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राज्यपाल ने दो विधेयक राष्ट्रपति को भेजे

 Sabahat Vijeta |  2016-05-05 15:18:16.0

ram-naikलखनऊ. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने ‘उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2015‘ तथा ‘उत्तर प्रदेश नगरपालिका विधि (संधोधन) विधेयक, 2015‘ को निर्णय के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को संदर्भित कर दिया है।


राज्यपाल ने दोनों विधेयकों के परीक्षण पर यह पाया है कि इन विधेयकों के कुछ प्रावधान 74वें संशोधन द्वारा 1992 में संविधान में जोड़े गये अध्याय 9-ए के अनुच्छेदों 243-पी(म), 243-यू, 243-क्यू, 243-डब्ल्यू, 243-जेडएफ तथा अनुच्छेद 246(3) के साथ पठित सप्तम् अनुसूची की सूची 2 (राज्य सूची) की प्रविष्टि 5 के प्रावधानों, स्थानीय स्वशासन की अवधारणा और लोकतंत्र की भावना के भी प्रतिकूल हैं। विधेयक द्वारा उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 में नई धारा 16-ए जोड़ी गयी है, जिसके द्वारा राज्य सरकार को यह अधिकार होगा कि नगर निगमों के महापौरों और नगर पालिकाओं के अध्यक्षों के विरूद्ध भ्रष्टाचार, निष्क्रियता, अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार आदि किये जाने की शिकायतें मिलने पर राज्य सरकार महापौरों और अध्यक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी करके उनका जवाब मांगेगी और उनके जवाब से सन्तुष्ट नहीं होने पर राज्य सरकार महापौरों और अध्यक्षों की समस्त प्रशासनिक व वित्तीय शक्तियों पर रोक लगा देगी और उनके पदों का प्रभार नगर निगमों के नगर आयुक्तों और नगर पालिकाओं के अधिशासी अधिकारियों को सौंप देगी। राज्य सरकार इसके बाद महापौरों और अध्यक्षों के विरूद्ध जाॅँच बैठायेगी। इस जाँच की प्रक्रिया क्या होगी और किसके द्वारा जाँच की जायेगी, इसका कोई उल्लेख विधेयक में नहीं है।


उल्लेखनीय है कि 1992 में संसद द्वारा संविधान में अध्याय 9 एवं 9-ए जोड़े जाने का उद्देश्य पंचायतों, नगर निगमों और नगर पालिकाओं जैसी स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं के माध्यम से शासन-सत्ता के विकेन्द्रीकरण और स्थानीय स्वशासन की अवधारणा को मजबूत करना था। राज्यपाल ने विधेयक द्वारा उक्त अधिनियम में जोड़ी जाने वाली नई धारा 16-ए के द्वारा राज्य सरकार को दिये गये इस आशय के अधिकार कि शिकायतों की जाँच कराये जाने के पूर्व ही महापौरों और अध्यक्षों को दोषी घोषित कर देने और उन्हें उनके पदीय कर्तव्यों के निर्वहन से वंचित कर दिये जाने को संविधान के 74वें संशोधन की भावना और सामान्य लोकतांत्रिक एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के विपरीत पाया है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 15(1)(क) इस बात का प्रावधान करती है कि नगर निगमों तथा उनके महापौरों दोनों का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा और साथ-साथ समाप्त होगा।


इसी प्रकार उक्त विधेयक द्वारा उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 में वर्तमान में विद्यमान धारा 107 के स्थान पर नई धारा 107 लाकर नगर निगमों और नगर पालिकाओं के कर्मचारियों की नियुक्ति और स्थानान्तरण का अधिकार नगर निगमों व नगर पालिकाओं से छीनकर राज्य सरकार को दे दिया गया है। नई धारा 107 राज्य सरकार को नगर निगमों एवं नगर पालिकाओं के कर्मचारियों को दूसरे नगर निगमों और नगर पालिकाओं में स्थानान्तरित करने का भी अधिकार देती है जिससे पुनः स्थानीय स्वशासन एवं स्वायत्तशासी संस्थाओं के रूप में नगर निगमों और नगर पालिकाओं की स्वायत्ता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है जो संविधान के अनुच्छेद 309 एवं 74वें संविधान संशोधन के प्रावधानों और उसकी भावना के विपरीत है।


राज्यपाल ने इस आशय की जानकारी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी दे दी है। ज्ञातव्य है कि राजभवन में 7 विधेयक परीक्षणाधीन थे जिनमें से 5 का निस्तारण राज्यपाल द्वारा कर दिया गया है। वर्तमान में ‘उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग (संशोधन) विधेयक, 2015‘ तथा ‘उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त एवं उप लोक आयुक्त (संशोधन) विधेयक, 2015‘ विचाराधीन हैं।

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