Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

अयोध्या के नाम पर अभी भी भरा जा रहा है युवा दिलों में ज़हर

 Sabahat Vijeta |  2016-12-07 16:30:43.0

babri-masjid
तहलका न्यूज़ ब्यूरो


लखनऊ. छह दिसंबर 1992 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में देखा जाता है. यह वह दिन है जब अयोध्या में कारसेवकों की बेकाबू भीड़ ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था. बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना के 24 साल बीत चुके हैं. यह मामला आज भी अदालत में लंबित है लेकिन चुनाव की दस्तक सुनाई देते ही अयोध्या का जिन्न सर उठाकर खड़ा हो जाता है.


6 दिसम्बर 1992 के बाद उत्तर प्रदेश का कोई भी चुनाव ऐसा नहीं गुज़रा जो अयोध्या के ज़िक्र के बगैर पूरा हो गया हो. बाबरी मस्जिद गिराए जाने में शामिल रहे युवा अब ढलती उम्र के हो चुके हैं. जिनके नेतृत्व में भीड़ जमा की गई थी वह अब राजनीति में हाशिये पर जा चुके हैं. इस घटनाक्रम के बाद पैदा हुए लोग भी अब समझदार हो चुके हैं. बावजूद इसके अयोध्या आज भी राजनीति का ऐसा अध्याय बनी हुई है कि उसका ज़िक्र किये बगैर चुनाव पूरा ही नहीं होता है.


सेन्टर ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी ने अयोध्या की इस घटना के बाद हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कई सर्वे कराकर यह पता करने की कोशिश की कि बाबरी मस्जिद की जगह पर क्या बनना चाहिए. हिन्दुओं ने चाहा कि वहां मंदिर बने और मुसलमानों ने चाहा कि वहां मस्जिद बने. वक़्त बीतने के साथ-साथ हिन्दुओं की मंदिर के समर्थन में राय का प्रतिशत बढ़ता गया जबकि मुसलमानों का वहीं रुका रहा. फर्क बस इतना हुआ है कि 2009 के बाद हुए सर्वे में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की यह जिद बहुत कम हो गई है कि उस जगह पर केवल उन्हीं का धर्मस्थल बने, लेकिन 2016 के सर्वे में यह चौंकाने वाली बात सामने आयी है कि अयोध्या में केवल मंदिर की मांग करने वाले हिन्दुओं की तादाद बहुत तेज़ी से बढ़ी है, जबकी मुसलमानों की संख्या वहीं पर बनी हुई है. 49 फीसदी हिन्दुओं ने विवादित ज़मीन पर सिर्फ मंदिर चाहा है जबकि 28 फीसदी मुसलमानों ने सिर्फ मस्जिद चाही है.


पिछले सर्वे और ताज़ा सर्वे देखने के बाद यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है कि उत्तर प्रदेश में हुए साम्प्रदायिक संघर्ष के बाद हिन्दुओं और मुसलमानों का ध्रुवीकरण बहुत तेज़ी से हुआ है. 2014 के चुनाव में लव जिहाद जैसे जुमलों ने आपसी नफ़रत को और ज्यादा भड़का दिया.


2016 में हुए सर्वे में लोगों से पूछा गया कि क्या पिछले कुछ सालों में मुसलमानों के साथ भेदभाव बढ़ा है? क्या मुसलमानों को गलत तरीके से आतंकी गतिविधियों में फंसाया जाता है? ज़्यादातर मुसलमानों ने यह माना कि उनके साथ भेदभाव बढ़ा है. उनके सामने ऐसे हालात बनाये जाते हैं कि उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होता है. ऐसे में कट्टरपंथी लोग मुसलमान नौजवानों की भावनाओं का फायदा उठा लें तो ताज्जुब की बात नहीं है. इस सर्वे ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि 30 साल से कम उम्र के पढ़े-लिखे हिन्दू नौजवानों पर साम्प्रदायिकता ज्यादा हावी हुई है. एक तरफ विकास के नारे पर चुनाव और दूसरी तरफ देश के भविष्य नौजवानों के मन में नफरत का बीज बोने की कारस्तानी, यह सच है और सच को झुठलाना भी संभव नहीं है.

Tags:    

  Similar Posts

Share it
Share it
Share it
Top