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VIDEO:करवाती थीं दाह संस्कार, अफसर से कहा था कभी दें सेवा का मौका

 Anurag Tiwari |  2016-06-05 08:09:02.0

[caption id="attachment_86042" align="aligncenter" width="1024"]Maharajin Bua, Gulab Maharajin, Allahabad, Rasulabad, Crematorium फाइल फोटो गुलाब महाराजिन मंदिर में पूजा करते हुए[/caption]

तहलका न्यूज़ ब्यूरो

इलाहबाद. धर्मनगरी प्रयाग के श्मशानघाट रसूलाबाद पर कभी दाह संस्कार के प्रक्रिया पूरी करवाने वाली महाराजिन बुआ की जिंदगी से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं। एक बार उन्होंने मजाक में इलाहाबाद में तैनात एक अफसर को यहाँ तक कह दिया कि वे भी कभी सेवा का मौका दें।

अफसर रह गए थे शॉक्ड



इलाहाबाद में तैनात रहे कुछ ज्यूडिसियल अफसर बताते हैं कि उनकी तैनाती के दौर में एक विभाग के अफसर को अपने विभाग से सम्बंधित लोगों के लिए महीने दो महीने पर रसूलाबाद पर अंतिम संस्कार के इंतजाम करते रहना पड़ता था। इस दौरान महाराजिन बुआ उन्हें अच्छी तरह से पहचान गईं थी। एक दिन मजाक में ही महाराजिन बुआ ने उस अफसर से कहा, ‘साहब, आप सबकी सेवा करते हैं, कभी अपनी सेवा का भी मौक़ा दें।” यह सुनकर पहले तो वो अफसर शॉक्ड रह गए, लेकिन बाद में उन्होंने भी मजाक के लहजे में जवाब दिया कि एक दिन तो सभी को यहीं आना है। अब इसे संयोग कहें या विधि का लेखा, इसके घटना के बाद उन अफसर का इलाहाबाद से ट्रान्सफर हो गया और नई पोस्टिंग के दौरान उनका निधन एक रोड एक्सीडेंट में हो गया। दुर्भाग्य से उनकी अंतिम सेवा का मौअका महाराजिन बुआ को नहीं मिला।

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महाराजिन बुआ की जिंदगी पर बनेगी फिल्म

एक न्यूज़ पोर्टल के अनुसार इलाहाबाद के रहने वाले बॉलीवुड और टेलीविज़न एक्टर दीपराज राणा अब महाराजिन बुआ की संघर्ष भरी जिन्दगी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारेंगे। रसूलाबाद के पास ही शिवकुटी के रहने वाले राणा के अनुसार उन्हें यह आईडिया मसान फिल्म देखकर आया। दीपराज राणा के मुताबिक़ मारजिन बुआ ने उनके दादा-परदादाओं का भी अंतिम संस्कार करवाया है। उन्होंने जब महाराजिन बुआ को अंतिम संस्कार करते देखा तो उन्हें बुआ की पर्सनालिटी बहुत दमदार दिखी। तब उन्हें इस बात की प्रेरणा मिली कि उनके जीवन पर फिल्म बनाकर उनके स्ट्रगल की कहानी दुनिया को दिखानी चाहिए।

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ससुर के विरोध के बाद भी महाराजिन बुआ ने अपनाया यह काम
बुआ का असली नाम गुलाब था और वे अपने 7 भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं। इलाहाबाद के चकिया रहने वाले उनके पिता लक्ष्मी नारायण मिश्र पुरोहित का काम करते थे। उस समय केवल 7 साल की उम्र में महाराजिन बुआ की शादी अरैल के शंकरजी त्रिपाठी के साथ कर दी गई। शादी के तीन साल बाद 10 साल की उम्र में उनका गौना-विदाई हुई।

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डाक्यूमेंट्री में बयान की थी अपने जीवन की संघर्ष गाथा

बिक्रम सिंह द्वारा पीएसबीटी के लिए बनाई गई डॉक्युमेंट्री में बताया था कि पिता लक्ष्मी नारायण मिश्रा के निधन के बाद, उनके साथ काम करने वालों ने उनकी रियासत हथिया ली। इसे देखकर वे विचलित हो गईं और मन में ठान ली कि वे अपनी पिता की विरासत और रियासत वापस लेकर रहेंगी। उन्होंने इस बारे में अपने ससुर से चर्चा की और उनसे इजाजत मांगी। उनके सौर ने उनकी छोटी उम्र का हवाला देते हुए इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं संभालने के लिए इजाजत देने से इनकार कर दिया।उन्होंने कहा कि उनकी उम्र बड़ी छोटी है और ऐसे में काम सम्हालना मुश्किल होगा और परिवार की बदनामी भी होगी। इस पर महाराजिन बुआ ने उनका अंगोछा अपने कंधे पर रखा और प्रण किया कि वे कभी अपने ससुर की इज्जत पर आंच नहीं आने देंगी।

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80 साल में कराए करीब 14 लाख दाह संस्कार


महाराजिन बुआ ने 10 साल की उम्र में जो दाह संस्कार कराने का सिलसिला शुरू किया वह उनकी 91 साल की उम्र में हुई मौत के बाद ही रुका।  इन अस्सी सालों के दौरान उन्होंने 13 लाख 84 हजार डाह संस्कार कराए। इस दौरान उन्होंने सारे कर्मकांड और चिता जलाने का काम वो खुद ही किया। बुआ का निधन साल 2002 में 91 साल की उम्र में हुआ।

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वीडियो में देखें महाराजिन बुआ ने शेयर की अपने संघर्ष की दास्तान

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