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कटहल की तरह फूला था पेट तो रेलवे ने ट्रेनों में शुरू की TOILET की सुविधा

 Tahlka News |  2016-05-16 11:02:40.0

OLD STEAM ENGINE TRAIN

तहलका न्यूज़ डेस्क

लखनऊ. हाल ही में भारत में ट्रेनों के चलने के 163 साल बाद लोको पायलट्स को ट्रेन के इंजन में टॉयलेट की सुविधा मिली. आपको जानकार आश्चर्य होगा कि ट्रेनों की शुरुआत होने के 50 साल तक भारत की ट्रेनों में टॉयलेट की सुविधा नहीं थी। जब एक पैसेंजर ने अपनी ट्रेन जर्नी के दौरान अपने पेट खराब होने की दास्तान रेलवे को लिखी थी, तब जाकर रेलवे ने ट्रेनों के कोचेस में टॉयलेट की सुविधा दी थी।

117 साल पहले मिला था खत रेलवे को


रेलवे को अपने कष्ट के बारे में खत लिखने वाले बिहार के ओखिल चन्द्र सेन थे। उन्होंने यह खत 1909 में रेलवे के साहिबगंज डिवीजनल कार्यालय को लिखा था। जिसके बाद ही ट्रेनों में टॉयलेट बनाने का प्रपोजल लाया गया था। यह खत आज भी इंडियन रेलवे के इतिहास में एक अहम हिसा और दिल्ली के नेशनल रेलवे म्यूजियम में सुरक्षित रखा है।

खत की भी मजेदार अंग्रेजी में
ओखिल बाबू ने यह खत बड़े ही दिलचस्प अंग्रेजी में लिखा था। उन्होंने जिस तरह खत लिखा, उससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि रेलवे के अफसर हंसने के साथ-साथ पैसेंजर्स की परेशानी समझने को मजबूर हुए होंगे। पढ़िए ओखिल चन्द्र सेन के वह अंग्रेजी खत का मजमून जिसमें उन्होंने अपनी जर्नी के दौरान टॉयलेट न होने की वजह से होने वाली परेशानी का जिक्र किया है।

“I am arrive by passenger train Ahmedpur station and my belly is too much swelling with jackfruit. I am therefore went to privy. Just I doing the nuisance that guard making whistle blow for train to go off and I am running with ‘lotah’ in one hand and ‘dhoti’ in the next when I am fall over and expose all my shocking to man and female women on plateform. I am got leaved at Ahmedpur station.

“This too much bad, if passenger go to make dung that dam guard not wait train five minutes for him. I am therefore pray your honour to make big fine on that guard for public sake. Otherwise I am making big report! to papers.”


okhil

इसका हिंदी ट्रांसलेशन कुछ ऐसा होगा
“मैं पैसेंजर ट्रेन से अहमदपुर स्टेशन  आया और मेरा पेट कटहल की तरह फूल रहा था। मैं शौच के लिए वहां एकांत में गया। मैं शौच से निवृत्त हो ही रहा था कि ट्रेन चल पड़ी। मैं एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में धोती पकड़कर दौड़ा, लेकिन रेल पटरी पर गिर पड़ा। मेरी धोती खुल गई और मुझे वहां मौजूद सभी महिला-पुरुषों के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। मेरी ट्रेन छूट गई और मैं अहमदपुर स्टेशन पर ही रह गया। यह बहुत बुरा है कि जब कोई व्यक्ति टॉयलेट के लिए जाता है तो क्या गार्ड ट्रेन को पांच मिनट भी नहीं रोक सकता।
मैं आपके अधिकारियों से गुजारिश करता हूं कि जनता की भलाई के लिए उस गार्ड पर भारी जुर्माना  लगाया जाए। अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं इसे अखबार में छपवाऊंगा।”

तो अगली बार जब ट्रेन में सफ़र करें तो ओखिल चन्द्र सेन को टॉयलेट फैसिलिटी के थैंकयू कहना न भूलें।

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