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सरकारी तनख्वाह लेने वालों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें

 Sabahat Vijeta |  2016-04-16 14:50:09.0

तहलका न्यूज़ ब्यूरो


Allahabad-HCलखनऊ, 16 अप्रैल. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने 18 अगस्त, 2015 को वर्ष 2013 की रिट याचिका संख्या 57476 व अन्य के संदर्भ में यह आदेश दिया था कि छह महीने की अवधि में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे सभी सरकारी तनख्वाह पाने वाले लोगों और जन प्रतिनिधियों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में दाखिला लेना था. इस आदेश में यह भी कहा गया था कि यह व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2016-17 से लागू हो जानी चाहिए थी.


सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जब 10 मार्च, 2016 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से यह पूछा गया कि उन्होंने इस दिशा में अभी तक क्या कार्यवाही की है तो कोई जवाब नहीं मिला.


इस मुद्दे पर फ्यूचर ऑफ इण्डिया मंच के मजहर आजाद 18 अप्रैल 2016 से गांधी प्रतिमा हजरतगंज लखनऊ में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठने जा रहे हैं. यह अनशन इसलिए शुरू हो रहा है ताकि हर बच्चे को सामान शिक्षा का हक हासिल हो सके.


मजहर आज़ाद ने कहा कि जब हम किसी सड़क के किनारे दुकान पर कुछ खा रहे होते हैं अथवा चाय की दुकान पर चाय पी रहे होते हैं तो हमें कई बार यह अहसास ही नहीं होता कि जो हाथ हमें खिला-पिला रहे हैं उन हाथों में असल में पेंसिल-किताब होनी चाहिए थी. इन बच्चों को जिन्हें आम तौर पर छोटू कह कर सम्बोधित किया जाता है के हम कई बार नाम जानने की भी जरूरत नहीं समझते.




भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24, 21, व 45 बाल दासता को रोकने के लिए पर्याप्त होने चाहिए थे. अब तो कई कानून भी बन गए हैं. कारखाना अधिनियम 1948, खादान अधिनियम 1952, बाल मजदूर प्रतिबंध एवं नियंत्रण अधिनियम 1986, नाबालिग बच्चों को न्याय संरक्षा एवं सुरक्षा 2000 व मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का क्रियान्वयन ईमानदारी से हो जाता तो काम करते हुए बच्चे कहीं दिखाई नहीं पड़ते. इन कानूनों के होते हुए भी बाल मजदूरी धड़ल्ले से चल रही है. इसका मतलब है कि न तो सरकार उपर्युक्त कानूनों के क्रियान्वयन के प्रति गम्भीर है और न ही नागरिकों को बाल मजदूरी से कोई दिक्कत है. कभी बच्चे के परिवार की मजबूरी बता कर या शिक्षा की बच्चे की जिंदगी में निरर्थकता बता हम किसी न किसी तर्क से बाल मजदूरी को जायज ठहरा देते हैं.



यदि हम बच्चे को शिक्षा से वंचित कर रहे हैं तो हम उसके लिए जिंदगी में तरक्की के रास्ते बंद कर रहे हैं. कई बार यह कहा जाता है कि गरीबी के कारण बच्चा नहीं पढ़ पाता. किंतु यह भी तो सच है कि यदि उसे गरीबी का दुष्चक्र तोड़ना है तो शिक्षित होना पड़ेगा. ज्यादातर बाल मजदूर दलित एवं मुस्लिम समुदाय से हैं जो हमारे समाज के सबसे पिछड़े वर्ग हैं. इन्हें शिक्षा से वंचित रखने का मतलब होगा इनकी गरीबी की स्थिति बनाए रखना.


दुनिया के सभी विकसित देशों व कई विकासशील देशों ने भी 99-100 प्रतिशत साक्षरता की दरें हासिल कर ली हैं. भारत में आधे बच्चे विद्यालय स्तर की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते. इसमें से आधे बाल मजदूरी के शिकार हैं. जिन देशों ने 99-100 प्रतिशत साक्षरता की दरें हासिल की हैं उन्होंने अपने यहां समान शिक्षा प्रणाली लागू की हैं. इसके मायने यह हैं कि सभी बच्चों को लगभग एक गुणवत्ता वाली शिक्षा हासिल करने के अवसर उपलब्ध हैं.


भारत में अब दो तरह की शिक्षा व्यवस्थाएं हैं. एक पैसे वालों के लिए जो अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ाते हैं तो दूसरी गरीब लोगों के लिए जो अपने बच्चे सरकारी विद्यालय में भेजने के लिए अभिशप्त हैं जहां पढ़ाई ही नहीं होती. इस तरह भारत में शिक्षा अमीर व गरीब के बीच दूरी को और बढ़ा देती है.




यदि भारत में सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होनी है तो सिवाए समान शिक्षा प्रणाली को लागू करने के कोई उपाए नहीं है. सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने का सबसे सीधा और एकमात्र तरीका यही है कि सभी सरकारी वेतन पाने वालों व जन प्रतिनिधियों के बच्चों के लिए सरकारी विद्यालयों में पढ़ना अनिवार्य किया जाए. यदि सरकार और प्रशासन में बैठे लोग सरकारी विद्यालयों को अपना नहीं मानेंगे तो भला और कौन मानेगा. जब सरकारी अधिकारियों ने घाटे में चलने वाली एअर इण्डिया को यह नियम बना कर जिंदा रखा है कि सरकारी काम से यात्रा करने वाले लोगों को एअर इण्डिया से ही यात्रा करनी होगी तो सरकारी विद्यालयों को जिंदा रखने के लिए वे अपने बच्चों को इन विद्यालयों में भेजने का नियम क्यों नहीं बना सकते.


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