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सात समुन्दर पार भारतीय संगीत की सुगन्ध बिखेर रही हैं रेशमी कुमार

 Vikas Tiwari |  2016-10-06 06:56:55.0

rashmi-kumar

रेशमी कुमार

शायद बहुत ही कम लोगों को अब याद होगा कि जब 1830 के दशक में ब्रिटिश, फ्रेंच तथा डच उपनिवेशों में गुलामी प्रथा का अंत हुआ तो बहुत सारे भारतीय लोग गिरमिटिया (बंधुआ) मज़दूर के रूप में दुनिया के विभिन्न भागों जैसे मॉरीशस, गुयाना, ट्रिनिडाड, सूरीनाम तथा फिजी आदि देशों में धोखे, छल-कपट तथा अपहरण द्वारा गन्ने के खेतों में काम करने के लिये ले जाये गये थे।


इसमें दो तिहाई लोग अपने कठोर गिरमिट मज़दूरी की 5 वर्ष की अवधि समाप्त करने के पश्चात इन्ही देशों में स्थायी रूप से बस गये। परंतु गिरमिट मज़दूरों और उनके  वंशजों ने इन सुदूर देशों में सौ-डेढ़ सौ साल के प्रवास के बाद भी विषम आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों में भारतीय भाषा और संस्कृति को अपने सीने से लगा रखा है।


इसका एक ज्वलंत उदाहरण है हाल ही में फिजी की रेशमी कुमार द्वारा जारी किया गया हिंदी अलबम “लास्ट इन योर लव”। फिजी की रेशमी कुमार को बचपन से ही हिन्दी गानों से लगाव था तथा उनका बचपन से एक सपना था कि उनके गाये गीतों की भी रिकार्डिंग हो और देश-विदेश में लोग उनके गीत सुने। रेशमी कुमार, सावनि नसौरी, फिजी में पैदा हुई और वहीं पर पली बढ़ी।


रेशमी कुमार के पिता के पूर्वज़ कलकत्ता तथा उनकी माता के पूर्वज लखनऊ के रहने वाले थे। उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता। उनके पिता स्व. शिव कुमार मंगल फिजी के एक सुप्रसिद्ध भजन गायक थे और गायकी उनके खून में थी। अपने पिता की गायकी से प्रभावित होकर रेशमी कुमार को भी बचपन में ही गायकी में रूचि उत्पन्न हुई।


फिजी की राजधानी सुवा में उनके पिता की एक हेअर-ड्रेसर की दुकान थी, जिससे उनके घर का खर्चा बड़ी मुश्किल से चलता था। उन्होने दिलकुशा गर्ल्स स्कूल तथा आदि काकोबौ स्कूल से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात फिजी स्कूल आफ मेडिसिन से रेडियोग्राफी की पढ़ाई पूरी की। उसके पश्चात कुछ महीनों तक सी डब्लू एम हास्पिटल में रेडियोग्राफर का कार्य करने के पश्चात शादी करके वो अपने पति के साथ सिर्फ 4500 डॉलर लेकर आस्ट्रेलिया चली गयीं।


आस्ट्रेलिया आने के बाद कुछ दिनों तक वह रेडियोग्राफर का कार्य करती रहीं। यद्यपि  उनके सीने में संगीत के प्रति सदैव लगाव बना रहा और अपना संगीत का अलबम जारी करने की उत्कट तमन्ना जारी रही। परंतु विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा आर्थिक असुरक्षा की भावना के कारण अपनी इस इच्छा की पूर्ति को कुछ समय के लिए विराम दे दिया।


आर्थिक असुरक्षा की भावना से निज़ात पाने के लिये उन्होने अपना रेडियोग्राफर का कैरियर छोड़कर प्रापर्टी निवेश के क्षेत्र में भाग्य आज़माया, जिसमें उन्हे आशातीत सफलता भी प्राप्त हुई और आर्थिक रूप से काफी सशक्त हो गई। 2005 में जब वह मुम्बई आईं, तो उनकी मुलाकात संगीतकार निखिल कामत से हुई और उनको अपनी गायकी सुनाई जिससे प्रभावित होकर निखिल कामत रेशमी कुमार के साथ म्युजिक अलबम बनाने के लिये तैयार हो गये।


परंतु उस समय रेशमी कुमार के बच्चे छोटे थे तथा प्रापर्टी निवेश का व्यवसाय अपने शुरुआती दौर में था। अत: रेशमी कुमार ने म्युजिक अलबम बनाने का काम कुछ और समय के लिये स्थगित कर दिया। जब रेशमी कुमार का प्रापर्टी निवेश का व्यवसाय अच्छी तरह से चल गया और स्थायित्व प्राप्त कर लिया और बच्चे बड़े हो गये, तो उन्होने पुन: लगभग एक दशक बाद संगीत निर्देशक निखिल कामत से सोशल मिडिया द्वारा सम्पर्क किया।


म्युजिक अलबम बनाने के सन्दर्भ में निखिल कामत को एक दशक पूर्व रेशमी कुमार से की गयी मुलाकात याद आ गयी और वह तुरंत अलबम बनाने के लिये राजी हो गये। जनवरी, 2015 में जब उनके बच्चों का अवकाश चल रहा था तब वह मुम्बई आकर अपने अलबम की ऑडियो रिकार्डिंग करवायी। “लास्ट इन योर लव” नामक इन खूबसूरत गीतों के अलबम की विडियो रिकार्डिंग आस्ट्रेलिया मे हुई। इस अलबम के गीत कुछ इस प्रकार हैं। ये सभी गीत यू-ट्यूब में तथा म्युजिक स्टोर्स मे उप्लब्ध हैं।




तेरी राहों में तेरी बाहों में आने को मचले ये दिल

शाम सहर तेरी बस एक नज़र पाने को मचले ये दिल -2

तेरे इश्क में खो जाने को हर लम्हा बेताब है

दीवाना मेरा दिल दिल दिल दिवाना मेरा दिल दिल दिल.....



लब्जो में, बातों में, जज्बातों दिन रातों में तू ही तू

रहूं जिस हाल में हर पल मेरे हालातों में तू ही तू-2

तू ही मेरी ज़ुस्तज़ू मेरी ज़ुस्तज़ू मेरी ज़ुस्तज़ू ओनली यू....




मोरा सैंया सैंया, मोरा सैंया सैंया, मोरा सैंया सैंया सैंया

मोरा सैंया सैंया, मोरा सैंया सैंया, मोरा सैंया सैंया सैंया-2

पलको की छांव, सपनों का गांव, सपनों के गांव में तू

पिया सांवरा मन बावरा, करे तेरी ही आरजू

तोसे लागी जबसे नैना, नहीं चैन सारी रैना



यह भारतीय संस्कृति, भाषा, खान-पान, रस्मो-रिवाज़, नृत्य, गीत और संगीत की श्रेष्ठता का वज़न तथा साथ ही साथ प्रवासी भारतीयों के वंशजों का अपनी सांकृतिक विरासत से इतना लगाव है कि सुदूर देशों में विकट राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों में भी कि वे सैकडों सालों के प्रवास के बाद भी अपने पूर्वजों के नृत्य, गीत, संगीत एवम रस्मो-रिवाज़ को पुष्पित एवं पल्लवित करते रहे हैं। रेशमी कुमार का यह अलबम इसका जीता-जागता प्रमाण है।

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