Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद नहीं रहे

 Sabahat Vijeta |  2016-04-22 15:01:55.0

तहलका न्यूज़ ब्यूरो


Malikzada-Manzoor-Ahmadलखनऊ, 22 अप्रैल. अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के शायर मलिकजादा मंजूर अहमद का आज लखनऊ में निधन हो गया. वह 91 साल के थे और पिछले काफी समय से बीमार चल रहे थे. उनका आज दोपहर करीब दो बजे उन्होंने जगरानी अस्पताल में अपनी आख़री सांस ली.


देश-दुनिया में अपनी शानदार शायरी और मुशायरों के शानदार संचालन के लिए उन्हें पहचाना जाता था. मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद मूल रूप से अम्बेडकरनगर के किछौछा के रहने वाले थे. अपने पीछे वह छह बेटियां और दो बेटे छोड़ गए हैं. उनके बेटे मलिकज़ादा जावेद को भी अच्छे शायरों में गिना जाता है.


लखनऊ यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर रहे मलिकज़ादा साहब उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने कई किताबें भी लिखीं. उर्दू का मसला और कालेज गर्ल उनकी चर्चित किताबों में से हैं.


मलिकजादा मंजूर अहमद के निधन पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने गहरा दुख व्यक्त किया है. राज्यपाल ने अपने शोक संदेश में कहा कि श्री मलिकजादा मंजूर उर्दू के विकास एवं प्रसार के लिए हमेशा प्रयासरत रहे. उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं. श्री मंजूर के निधन से उर्दू जगत को अपूर्णनीय क्षति हुई है.


स्वर्गीय मलिकज़ादा को लखनऊ के खुर्रमनगर स्थित फातमी मस्जिद कब्रिस्तान में सिपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा.


मलिकज़ादा साहब की एक ग़ज़ल जो याद रहेगी 



तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है
वो अब भी पांबद-ए-वफ़ा हो ऐसा भी हो सकता है


दरवाज़े पर आहट सुन कर उस की तरफ़ क्यूँ ध्यान गया
आने वाली सिर्फ़ हवा हो ऐसा भी हो सकता है


हाल-ए-परेशां सुन कर मेरा आँख में उस की आँसू हैं
मैं ने उस से झूट कहा हो ऐसा भी हो सकता है


अर्ज़-ए-तलब पर उस की चुप से जाहिर है इंकार मगर
शायद वो कुछ सोच रहा हो ऐसा भी हो सकता है


हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ धुआँ था बर्क़ पे क्यूँ इल्ज़ाम रखें
आतिश-ए-गुल से बाग़ जला हो ऐसा भी हो सकता है


ख़ून बहाना उस का शेवा है तो सही ‘मंजूर’ मगर
हाथ पे उस के रंग-ए-हिना हो ऐसा भी हो सकता है

Tags:    

  Similar Posts

Share it
Share it
Share it
Top