बनवा दें. ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए सबसे बेहतर स्थिति होगी और वह निश्चित ही सरकार का हिस्सा बन सकती है.

मुलायम सिंह के बाद समाजवादी पार्टी की राजनीति भी बदली है और सोच से ले कर मिजाज तक का टेक्चर बदलता दिखाई दे रहा है. यह राजनीति कितनी चलेगी पता नहीं. अखिलेश यादव ने अपवाद छोड़ कर कभी भी अपने विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्द नहीं प्रयोग किये और जातीय समीकरणों के अलावा उन्होंने अपने पूरे प्रचार अभियान को अपनी उपलब्धियों पर ही केन्द्रित रखा. ऐसे में अगर वे नतीजो के अनुकूल न होने के बाद भी पार्टी पर प्रभुत्व कायम रखने में कामयाब रह सके तो फिर इस गठबंधन की संभावनाएं प्रबल होती हैं. और यदि यह गठबंधन मजबूती से बना रह गया तो यूपी के सियासत में एक बार फिर बड़ा बदलाव आएगा.



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