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ज़िन्दगी जीने की कला सिखा गया “माँ मुझे टैगोर बना दो”

 Sabahat Vijeta |  2016-11-13 16:33:56.0

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शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. गरीबी से जूझते परिवार के बच्चे पढ़ना चाहते हैं. ज़िन्दगी में अपना अलग मुकाम बनाना चाहते हैं लेकिन जो साधन सम्पन्न हैं. जिनके माँ-बाप अपनी मेहनत की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं वही बच्चे पढ़ने से कोसों दूर भागते हैं. वक़्त जिन्हें सही वक्त पर शिक्षा की अहमियत समझा देता है वही टैगोर बन जाते हैं. यह शिक्षा आज भारतेंदु नाट्य अकादमी के थ्रस्ट थियेटर के प्रेक्षाग्रह में युवा कलाकार लकी ने अपने नाटक माँ मुझे टैगोर बना दो के ज़रिये समझा दिया.


दो दशक पहले आशीष विद्यार्थी ने एकल अभिनय के ज़रिये दयाशंकर की डायरी को जिस खूबी से पेश किया था. उन खूबियों का लकी ने आज बखूबी इस्तेमाल किया. फर्क यह था की आशीष विद्यार्थी ने ढेर सारे किरदार अकेले निभाये थे. साथ ही वह स्टार भी थे लेकिन लकी मेहता ने दर्शकों को इस नाटक का हिस्सा बनाकर कमाल कर दिया. जम्मू के लकी 23 प्रदेशों के 600 शहरों में इस नाटक के 1000 शो कर चुके हैं.


दिल और दिमाग दोनों को झकझोर देने वाला यह नाटक ढेर सारे रंगों से सजा नाटक था. यह नाटक अपनी गति में चलता है. कभी होठों पर मुस्कान लाता है तो कभी आँखों के किनारों को भिगो देता है तो कभी हथेलियों को मजबूर कर देता है कि वह तालियाँ बजाएं.


इस नाटक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें नाटक देखने आये दर्शक खुद इसके पात्र बन जाते हैं उन्हें इसका अहसास आखीर तक नहीं हो पाता. वह इस नाटक से इस हद तक जुड़ जाते हैं कि उन्हें यह अहसास होता है कि जैसे वह मंच पर अपनी ही कहानी देख रहे हैं.


मोहन भंडारी की कहानी के थीम को लेकर लकी ने “माँ मुझे टैगोर बना दो” को नाटक के फ्रेम में जड़ दिया. खुद निर्देशन भी किया और अभिनय भी.


इस नाटक की विशेषता यह है कि लकी अकेले अभिनेता थे. कहानी की मांग के हिसाब से वह दर्शकों के बीच से किरदार चुनते रहे और कहानी की गति को बनाए रहे.


हाई स्कूल में 94 फीसदी नम्बर लाने वाला मजदूर का बेटा आगे पढ़ाई करना चाहता है लेकिन उसका मजदूर पिता यह चाहता है कि वह पढ़ाई छोड़कर उसके साथ मजदूरी करे और 140 रुपये रोज़ कमाए. वह पिता का अपमान नहीं कर सकता लेकिन अपने अरमानों का खून भी नहीं कर सकता. दो दिन वह मजदूरी कर पिता को खुश कर देता है. फिर उन्हें यह अहसास कराता है कि इतने ही नम्बर बारहवीं में भी लाया तो 25 हज़ार स्कालरशिप मिलेगी जो इस मजदूरी से बहुत ज्यादा है. पिता की इजाज़त से पढ़ाई शुरू होती है. पहला पेपर हिन्दी का है और वह दो घंटे में ही उसे खत्म कर घर लौटता है तो पता चलता है कि काम के दौरान हुई दुर्घटना में पिता की मृत्यु हो गई है.


बाप की मौत से सपने टूट जाते हैं. परीक्षा छूट जाती है. फिर समय आता है. माँ की प्रेरणा से वह फिर फ़ार्म भरता है. समय का रथ उसकी मेहनत का साथ पाकर उसकी मंजिल तक पहुंचा देता है.


इस नाटक ने अपने दर्शकों को ढेर सारे सन्देश दे डाले. पिता गलत कहे या सही- उनसे बहस नहीं करना है. चाकलेट पर सैकड़ों रूपये खर्च करने वाले बच्चे सिर्फ अपनी चाकलेट के पैसों से किसी गरीब को किताबें दिला सकते हैं. समय पर पढ़ाई नहीं की तो उसका कोई मोल नहीं. माँ वह ताक़त है जिसके क़दमों में लेटकर यह अहसास होता है जैसे बड़ी नदी की गोद में कोई छोटी नदी हो. टीचर का सम्मान इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वह खुद भले टैगोर न बन पाए लेकिन अपने जीवन में सैकड़ों टैगोर बना देता है.

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