अक्षय ऊर्जा की राह पर चलकर एक नये युग की ओर जा रहा है भारत

 2017-01-20 10:15:07.0

अक्षय ऊर्जा की राह पर चलकर एक नये युग की  ओर जा रहा है भारत


डा. सीमा जावेद
(लेखिका पर्यावरण विद एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं )

अपने अक्षय ऊर्जा कार्यक्रमों के बल पर भारत ने एक ऐसे देश के रूप में जगह बनायी है जो वास्‍तव में इस ऊर्जा क्षेत्र में महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍यों की प्राप्ति पर काम कर रहा है। अक्षय ऊर्जा के मौजूदा कार्यक्रम भारत को तेजी से एक नये युग की ओर ले जा रहा है 

विश्व के मौसम में लगातार हो रहे बदलावों और बढते तापमान को लेकर अपनाए गए कडे रूख के कारण जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए दुनिया थर्मल पॉवर के ज़रिये  कोयला दहन से उत्पादित प्रदूषणकारक  ऊर्जा की जगह अक्षय ऊर्जा का रुख कर रही है । भविष्य में  अक्षय ऊर्जा के ज़रिये दुनिया एक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां हम कार्बन डाई ऑक्साइड में कटौती करते हुए भी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करके जीवाश्म ईंधनों से मुक्ति पा लेंगे। गौरतलब है कि सिर्फ ऊर्जा एवं परिवहन क्षेत्रों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन 2015 तक चरम पर पहुंच सकता है और इससे अक्षय ऊर्जा के ज़रिये  2050 तक 80 प्रतिशत कमी लाई जा सकेगी।

चूंकि हमारी ऊर्जा अवसंरचना अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं है, हमें सही चयन के अवसर उपलब्ध हैं। ईंधन आपूर्त्ति के लिए परावलंबी बनाने वाली पुरानी दूषित  की जगह भविष्य में दुनिया की तस्वीर बदलने वाली प्रचुरता में उपलब्ध नवीकरणीय और टिकाऊ ,पर्यावरणोन्मुख अक्षय उर्जा का चुनाव करने के लिए परिस्थिति  पूरी तरह अनुकूल है। पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार  भारत के विभिन्न लक्ष्यों तथा वित्तीय प्रोत्साहनों के चलते देश के अक्षय ऊर्जा उत्पादन की वृद्धि को समर्थन मिला है।देश की कुल बिजली उत्पादन संस्थापन क्षमता 250000 मेगावाट से अधिक की है जिसमें से अक्षय ऊर्जा का हिस्सा 70,000 मेगावाट से अधिक है।

भारत में बिजली की मांग हमेशा ही आपूर्ति से अधिक रही है। ऐसे में जो बिजली उत्पादित होती है वह शहरों को जगमगाने में ही खर्च हो जाती है ऐसे में दूर दराज़ के गाँव ऊर्जा के पहुँच से दूर हे बने रह जाते हैं गौरतलब है कि देश के लगभाग पैंतीस प्रतिशत  आबादी को आज भी बिजली मयस्सर नहीं है।  बड़े केन्द्रीय पावर स्टेशन भारत की गरीब जनता को आजादी के 62 साल बाद भी बेहतर बिजली मुहैया कराने में नाकाम रहे हैं। इसका समाधान विकेंद्रित  गैरपरंपरागत पावर उत्पादन तंत्र ही है जो सुदूर अंधेरे गांव को जगमगा सकते हैं और उन गांवों को भी बेहतर बिजली आपूर्ति दे सकते हैं जो बिजली के गिड सिस्टम से जुड़े तो हैं लेकिन उनको शहरों से बची-खुची बिजली के लिए मोहताज रहना पड़ता है। 

दशकों तक बिजली उत्‍पादन को लेकर एक ही परिकल्‍पना जीवंत रही कि बिजली की आवश्‍यकता पूरी करने के लिये जरूरी 'बेसलोड' उपलब्‍ध कराने के वास्‍ते बड़े ऊर्जा संयंत्र स्‍थापित किये जाएं जिनसे चौबीसों घंटे बिजली का उत्‍पादन हो। भविष्‍य में उन कोयला अथवा परमाणु आधारित बड़े बेसलोड संयंत्रों की जरूरत धीरे-धीरे कम होती जाएगी। ऐसा इसलिये होगा क्‍योंकि ऐसे संयंत्र आमतौर अपने उत्‍पादन के स्‍तर में बदलाव के लिहाज से अपेक्षाकृत धीमे होते हैं। लचीलापन एक नयी मिसाल है। अक्षय ऊर्जा स्रोतों (आरईएस) की बढ़ती हिस्‍सेदारी के साथ हम विद्युत की मांग की पूर्ति में सौर तथा वायु द्वारा उत्‍पादित बिजली की ज्‍यादा से ज्‍यादा भागीदारी देखेंगे। लिहाजा वायु तथा सौर ऊर्जा का समुचित उत्‍पादन नहीं होने की स्थिति में बिजली की मांग के भार को अच्‍छी तरह सम्‍भालने के लिये मुख्‍य बिजली उत्‍पादन प्रणाली में पर्याप्‍त लचीलापन लाने की जरूरत होगी। इसके अलावा जरूरत ना होने पर उत्‍पादन में कमी लाने तथा वायु एवं सौर ऊर्जा प्रणालियों की तरह उत्‍पादन के स्‍तर में तेजी से बदलाव करने के गुण भी मुख्‍य प्रणाली में पैदा करने होंगे। 

अक्षय ऊर्जा का उपयोग एक विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था की परिकल्पना पर आधारित है ।   इसमें  ऊर्जा को किसी एक विशाल केंद्र पर उत्पादित करने और फिर लंबी दूरी तक उसका परिवहन किए जाने की जरूरत नहीं है। उसका उत्पादन जहां जरूरत हो उन्हीं स्थानों के पास किया जा सकता है, और प्रायः उन लोगों के नियंत्रण में जिन्हें उसका उपयोग करना है।चूंकि विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था लोगों की स्थानीय स्तर पर सेवा करती है, इसलिए वह केंद्रीकृत व्यवस्था के बड़े पावर स्टेशनों की तुलना में अनिवार्य रूप से छोटी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियां इस तरह के लघु पैमाने के ऊर्जा उत्पादन के अनुकूल हैं और उनसे लाभ यह है कि वे हवा, जल आसपास रहने वाले लोगों की जमीन को प्रदूषित नहीं करेंगी। नवीकरणीय ऊर्जा प्रद्यौगिकियां ग्रीनहाउस गैसों को भी नहीं पैदा करतीं और इसलिए जलवायु परिवर्तन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं करेंगी।भारत में, जहां देश के विशाल आकार और ऊर्जा की भारी कमी की वजह से अधिकांश लोग – खास करके ग्रामीण क्षेत्रों के लोग – अपनी बिजली आपूर्ति पर भरोसा नहीं कर सकते, है। इतने छोटे पैमाने पर काम करने का मतलब है कि ऊर्जा आपूर्ति के तरीके समुदाय की जरूरत के मुताबिक अपनाये जा सकते हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा के और भी कई रूप दुनिया में उपलब्ध हैं और हम बेहतर तरीके से उनका इस्तेमाल करने में भी सक्षम हो रहे हैं। प्रणालियां अलग-थलग हो सकती हैं – जिन्हें 'स्टैण्ड अलोन' कहा जाता है – अथवा मुख्य बिजली ग्रिड से उन्हें जोड़ा जा सकता है – जिन्हें 'ग्रिड इंटरैक्टिव' कहा जाता है। 'ग्रिड इंटरैक्टिव' प्रणाली का लाभ यह है कि उसके स्वामी अतिरिक्त उत्पादन होने की स्थिति में वस्तुतः ग्रिड को ऊर्जा बेच भी सकते हैं जिससे उनको आमदनी का नया जरिया मिल सकता है, या फिर स्वयं अधिक ऊर्जा हासिल कर सकते हैं यदि कभी उन्हें अधिक की जरूरत पड़ी।

विकेंद्रित व्यवस्था का चलन पूरे भारत में बढ़ रहा है, एक लाख से अधिक लोग चावल की भूसी से बनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं। लद्दाख में, आदिवासी समुदाय अपने कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग माइक्रो-हाइड्रो ऊर्जा से संचालित मशीनों से करते हैं। कर्नाटक में, ग्रामीण गोबर की खाद से बनी गैस पर खाना पका रहे हैं। 

भारत में अक्षय ऊर्जा संसाधनों के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं इनका दोहन करने के लिए रणनीतिक योजना के साथ-साथ प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। पिछले दो वर्षों में भारत के चार राज्यों के  60,000 गाँव अंतर्राष्ट्रीय स्वंयसेवी संगठन "क्लाइमेट ग्रुप" द्वारा स्वच्छ सौर ऊर्जा से जोड़े गए हैं। इनमें  महाराष्ट्र, पश्चिम के राज्यों में बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश स्थानीय उद्यमियों द्वारा समर्थित है और इसे  डच पोस्टकोड लॉटरी से फण्ड से शुरू किया गया है  सौर फोटोवोल्टिक सेल्स से बिजली की लागत 20 रुपये प्रति यूनिट से घटकर 7.50 रुपये प्रति यूनिट पर आ गई है। शोध और अनुसंधान से इसे और नीचे लाया जा सकता है। यह गिरावट भारतीय ऊर्जा प्रणाली को मूलभूत रूप से बदल देगी। इसका मतलब यह होगा कि बिजली उत्‍पादन तथा उसके इस्‍तेमाल के तरीके की आधारभूत मिसाल ही बदल जाएगी।

हाल ही में शुरू  हुई रेल के डिब्बों की छतों पर सौर प्लेट लगा कर ट्रेन में बल्ब जलाने और पंखे चलाने के लिए बिजली के इंतजाम की योजना इस दिशा में एक नई  पहल  है। आइआइटी चेन्नई में तैयार सौर प्लेटों के जरिए इस योजना को अंजाम देने का जिम्मा फिलहाल राजस्थान के जोधपुर के वर्कशॉप को दिया गया है। वहां यह योजना डीएमयू ट्रेनों पर प्रयोग के स्तर पर शुरू होगी। कामयाबी मिलने पर इसे एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों में भी लागू किया जाएगा। एक आकलन के मुताबिक बीस बोगियों वाली ट्रेन में बिजली और पंखे चलाने के लिए साल भर में तकरीबन नब्बे हजार लीटर डीजल खर्च होता है। देश भर में जितनी रेलगाड़ियां दिन में खासी धूप वाले इलाकों में दौड़ती रहती हैं, उसमें अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि अगर यह योजना ठीक से क्रियान्वित की जाए तो ट्रेन के डिब्बों में सिर्फ रोशनी और पंखे के लिए डीजल के मद में खर्च होने वाली कितनी राशि बचाई जा सकती है। 
करीब डेढ़ साल पहले सरकार संचालित भेल यानी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड के तहत जयपुर के पास तेईस हजार एकड़ के दायरे में चार हजार मेगावाट की क्षमता वाला सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने की एक वृहद परियोजना तैयार की गई थी। इसके अलावा हरियाणा सरकार ने समूचे राज्य में पांच सौ वर्ग गज या इससे ज्यादा के भूखंड पर बने निजी बंगलों, रिहाइशी सोसाइटियों, व्यावसायिक परिसरों से लेकर दफ्तर, स्कूल, अस्पताल आदि सभी इमारतों के लिए यह निर्देश जारी किया था कि वे सितंबर तक अपनी छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगवा लें। 

यह सौभाग्‍य की बात है कि ऊर्जा संयंत्रों में स्‍वाभाविक रूप से कई प्रकार का लचीलापन होता है। उदाहरण के तौर पर ग्रिड का विस्‍तार, मांग के अनुरूप कार्य, ऊर्जा भण्‍डारण या लचीले परम्‍परागत ऊर्जा संयंत्र। जर्मनी के साथ-साथ भारत में भी सख्‍त कोयले से चलने वाले अनेक बिजली संयंत्र हैं। उनमें से अनेक संयंत्रों को तो लचीलापन बढ़ाने के लिये हाल के वर्षों में नयी तकनीक से लैस किया गया है। यह तकनीकी रूप से आसान तथा किफायती है। यह तथ्‍य है कि जर्मनी की ऊर्जा उत्‍पादन प्रणाली में सख्‍त कोयले से चलने वाले संयंत्रों को 'बैक-अप' क्षमता के तौर पर लगातार इस्‍तेमाल किया जा रहा है।

हालांकि यह सवाल अब भी पूछा जा सकता है कि अगर वायु तथा सौर ऊर्जा संयत्रों से हमारी बिजली उत्‍पादन प्रणाली ज्‍यादा जटिल हो जाती है तो हमें इन वैकल्पिक ऊर्जा संयंत्रों को क्‍यों लगाना चाहिये? इसका जवाब बिल्‍कुल सीधा है कि अक्षय ऊर्जा प्रणाली के हमारी परम्‍परागत बिजली उत्‍पादन प्रौद्योगिकियों के मुकाबले कई फायदे हैं। इससे वायु तथा मृदा का कम प्रदूषण होता है, इसमें कम पानी की जरूरत पड़ती है, घरेलू स्रोत होने की वजह से इसके लिये ईंधन का कम आयात करना पड़ता है, इससे कार्बन-डाई-ऑक्‍साइड का उत्‍सर्जन कम होता है, साथ ही परम्‍परागत बिजली संयंत्रों के मुकाबले इनमें रोजगार के ज्‍यादा अवसर हैं। सबसे खास बात यह है कि हम यह मान सकते हैं कि भविष्‍य में सौर तथा वायु ऊर्जा सबसे सस्‍ती बिजली उत्‍पादन तकनीक के रूप में उभरेगी।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक भारत वर्ष 2022 तक 75 गेगा वाट सोलर उर्जा उत्पादन क्षमता हासिल कर लेगा। ग्लोबल पवन ऊर्जा परिषद  के अनुसार पवन ऊर्जा अब मजबूती से बिजली की मुख्यधारा के एक सस्ते एवं टिकाऊ विकल्प के रूप में सामने आ रही है। पवन ऊर्जा है को जोड़ने की कीमतों में गिरावट जारी है। अब 90 से अधिक देशों के वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में पवन ऊर्जा स्रोत स्थापित हैं।

ऐसे में बिजली मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार सरकार बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में वर्गीकृत करने पर विचार कर रही है. उन्होंने कहा कि इससे देश को 2022 तक 2,25,000 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त करने में मदद मिल सकती है. लघु परियोजना (25 मेगावाट तक) तथा बड़ी पनबिजली परियोजना के बीच अंतर हटाये जाने से देश में अक्षय उर्जा क्षेत्र में स्थापित क्षमता 2022 तक 2,25,000 मेगावाट हो जाएगी.कुल 3,05,000 मेगावाट की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में 43,000 मेगावाट बड़ी पनबिजली परियोजनाओं (25 मेगावाट से ऊपर) से आती हैं. अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर आधारित स्थापित क्षमता 44,230 मेगावाट है.

भारत ने 2022 तक 1,75,000 मेगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है जिसमें सौर बिजली की स्थापित क्षमता 1,00,000 मेगावाट है. इसके अलावा पवन ऊर्जा से 60,000 मेगावाट, बायो तथा छोटी पनबिजली परियोजनाओं से क्रमश: 10,000 और 5,000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता सृजित करने का लक्ष्य है. राज्य अक्षय ऊर्जा विकास संस्था के अंतर्गत सौर चार्ज स्टेशन के माध्यम से प्रकाश व्यवस्था के लिए पूंजीगत सब्सिडी और जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन (जेएनएनएसएम) के लिए ऑफ ग्रिड और विकेन्द्रीकृत सौर अनुप्रयोगों जैसी योजनाओं से  अक्षय ऊर्जा युग के ओर देश आगे बढ़ राह है



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