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B’Day Special: गजल गायकों के ये गुरु रखते थे पहलवानी का भी शौक

 Anurag Tiwari |  2016-07-18 05:44:56.0

[caption id="attachment_96314" align="aligncenter" width="832"]Mehdi Hasan, Ghazal, India, Pakistan, Jagjeet Singh, Ghulam Ali फाइल फोटो: ग़ज़ल के शहंशाह मेहदी हसन[/caption]

शिखा त्रिपाठी

नई दिल्ली. 'मोहबत जिंदगी है और तुम मेरी मोहब्बत हो', 'नवाजिश करम शुक्रिया मेहरबानी' जैसी खूबसूरत गजलें गाने वाले पाकिस्तानी गायक मेहदी हसन की मखमली आवाज सभी के दिलों में अपनी खास जगह बना चुकी है। भले ही वह अब हम सबके बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज और गाने का अनोखा अंदाज उनकी यादों को आज भी तरो-ताजा कर रहा है।


मेहदी के गले से निकले एक-एक शब्द से हर व्यक्ति खुद को बड़ी आसानी से जोड़ सकता था। उन्होंने कई खूबसूरत गजलों से सभी को अपना दीवाना बना दिया था। वह भले ही पाकिस्तान से थे, लेकिन उन्हें जब भी मौका मिलता तो वह दौड़े-दौड़े भारत चले आते थे। वह मूल निवासी भारत के ही तो थे।
मेहदी हसन का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना में 18 जुलाई, 1927 को हुआ। वह पारंपरिक संगीतकारों के परिवार से थे। मेहदी हसन के पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान दोनों पारंपरिक ध्रुपद गायक थे। बचपन में मेहदी हसन को गायन के साथ पहलवानी का भी शौक था। मेहदी हसन अपने साथी नारायण सिंह व अर्जुन लाल जांगिड़ के साथ कुश्ती में दांवपेच आजमाते थे।

भारत के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान जाने से पहले उन्होंने जीवन के 20 वर्ष गांव में ही बिताए थे। मेहदी हसन को गायन विरासत में मिली थी। उनके दादा इमाम खान बड़े कलाकार थे, जो उस वक्त मंडावा व लखनऊ के राज दरबार में गंधार, ध्रुपद गाते थे। मेहदी हसन के पिता अजीम खान भी अच्छे कलाकार थे इस कारण उस वक्त भी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी थी।

मेहदी ने शुरुआत में पाकिस्तान के चीचावतनी में साइकिल की दुकान पर काम शुरू किया। इसके बाद वह कार और डीजल ट्रैक्टर मैकेनिक बन गए। आर्थिक संकट के बावजूद, उन्होंने गायन का अभ्यास जारी रखा और वह ध्रुपद की बजाय गजल गाने लगे।

मेहदी हसन अपने परिवार से पहले गायक थे, जिसने गजल गाना शुरू किया। उन्हें 1957 में पहली बार पाकिस्तान रेडियो पर गाने का मौका मिला और 1958 से वह पूरी तरह गजल गायन को समर्पित हो गए। उस वक्त हालांकि गजल का विशेष महत्व नहीं था।

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उनका पहला गीत 1962 में फिल्म 'ससुराल' से 'जिसने दिल को दर्द दिया' था। इसके बाद 1964 में उनकी गजल गाई फिल्म 'फरंगी' में सुनी गई। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक गजल गाते चले गए, जिसे संगीत प्रेमियों ने काफी सराहा।

शायर अहमद फराज की गजल 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ' गाकर मेहदी हसन को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मेहदी हसन ध्रुपद, ख्याल, ठुमरी व दादरा बड़ी खूबी के साथ गाते थे। इसी वजह से सुर सामग्री लता मंगेशकर कहा करती हैं, "मेहंदी हसन के गले में तो स्वयं भगवान बसते थे।"

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'तूने ये फूल जो जुल्फों में लगा रखा है, इक दिया है जो अंधेरे में जला रखा है' जैसी खूबसूरत गजल गा चुके गायक मेहदी हासन के साथ, उस्ताद पीर बख्श तबला वादक उस्ताद मोहम्मद हुसैन जैसे संगीतकार भी जुड़े।

इसके अलावा, परवेज मेहदी, तलत अजीज, गुलाम अब्बास, सलामत अली, रेहान अहमद खान, सविता आहूजा, शमशाद हुसैन चंदा, असद फारूक, शहनाज बेगम (बांग्लादेश) जैसे कई जाने-पहचाने गायक उनके छात्र रहे।

'पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है।' मेहदी हसन की गाई यह प्रसिद्ध गजल आज यथार्थ बन गई है। यही गजल बाद में मोहम्मद रफी और लगता मंगेशकर ने भी एक फिल्म के लिए गाया, लेकिन मेहदी के गाने का अंदाज सबसे अलग था।

पाकिस्तानी गजल गायक मेहदी हसन का भारत से विशेष लगाव रहा है। वह हर बुलावे पर भारत आते रहे और गजलों की महफिल सजाते रहे। मेहदी हसन ने सदैव भारत-पाकिस्तान के बीच एक 'सांस्कृतिक दूत' की भूमिका निभाई और जब-जब उन्होंने भारत की यात्रा की, तब-तब भारत-पाकिस्तान के मध्य तनाव कम हुआ व सौहार्द का वातावरण बना।
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मेहदी हसन को पाकिस्तान, नेपाल और भारत में उनकी गायिकी के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा गया।

पाकिस्तान के कराची शहर में 13 जून, 2012 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मेहदी इलाज के लिए भारत आना चाहते थे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें यात्रा नहीं करने की सलाह दी और उनकी भारत आने की अंतिम इच्छा पूरी न हो सकी। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी गाई गजलें अमर हो चुकी हैं और शानदार फनकार मेहदी भी।

(आईएएनएस)

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