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अद्भुत यू.के.एस.चौहान की अद्भुत शोकसभा, फूल चढ़े पर नाता नहीं टूटा

 Sabahat Vijeta |  2016-05-06 13:49:28.0

shoksabhaशबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में आज यू.के.एस.चौहान की स्मृतियाँ साझा की गईं. इस प्रेस क्लब और क्लब से जुड़े पत्रकारों से स्वर्गीय चौहान का बहुत क़रीब का रिश्ता था. वह केरल कैडर के आई.ए.एस. अधिकारी थे. यूपी में क़रीब पांच साल प्रतिनियुक्ति पर तैनात रहे. इस दौरान सूचना निदेशक भी रहे. इसके बाद दिल्ली चले गए. दिल्ली में रहते हुए भी उनका लखनऊ से नाता नहीं टूटा. लखनऊ से रिश्ते बने रहने की दो ख़ास वजहें रहीं. पहली तो यह कि वह इसी शहर के बंथरा इलाके के दादूपुर के रहने वाले थे इसलिए यहाँ आना लगा ही रहता था. दूसरे वह इतना संवेदनशील थे कि जिससे भी उनका रिश्ता बनता उससे दिल का रिश्ता बन जाता था.


Umesh-Chauhanप्रेस क्लब में उनकी स्मृतियों को साझा करने के लिए आज शोक सभा हुई तो उनके साथ काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारी राकेश ओझा और बाबा हरदेव भी श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुंचे. सूचना विभाग में उनके साथ काम कर चुके उप निदेशक डॉ. वजाहत हुसैन रिज़वी भी यहाँ मौजूद रहे. उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, प्रेस क्लब के अध्यक्ष रवीन्द्र सिंह, सचिव जे.पी.तिवारी, उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी और मीडिया मंच के सम्पादक तेज बहादुर सिंह भी मौजूद रहे.


यू.के.एस. चौहान की शोक सभा दूसरी शोक सभाओं से अलग थी. इसमें वह लोग शामिल थे जिनसे चौहान साहब से दिल का रिश्ता था. कई वक्ता बोलते वक़्त भावुक हुए. कई की ज़बान से आवाज़ नहीं निकली. वक्ताओं ने उन्हें विलक्षण प्रतिभा वाला अद्भुत शख्स करार दिया. सेवा निवृत्त आई.ए.एस. राकेश ओझा ने स्वर्गीय चौहान से जुड़ी कई यादें यहाँ साझा कीं. उन्होंने बताया कि जब चौहान साहब निदेशक सूचना थे तब वह गवर्नर के विशेष सचिव हुआ करते थे. तब जो तालमेल बना वह हमेशा चलता रहा. वह व्हाट्सअप पर अपनी कविताओं के ज़रिये बहुत सक्रिय रहते थे. वह इतना सक्रिय रहते थे कि कभी उनकी बीमारी का पता ही नहीं चल पाया.


श्री ओझा ने बताया कि जब यू.के.एस.चौहान केरल में डीएम थे तब उन्हें सूचना मिली कि वहां ताड़ी निकालने का काम खत्म होता जा रहा है. इस वजह से बेरोजगारी बढ़ रही है. श्री चौहान से लोगों ने अनुरोध किया कि वह केरल के बेरोजगारों को प्रेरित करें. चौहान साहब ने युवाओं को प्रेरित करने का अनोखा तरीका निकला. उन्होंने ताड़ के पेड़ पर चढ़ना सीखा और उसके बाद पेड़ से ताड़ी निकालकर बेरोजगारों को प्रेरित किया. उन्होंने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में वह इतना सक्रिय थे कि म्रत्यु से ठीक एक दिन पहले उन्होंने फेसबुक पर एक कविता पोस्ट की थी.


उप निदेशक सूचना डॉ. वजाहत हुसैन रिज़वी ने स्वर्गीय चौहान के साथ किये गए काम के दिनों को याद किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में बड़ा काम किया. वह अच्छे अधिकारी ही नहीं अच्छे इंसान भी थे. डॉ. रिज़वी ने बताया कि राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की स्थापना में भी चौहान साहब का बहुत बड़ा योगदान था.


वरिष्ठ पत्रकार और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने यू.के.एस. चौहान को अपना अभिन्न बताते हुए उनसे जुड़ी बहुत सी स्मृतियों को साझा किया. उन्होंने बताया कि वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह के फोन से इस दुखद घटना की सूचना मिली. उन्होंने कहा कि श्री चौहान दिव्य आत्मा थे और दिव्य आत्मा ही रहेंगे. केरल में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने मलयालम सीखी और तमाम मलयाली कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया. लखनऊ में गंजिंग कार्निवाल शुरू हुआ तो वह परिवार के साथ उसमें शरीक हुए और रिक्शे की सवारी की. श्री तिवारी ने कहा कि मुझे सवा साल से पता था कि उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो चुकी है लेकिन मैंने कभी उनके सामने इस बात को ज़ाहिर नहीं किया. वह भी पूरे उत्साह के साथ मिलते रहे और बीच में अपनी बीमारी नहीं आने दी.


पीसीएस एसोसियेशन के अध्यक्ष रहे बाबा हरदेव ने इस मौके पर स्वर्गीय चौहान से जुड़ी बहुत सी बातें याद कीं. उन्होंने कहा कि सूचना निदेशक बनने के बाद उनके हर स्तर के पत्रकारों से रिश्ते बने. यह रिश्ते ज़िन्दगी भर चलते रहे. विशेष सचिव गृह कर्ण सिंह चौहान से स्वर्गीय चौहान को विलक्षण प्रतिभा का बताते हुए उनके साथ अपने रिश्तों की बात की. दोनों एक साथ पीसीएस में सेलेक्ट होकर उत्तराखंड में नियुक्ति पाए थे. बाद में दोनों ही आई.ए.एस. बन गए. दोनों की अलग-अलग जगह तैनाती हो गई लेकिन रिश्ते बने रहे.


वरिष्ठ पत्रकार पी,के.तिवारी ने उन्हें संवेदनशील और विलक्षण प्रतिभा वाला व्यक्ति बताया. उन्होंने कहा कि उनकी गाँव की प्रष्ठभूमि थी इसलिए गाँव की समस्याओं से अच्छी तरह से वाकिफ थे. उनकी समस्याओं के हल के विषय में सोचा करते थे. वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र सिंह ने कहा कि उनके साथ घरेलू रिश्ते थे. कभी प्रशासनिक अधिकारी की तरह से वह मिले ही नहीं. हसीब सिद्दीकी ने कहा कि ऐसे कम अधिकारी हैं जो साहित्य में इतनी रुचि लेते हैं.

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