चुनावी दंगल में हाशिये पर चला गया "विकास" हांफने लगी आचार संहिता

 2017-02-27 08:39:56.0

चुनावी दंगल में हाशिये पर चला गया "विकास" हांफने लगी आचार संहिता

उत्कर्ष सिन्हा 

हर बार की तरह इस बार भी चुनावो के पहले होने वाली विकास की बात चुनावो के दौरान किस तरह हाशिये पर पड़ा हुआ है यह चुनावो के आखिरी दौर के आते आते सबको दिखाई देने लगा है. विकास के दावे करने वाली पार्टियाँ उन्मादी विषयों और जानवरों की आड़ में प्रहार करने लगी हैं. कहां गया विकास ? कहां गयी नोटबंदी ? बेरोजगारी की किसको फिकर ? और गुंडाराज की कौन बात कर रहा है?  जैसे-जैसे यूपी चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे ही सारी पार्टियां अपने पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले पर आ गयी है.इस पूरी कवायद में हर वो नेता शामिल हो गया है जो खुद के सत्ता में आने पर विकास की गंगा बहाने की बात कर रहा है मगर आखिरी दौर तक आते आते वोटरों के जातीय और सांप्रदायिक विभाजन पर सबकी निगाहें लग गयी है.  

उत्तर प्रदेश के बडे़ हिस्से में चुनाव खत्म हो चुका है. बाकी में प्रक्रिया जारी है. तकरीबन सभी पार्टियों ने अपने-अपने घोषणा पत्र में जनता को आकर्षित करने के लिए लुभावने वादे किए. सत्ता में आने पर विकास के साथ सभी वर्गो के उत्थान की बात कही, पर जैसे-जैसे चुनावी घमासान शुरू हुआ पूरी तस्वीर बदल गई. लेकिन जनता जागरूक हो चुकी है. नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं.

चुनाव नजदीक आने के साथ मुद्दे पीछे छूट गए हैं. विकास, देश व प्रदेश के हित की बातें भी धुंधली पड़ने लगी हैं. आखिरी दौर में आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो चुका है. 

अपने पांच साल के विकास के नाम पर चुनावी दंगल में उतरे अखिलेश यादव भी तीसरे चरण तक आते आते इस जाल में फंस गए और "गधो" को ले कर एक बयांन दे डाला. बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो शुरू से जातीय गंठजोड़ का कार्ड खुलेआम खेला था और पूरे चुनावो के दौरान वे इसी पर टिकी भी रही. भारतीय जनता पार्टी ने पहले चरण में ही पश्चिमी यूपी में जब उग्र हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारा तब ही स्पष्ट हो गया था उसका पूरा जोर मतों के धार्मिक आधार पर विभाजन का है. 

मायावती ने भी टिकट वितरण में 99 मुस्लिम उम्म्मेद्वारो को टिकट दे कर योगी जैसे विवादित नेता का महत्त्व भी बढ़ा दिया. दंगो की आग में ३ साल पहले झुलसे पश्चिमी यूपी में मायावती महज सांप्रदायिक आधार पर मतों के विभाजन करवाने की नियत से जब 45 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे तब ही योगी सरीखे नेताओं का इस्तेमाल करने की भाजपा की रणनीति भी बन गयी. योगी ने अपने किसी भाषण में विकास की बातों का जिक्र ही नहीं किया. दरअसल योगी कभी भी विकास के चेहरे रहे ही नहीं. बीते 20 सालों में योगी ने सिर्फ हिंदूवादी राजनीती ही की है और लव जिहाद और घर वापसी जैसे मुद्दे ही उनके राजनितिक संजीवनी रहे हैं. 

भाजपा भी नरेन्द्र मोदी के विकास के नारे से दूर होती जा रही है. दरअसल लोकसभा में चुने गए उसके 73 सांसदों की निष्क्रियता ने ही भाजपा को इस रणनीति पर जाने के लिए मजबूर किया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद भी अपने गोद लिए गाँव में ये संसद कुछ नहीं कर पाए और गरीब महिलाओं के लिए काफी सफल रही उज्ज्वला गैस योजना के अलावा बताने के लिए इनके पास कुछ है भी नहीं. केंद्र की योजनाये यूपी में जमीन पर अभी तक उतर भी नहीं सकी थी और नोत्बंदी के बाद बंद हुए कारोबार की नाराजगी भी बढ़ी हुयी थी. इससे निजात पाने के लिए जरुरी था कि वोटरों को दुसरे आधार पर ध्रुवीकरण किया जाए. 

मायावती ने शुरू से ही अपना एजेंडा और रणनीति साफ़ कर दी थी. दलित मुस्लिम गंठजोड़ बना कर वे एक बड़े मत प्रतिशत पर कब्ज़ा करने में लगी थी. इसके लिए अब्दुल्ला बुखारी से ले कर कल्वे जवाद तक मुस्लिम उलमा से मायावती ने अपीले जारी करवाई. मगर जैसे जैसे मायावती इस राजनीती को बढ़ने लगी वैसे वैसे हिन्दू मतदाता भाजपा की तरफ इकठ्ठा होने लगा. नरेन्द्र मोदी ने भी इसे भांपा और फतेहपुर की अपनी सभा में शमशान बनाम कब्रिस्तान और रमजान बनाम दिवाली का जुमला छोड़ दिया.  

समाजवादी पार्टी और  कांग्रेस के गठबंधन की मुख्य बुनियाद भी मुस्लिम वोटो को एकमुश्त हथियाने की थी. समाजवादी पार्टी में गलत समय पर छोड़े घमासान के कारण अखिलेश यादव के पास भी इस बात का समय ही नहीं बचा की वे पुरे सूबे में घूम कर अपनी विकास परियोजनाओं के बारे में एक जनमत तैयार कर सके नतीजतन वे भी वोटो के समीकरण साधने में लग गए.     
लेकिन क्या यूपी की 20 करोड़ की जनता की कोई और मुश्किलें नही हैं. क्या बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था से लोगों का ध्यान हटाया जा रहा है. क्या राजनीती में अपराधीकरण मुद्दा नहीं है? क्या सडके, बिजली, गरीबो के कल्यांण  की योजना मुद्दा नहीं है? क्या भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है ?    

इस बार यूपी के चुनावो में जो एक चीज सामने आ रही है वो ये कि मुद्दों से कहीं ज्‍यादा बात हो रही है शख्‍स‍ियतों पर. अगर आप बात करते हैं नोटबंदी की तो बात घूम-फिरकर पीएम नरेंद्र मोदी पर आ जाती है. अगर बात समाजवादी पार्टी की हो तो बात घूमकर आपसी कलह से बाहर निकले अखिलेश यादव की शख्सियत पर आ जाती है. नरेन्द्र मोदी को जादूगर और झूठा बताया जा रहा है और अखिलेश यादव को अपने पिता को धोखा देने वाला. विकास के मुद्दों पर  भी कई बार बात करते करते झूठे आंकड़े भी पेश कर दिए जा रहे हैं. दरअसल ये वो बदलाव है जो चुनाव को जनता के मुद्दों से हटा कर पर्सनालिटी मैनेजमेंट की तरफ लेता जा रहा है. सोशल मीडिया पर रोज नए हैश टैग आ रहे हैं जिसमे कई बार अपमानित करने वाले शब्द भी होते हैं.   

चुनावी मैदान में पहली बार अकेले उतरे अखिलेश यादव शुरू में तो संयत रहे मगर तीसरा चरण आते आते उनकी भी जुबान फिसल गयी और अमिताभ बच्चन को दी गयी नसीहत के जरिये उन्होंने अमित शाह और नरेन्द्र मोदी को "गधा" की संज्ञा दे दी. हलाकि अखिलेश उसके बाद सम्हले और फिर वे नरेन्द्र मोदी को विकास के अजेंडे पर बहस करने की चुनौती देने लगे और इसके लिए "नोट बंदी" के बीच बैंक में जन्मे बच्चे "खजांची" के गाँव और गंगा के तट का स्थान भी पेश कर दिया मगर तब तक बहस की धारा बदल चुकी थी.  

चुनावी सीजन आते ही नेताओं की गंदी बात शुरू हो गई. चाल चरित्र और चेहरा की बात करने वाली पार्टी बीजेपी के नेता विनय कटियार ने प्रियंका गांधी पर निशाना साधा .प्रियंका के यूपी की राजनीति में उतरने के सवाल के जवाब में कटियार का कहना है कि प्रियंका से भी ज्यादा सुंदर स्टार प्रचारक हैंऔर उनके प्रचार में उतरने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. प्रियंका के आने से क्या होगा प्रियंका से ज़्यादा और भी सुंदर महिलाए रही हैं जो स्टार कैंपेनर हैं, हिरोइन हैं और भी सुंदर महिलाएं हैं.

इसके बाद सांप्रदायिक टिप्पणिया भी शुरू हो गयी.  यूपी के थाना भवन सीट से बीजेपी के उम्मीदवार सुरेश राणा ने एक चुनावी रैली के दौरान कहा कि अगर वह जीत गए तो कैराना, देवबंद और मुरादाबाद में कर्फ़्यू लगा देंगे. बता दें कि कैराना, देवबंद और मुरादाबाद मुस्लिम बहुल इलाके हैं. और सुरेश राणा मुजफ्फर नगर दंगो के समय सुर्ख़ियों में आये थे. इसके बाद संजीव बालियाँ मैदान में कूदे और मुलायम सिंह यादव पर टिपण्णी कर दी. बालियान ने कहा, " मुलायम ने हमेशा सांप्रदायिकता की राजनीति की. मैं उनसे कहना चाहूंगा अब तो मरने का समय आ गया, जीने का समय रहा नहीं."

नेताओं के नीचे गिरने का सिलसिला यही नहीं थमा. भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने सोनिया गांधी और बीएसपी प्रमुख मायावती के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. बिधुड़ी ने कहा, एक बच्चे के जन्म के लिए 9-10 महीने तक इंतेज़ार किया जाता है. पांच सात महीने में बहु के साथ बच्चा आ जाए तो कैसा लगेगा? अब ये संस्कार तो कांग्रेस और मायावती के खानदान में होते होंगे. भारतीय संस्कृति में तो ये संस्कार नहीं.

हालाकि सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए चुनाव के दौरान जाति, धर्म और भाषा के नाम पर वोट मागने को गलत बताया है. इस फैसले के अनुसार मतदाता को धर्म और जाति के नाम का प्रलोभन देकर कोई नेता वोट नहीं ले सकता है. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बावजूद भी नेताओं की जुबान पर लगाम नहीं लग सकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि नेताओं के लिए धर्म के नाम पर वोट मांगने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं है. इसके लिए उसका नाम और इशारा ही काफी है. और इस बार ये इशारे साफ़ दिखाई दे रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले ही अब आया हो मगर चुनाव आयोग की इस तरह की गाइड लाइन पहले से मौजूद है. जिसमें उल्लेख किया गया है कि कोई भी दल मतदाता को प्रभावित करने के लिए जाति का इस्तेमाल नहीं करेगा। बावजूद इसके चुनाव के समय वोटरों को रिझाने के लिए बड़े-बड़े दल और उनके नेता धर्म और जाति के नाम पर ही वोट मांगते हैं.

चुनाव के समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सख्ती से लागू करवाना चुनाव आयोग के लिये बड़ी चुनौती है इसके लिए न सिर्फ कड़े दंड का प्राविधान होना आवश्यक है, बल्कि मजबूत सुरक्षा तंत्र की भी जरूरत है. ज्यादातर राजनेता अपने भाषणों में धर्म-जाति को बढ़ावा देने की बात करते हैं. इसे साबित करने के लिए सबूत और गवाह की आवश्यकता होती है. जब मीडिया इसको सामने लाती है तो वे तोड़मरोड़ कर बयान पेश करने की बात कहते हैं. 
बीते लोकसभा चुनावो में थोड़ी सख्ती आयोग ने जरूर दिखाई थी और समाज में कटुता फैलाने एवं उन्मादी भाषणों पर भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी नेता आजम खान की रैलियों पर रोक लगा दी थी. मगर इस बार ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है. 

जाहिर सी बात है की मतदान के पहले ये बिगड़े बोल न सिर्फ आचार संहिता का मखौल उठाते हैं बल्कि विकास के सवाल पर बहस करने का भी हर रास्ता बंद कर देते हैं और इस बार भी यही हो रहा है.  

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