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मालेगांव मिस्ट्री : फाईल से गायब थे गवाहों के अहम् बयान !

 Tahlka News |  2016-05-14 08:49:49.0

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तहलका न्यूज़ ब्यूरो

मुम्बई. मालेगाव धमाको में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट मिलने के मामले में एक नया मोड़ आ गया है. इस मामले में कई गवाहों के अहम् बयान सरकारी फाईलों से गायब बताये जा रहे थे .

इस मामले में लम्बे समय से जेल में बंद प्रज्ञा ठाकुर को अदालत ने क्लीन चिट दे दी है मगर केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही इस मामले में कई जिम्मेदार अधिकारीयों को बदलने पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं.

साल 2008 के महाराष्ट्र के मालेगांव बम धमाका मामले में कुछ गवाहों के इकबालिया बयान यहां की विशेष मकोका अदालत से गायब बताए गए , जिससे अधिकारियों ने दस्तावेजों की तलाश शुरू कर दी थी .


यह मुद्दा अप्रैल महीने में तब सामने आया था जब विशेष अदालत के कर्मियों ने पूर्व विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सैलिएन से संपर्क कर जानना चाहा कि क्या इस मामले के कुछ गवाहों के इकबालिया बयानों वाले दस्तावेज उनके पास हैं.”

आउटलुक पत्रिका में छपी एक खबर के अनुसार सैलिएन ने कहा, मैं चौंक गई जब मुझसे ऐसा सवाल किया गया. अदालत के कर्मियों ने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास उन छह-सात अहम गवाहों की ओर से मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयान वाले दस्तावेज हैं. उन्होंने बताया, मैंने उन्हें कहा कि एनआईए अधिकारियों की मौजूदगी में सारे दस्तावेज नए विशेष लोक अभियोजक अविनाश रासल को सौंप दिए गए थे और ऐसे भी सारे मूल दस्तावेज तो अदालत में ही थे.

जिन गवाहों के बयान गायब बताए जा रहे हैं उनमें रामजी कलसांगरा के एक करीबी सहयोगी का भी बयान शामिल है जिसने एक मजिस्ट्रेट के सामने कबूल किया था कि महाराष्ट्र के मालेगांव में विस्फोटक रखने के लिए आपराधिक साजिश रची गई थी.

29 सितंबर, 2008 को हुए दो कम तीव्रता वाले बम धमाकों में सात लोग मारे गए थे. मामले की जांच सबसे पहले महाराष्ट्र एटीएस ने शुरू की. फिर जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया गया और 2011 में यह जिम्मेदारी एनआईए को दे दी गई. एनआईए ने इस मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और भारतीय थलसेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित एक दर्जन आरोपियों को गिरफ्तार किया था.

रासल ने कहा था कि फाइलें गायब नहीं हैं और हो सकता कि वे इधर-उधर रख दी गई हों. हम उनकी तलाश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यदि दस्तावेज नहीं मिल पाते हैं तो एनआईए अदालत की अनुमति लेकर उन्हीं बयानों की फोटो प्रति कराएगी और उन्हें द्वितीयक प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल करेगी.

सैलिएन ने कहा था कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज किए गए बयान हमेशा प्राथमिक सबूत होते हैं और फाइलों के गायब होने से केस पर असर पड़ सकता है.

इस मामले में पूर्व अभियोजक रही सैलिएन ने तब भी यह कहा था कि उनपर केस को कमजोर करने का बहुत दबाव पड़ रहा है और इसके बाद उन्होंने अपना पद छोड़ दिया था.

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