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जानकी वल्लभ शास्त्री का काव्य संसार व्यापक

 Tahlka News |  2016-04-06 04:28:05.0

जानकी वल्लभ शास्त्री


मनोज पाठक


पटना, 6 अप्रैल. छायावाद के अंतिम स्तंभ माने जाने वाले सुविख्यात कवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, उन थोड़े-से कवियों में रहे हैं, जिन्हें हिंदी कविता के पाठकों से बहुत मान-सम्मान मिला है। आचार्य का काव्य संसार विविध और व्यापक है।

प्रारंभ में उन्होंने संस्कृत में कविताएं लिखीं। इसके बाद महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी भाषा में अपनी लेखनी को मजबूत किया। आचार्य की विभिन्न विधाओं में जितनी रचनाएं प्रकाशित हैं, उनसे अधिक उनकी अप्रकाशित कृतियां हैं।


वर्ष 1916 में बिहार के गया के मैरवा में जन्मे शास्त्री ने मुजफ्फरपुर को अपनी कर्मस्थली बनाई। वह यहां वर्ष 1939 में संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में आए थे। इसके बाद उन्होंने राम दयालु सिंह महाविद्यालय में हिंदी और संस्कृत के विभागाध्यक्ष के रूप में काम की थी। यहीं से उन्होंने 1978 में अवकाश ग्रहण किया।

आचार्य 7 अप्रैल, 2011 की रात साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी शून्यता छोड़ विदा हो गए।

उनके साहित्य के प्रति रुझान को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने 16 वर्ष की उम्र में ही संस्कृत भाषा में अपनी पहली पुस्तक 'काकली' लिखी थी। इसके बाद तो वह साहित्य की दुनिया को कई अनमोल तोहफे दिए। इससे प्रभावित होकर उनसे मिलने सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' भी उनसे मुलाकात की थी और उसके बाद तो आचार्य की लेखनी चल पड़ी।

बिहार के चर्चित साहित्यकार संजय पंकज ने आईएएनएस से कहा, "आचार्य ने अपनी कृतियों में सत्य, सौंदर्य और शाश्वत को प्रमुखता दी है। उनकी रचनाएं कपोल कल्पनाएं से काफी दूर रही।"

पंकज बताते हैं कि मुजफ्फरपुर स्थित 'निराला निकेतन' में छायावाद के अंतिम स्तंभ हिंदी के मूर्धन्य कवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने अपने जीवन के अंतिम पल गुजारे थे। शास्त्री के जीवनकाल में निराला निकेतन में साहित्यकारों का जमावड़ा लगाता था, जिसमें उनके कुत्तों, गायों और बिल्लियों और उनकी विचित्र जीवनशैली तक की चर्चा होती थी।

उन्होंने बताया कि उनकी मृत्यु के बाद से ही प्रत्येक महीने के सात तारीख को 'निराला निकेतन' में 'महावाणी स्मरण' का आयोजन किया जाता है, जिसमें शास्त्री जी की कृतियों का गान किया जाता है।

उनकी पड़ोसी रहीं साहित्यकार डॉ़ रश्मि रेखा कहती हैं, "वह तो मेरे पिता के समान थे। उनकी रचना का कोई सानी नहीं। आचार्य जानते थे कि वह एक दिन चले जाएंगे। उन्होंने लिखा है- तन चला संग, पर प्राण रह जाते हैं! जिनको पाकर था बेसुध, मस्त हुआ मैं, उगते ही उगते, देखो, मस्त हुआ मैं।"

वह बताती हैं कि आचार्य अपनी पत्नी छाया देवी को काफी प्यार किया करते थे। उनका आवास निराला निकेतन उनके समय में हिंदी प्रमियों का तीर्थ बना रहता था।

रश्मि रेखा बताती हैं कि आचार्य को मृत्यु का भान पहले हो गया था। मृत्यु के पूर्व उन्होंने अपनी पत्नी छाया देवी से कहा था, "मेरे पास आकर बैठिए, अब मैं चल रहा हूं।"

मूर्धन्य साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य 1935 से 1945 के बीच 55 कहानियां लिखीं। साथ ही उन्होंने कई पुस्तकों और पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

आचार्य की मुख्य रचनाओं में 'रूप-अरूप', 'तीर-तरंग', 'शिप्रा', 'मेघगीत', 'अवंतिका', 'धूप दुपहर की' (गजल संग्रह) के अलावा 'दो तिनकों का घोंसला' और 'एक किरण : सौ झाइयां' काफी प्रसिद्ध रहीं। उन्होंने नाटक, गीत-नाट्य, ललित निबंध, संस्मरण और आत्मकथा भी साहित्य संसार को दी।

पंकज बताते हैं कि शास्त्री जी की अनमोल कृति 'राधा' सात खंडों में विभक्त है। उनकी जितनी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं, उससे ज्यादा उनकी कृतियां अप्रकाशित हैं। इनमें नाट्य संग्रह, गीत, गजल भी शामिल हैं।

साहित्य में उनके अहम योगदान के लिए दयावती पुरस्कार, राजेंद्र शिखर सम्मान, भारत भारती सम्मान, साधना सम्मान और शिवपूजन सहाय सम्मान से नवाजा गया, लेकिन वर्ष 2010 में पद्मश्री लेने से उन्होंने इन्कार कर दिया था।


(आईएएनएस)

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