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आध्यात्म से दुखों को ख़त्म करने के मिशन पर हैं परमहंस योगानन्दिनी

 2017-01-06 10:06:47.0



उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. “अगर मेरे ज्ञान से दूसरो का जीवन संतुलित होता है, वे एक तनाव मुक्त जीवन जी सके और एक स्वस्थ शरीर के साथ रहे तो मुझे अपार ख़ुशी मिलेगी” इस संकल्प के साथ परमहंस योगानन्दिनी “पारुल वान डाम” अपनी यात्रा पर है. लखनऊ पहुंची पारुल से तहलका न्यूज ने ख़ास बात की.

फिलहाल लैटिन अमेरिकी देश प्युतो रिको में रह कर “नमस्कार सोल” नाम की अलाभकारी संस्था के जरिये योगानन्दिनी भारतीय आध्यात्म को पूरी दुनिया में फैला रही है. राजस्थान के कोटा जिले से पहले कैलिफोर्निया और डेनमार्क पहुंची जहाँ उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हुआ जिसने पारुल को योगानंदिनी बना दिया.


पारुल बताती हैं- मेरा पूरा परिवार आध्यात्मिक था और मेरे दादा जी सुखदेव प्रसाद एक रायल गुरु थे. उन्हें माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त थी और माँ दुर्गा से उनका साक्षात्कार हुआ था. हमारा परिवार प्राचीन आध्यात्मिक परम्पराओं वाला था. बाद में मुझे लगा कि मेरे अन्दर भी कुछ है वो कई बार भविष्य की घटनाओं का आभास करा देता है.
डेनमार्क के अपने अनुभव को भी वे इसी पूर्वाभास से जोड़ कर देखती हैं , पारुल बताती है कि उन्हें हमेशा एक सपना आता था जहाँ एक आम के पेड़ो से भरा घर होता जहाँ पीछे पवनचक्की चलती होती, बड़े मैदान होते, और जब मैं साल 2013 में अपने पति की नौकरी की वजह से डेनमार्क पहुची तो यह ठीक वही जगह थी. वही मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुयी. और फिर वे परमहंस योगानन्दिनी के रूप में खुद को पा गयी.



21 साल की उम्र में पारुल कलिफ़ोर्निया चली गयी थी और वहां 2009 में उनकी शादी एक साईंटिस्ट से हुयी और वे पारुल वान डाम बन गयी.आध्यात्म से उनका लगाव था इसलिए वे कैलिफोर्निया में ही ध्यान की कक्षाएं लेने लगी. पारुल बताती है- “ तब तक हमें पूर्ण ज्ञान नहीं था मगर संस्कृति और भक्ति के प्राचीन ज्ञान पर विश्वास था, यह पता था कि इसका क्या असर होता है”


“हम अगर आध्यात्म की शक्ति को पहचान लें तो अपनी उन्नति हर क्षेत्र में होगी, आध्यात्म महसूस ही किया जा सकता है इसे बयान नहीं किया जा सकता ” – परमहंस योगानंदिनी



अपनी यात्रा के बारे में योगनान्दिनी बताती हैं- “मुझे पहले माँ दुर्गा का आदेश हुआ पश्चिम जाने का तो मैं चली गयी और फिर अब आदेश हुआ इसी को आगे बढाने का. मैं परमहंस योगानंद श्रंखला में पहली योगिनी बनी जिसने लिखा है कि इस माध्यम से आपकी क्षमताएं कितने भी आगे जा सकती है. कई ऐसे भी होते हैं जिनके पास ताकत तो होती है मगर उनके उद्देश्य पवित्र नहीं होते इसलिए परम सत्ता उन्हें रोक देती है.”

योग के बढ़ते बाजार से पारुल खुश नहीं है , उनका कहना है – “योग का कांसेप्ट ही बदल गया है, अब यह मात्र हमारे शरीर तक रह गया है. जबकि योग शरीर, मष्तिष्क और आत्मा का युग्म है . यह एक उर्जा का संचार करता है जो आपके अन्दर से आती है. आत्मा का कनेक्शन तब तक सामने नहीं आता जब तक आपकी रूह न काँप जाए. आज लोगो ने अध्यात्म और योग को पेटेंट और बाजार के दायरे में डाल दिया है इससे बाहर निकलना है. ”

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