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“गंगा प्रदूषणः विश्लेषण और उपाय” राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

 Vikas Tiwari |  2016-10-07 16:09:04.0

 गंगा प्रदूषण

तहलका न्यूज़ ब्यूरो 

लखनऊ.  2016 को रसायन विज्ञान विभाग, डी0ए-वी0 कालेज कानपुर द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित “गंगा प्रदूषणः विश्लेषण और उपाय” जैसे गंभीर विषय पर सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का प्रारम्भ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वन्दना के साथ प्रारम्भ हुआ । महाविद्यालय प्राचार्य प्रो0 एल0 एन0 वर्मा ने गंगा जी के महत्व को रेखांकित किया तथा आये हुए अतिथियों का स्वागत करते हुए विज्ञान विभाग को इस कार्य हेतु बधाई दिया ।

संगोष्ठी संयोजक डा0 डी0 पी0 राव ने गंगा प्रदूषण विषय की सार्थकता  को बताते हुए कहा कि गंगा निर्मल अभियान एक महत्वकांक्षी योजना है इसके लिए प्रतिबद्धता जरूरी है । इसी प्रतिबद्धता और प्रयास के सहाने भगीरथ जी गंगा को स्वर्ग से उतार लाये थें । आज हम सबको भी इसके लिए भगीरथ प्रयत्न कारना पडेगा । निदेशक डी0एम0एस0आर0डी0ई0 डा0 एन0 ईश्वरा प्रसाद ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं को व्यवहारिक रूप देने की आवश्यकता है । धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं को बदलने के लिए धार्मिक गुरूओं को विश्वास में लेने की जरूरत है । यह संम्भव नहीं है । कुरूक्षेत्र के चारों ओर अडतालिस कोस के क्षेत्र को महाभारत का क्षेत्र माना जाता है । यहाॅं परम्परा है कि शव दहन के बाद अस्थियों या राख को श्मशान से नहीं उठा जाता । समय के साथ अस्थियों और राख श्मशान की भूमि की मिट्टी का हिस्सा बन जाती है ।

विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित आई0आई0टी0 कानपरु के प्रो0 डी0 पी0 मिश्रा ने बोलते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में जो विकल्प उपलब्ध हैं उन पर समुचित ध्यान देकर उन्हें विकसित किया जा सकता है । वैकल्पिक सोच का मूल आधार यह होना चाहिए कि किसी भी एक यूनिट, मोहल्ले या बस्ती का एक सीवेज नियोजन इस आधार पर हो कि उस यूनिट में जितनी भी सीवेज ज्ञनित होती है, उसको उस यूनिट के अन्दर खपाया जाएगा । इस यूनिट के भीतर ही इसका ट्रीटमेंट होगा, इससे खाद अलग कर सिंचाई लायक पानी एवं पानी की जितनी री-साकिलिंग संभव हैे वह की जाएगी ।
मुख्य अतिथि के रूप् में उपस्थित माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री विजय बहादुर पाल ने अपने उदबोधन में कहा कि गंगा जी के धारों पर प्रतिदिन होने वाले कर्मकाडं, पूजा और स्नान के कारण जलधारा अधिक प्रदूषित होती है । इसके लिए मुख्य धारा में से एक अलग धारा निकालकर इस प्रकार के धार्मिक उपक्रमों के लिए अलग से व्यवस्था की जा सकती है । इस अलग धारा के पानी को मुख्य धारा से अलग रखकर सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है ।

गंगा के प्रवाह को अविरल बनाये रखने के लिए यह भी जरूरी हो जाता है इसके बहाव क्षेत्र के बीच के रेत और गाद को निरस्त हटाया जाये । खनन गतिविधियों को नियन्त्रित करते हुए नियोजन खनन को गंगा के प्रवाह क्षेत्र में अनुमति देनी होगी इससे सरकार को कर में ज्यादा राजस्व प्राप्त होगा और ज्यादा लोगों को रोजगार भी उपलब्ध होगा ।
अपने अध्यक्षीय उपबोधन में इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि पर्वतीय और मैदानी इलाकों में गंगा नदी पर बांध बनाकर गंगा की जलधारा को अविरल बनाया जा सकता है । जल मार्ग के रूप् में इसका प्रयोग किया जा सकता है । नदी किनारे बसे लोगों को रोजगार और सडक तथा रेल से सस्ती सुलभ यातायात सुविधा उपलब्ध हो सकेगी । अविरल जल धारा में पानी के जीव और वनस्पति फले-फूलेंगें जिससे प्र्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी ।
डा0 सुधीर श्रीवास्तव ने निर्मल गंगा अभियान को व्यवहारिक अवधारणा बताते हुए कहा कि यह आसान काम नहीं है इसके लिए व्यपक स्तर पर तालमेल की आवश्यकता होगी । महाविद्यालय के मुख्य अनुशासक डा0 राजुल सक्सेना ने आये हुए अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद सापित किया । कार्यक्रम का संचालन डा0 अमर श्रीवास्तव द्वारा किया गया ।

विभागीय सहयोगियों में प्रमुख रूप् से डा0 अशोक कुमार श्रीवास्तव, डा0 अनिल अवस्थी, डा0 सुनील मिश्रा, डा0 राजुल सक्सेना, डा0 अनिता श्रीवास्तव, डा0 विनीता श्रीवास्तव, डा0 आभा सिंह के साथ-साथ पूर्ण रूपेण रसायन विज्ञान विभाग के समस्त लोगों का रहा ।
प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता के रूप में महाविद्यालय के डा0 अशोक कुमार श्रीवास्तव ने यह बात जोर देकर कहा कि यदि वेदों में गंगा को स्वर्ग से जोडा गया है तो उसकी यह दुर्गति क्यों ? केवल माॅं कहने से गंगा जी पवित्र नहीं हो जायेगी इसके लिए शोधार्थियों तथा सामाजिक लोगों से अपील है कि उसके लिए ईमानदारी से प्रयास करना होगा । इसी क्रम में डा0 अनीता श्रीवास्तव ने गंगा एक्शन प्लान से लेकर वर्तमान तक किये जाने वाले प्रयासों का विधिवत विश्लेषण किया ।

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