ऐसे मोड़ पर पहुँच गयी सपा जहाँ से अलग होते हैं रास्ते

 2017-04-07 06:47:55.0

ऐसे मोड़ पर पहुँच गयी सपा जहाँ से अलग होते हैं रास्ते

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. अपना रजत जयंती वर्ष मना रही समाजवादी पार्टी का अंदरूनी कलह अब उस मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ से दो रास्ते निकलते हैं. चुनावो के पहले शुरू हुआ पार्टी का सत्ता संघर्ष अब तक नहीं थमा है और चुनावो में हुयी करारी हार के बाद यह और भी बढ़ता दिखाई दे रहा है. अगले एक सप्ताह में पार्टी के भीतर कुछ बड़ी कार्यवाहियां हो सकती है जिसे अनुशासनात्मक कार्यवाही की श्रेणी में रखा जायेगा.
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह लगातार इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे नयी पार्टी बनाने की संभावनाओं पर विचार कर रहे है. गुरुवार को भी उन्होंने वृन्दावन में कहा कि नयी पार्टी के लिए नेताजी (मुलायम सिंह) के संकेत का इंतजार है. इसका फैसला उन्हें ही करना है.

शिवपाल यादव ने यह बात पहली बार नहीं कही है. विधान सभा चुनावो के दौरान भी वे अलग पार्टी बनाने की बात करते रहे थे.

समाजवादी पार्टी में जब सत्ता संघर्ष चरम पर था तभी अखिलेश और शिवपाल दो विपरीत ध्रुवो पर खड़े हो गए थे. अखिलेश यादव और शिवपाल का संघर्ष इतना बढा कि उसके शिकार खुद मुलायम सिंह यादव हो गए और स्थापना के समय से ही पार्टी के अध्यक्ष रहे मुलायम सिंह यादव को पार्टी का संरक्षक घोषित करते हुए पद से हटा दिया गया. इसके बाद टिकट बंटवारो में भी शिवपाल यादव हाशिये पर ही रहे. कहा तो यह भी गया कि शिवपाल ने अपने समर्थको को चुनावी मैदान में सपा को हराने के लिए हाशिये पर पड़ी "लोकदल" का सहारा लिया.

सपा की इस अनौपचारिक टूट ने कार्यकर्ताओं और समर्थको को निराश और भ्रमित भी किया नतीजतन विधान सभा चुनावो में सपा की करारी हार हुयी. मगर हार के बाद भी शिवपाल के बोल थमने की बजाय और तेज हो गए. उन्होंने इसे घमंड की हार कहा. उनका निशाना साफ़ तौर पर अखिलेश यादव पर था. कुछ ही दिनों बाद शिवपाल ने फिर हमला बोला और कहा कि जो अपने पिता और बड़ो का सम्मान नहीं करता उसका हश्र बुरा होता है.

शिवपाल को मुलायम की महत्वाकांक्षी छोटी बहु अपर्णा का सहयोग भी मिला और अपर्णा ने भी अखिलेश से अपील कर दी कि वे अब पार्टी को मुलायम सिंह के हवाले कर दें. इसके बाद शुक्रवार को शिवपाल ने भी यही बात दुहरा दी.

दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने भी अपने तेवर कड़े कर लिए हैं. गुरुवार को पार्टी संगठन की बैठक में इस बात के साफ़ संकेत दे दिए गए कि पार्टी अब अखिलेश के नेतृत्व में ही आगे बढ़ेगी और अखिलेश यादव को चुनौती देने वालों के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है. बैठक में यह भी कहा गया कि अलग पार्टी बनाने वाली बाते अनुशासनहीनता की श्रेणी में है और इससे पार्टी की छवि ख़राब हो रही है.

इस बैठक में पार्टी की हर का एक बड़ा कारण बड़े नेताओं द्वारा पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ षड्यंत्र करना और भितरघात भी माना गया. निशाना साफ़ तौर पर शिवपाल यादव ही थे. पार्टी नेताओं ने भिताघात करने वालों पर कड़ी कार्यवाही करने का निवेदन भी शीर्ष नेतृत्व से कर दिया गया.

अब इसके बाद यह तय हो गया है कि सपा में शिवपाल की कोई जगह नहीं बची है. चुनावी हार के बाद महज 47 सीटों पर सिमटी हुयी सपा के टूट की चर्चाएँ भी हुयी. शिवपाल यदि पार्टी के विधायको के साथ अलग होना चाहेंगे तो उन्हें 16 विधायको की जरुरत पड़ेगी . फ़िलहाल तो इस बात की संभावना नहीं दिखाई दे रही. इंतजार सिर्फ इसबात का है कि क्या अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी से शिवपाल को निष्काषित करते हैं या उसके अहले ही शिवपाल यादव खुद पार्टी छोड़ कर अपनी नयी पार्टी की घोषणा कर देते हैं.

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