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कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं पर गिर सकती है गाज

 Utkarsh Sinha |  2017-04-20 07:53:29.0

कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं पर गिर सकती है गाज

डा. सीमा जावेद
(स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरणविद)

कोयले आधारित संयंत्रों का संयंत्र लोड कारक (पीएलएफ) या क्षमता उपयोग छह साल पहले 76% था, लेकिन अब यह सिर्फ 58% है। नये तृतीय नेशनल इलेक्ट्रिसिटी प्‍लान (एनईपी3) के मसविदे के अनुसार वर्ष 2027 तक भारत की स्‍थापित विद्युत उत्‍पादन क्षमता का आधे से ज्‍यादा हिस्‍सा (56.5 प्रतिशत) गैर जैव-ईंधन वाले अक्षय ऊर्जा विकल्‍पों,परमाणु तथा पनबिजली आधारित हो जाएगा।

यदि 2020 तक सौर क्षमता 40,000 मेगावाट तक बढ़ जाती है - तो कई कोयला आधारित परियोजनाएं विफल हो जाएंगी. इनका कर्ज के जरिये वित्त पोषण किया जाता है इसलिए परियोजना निष्क्रिय होने पर भी कर्ज पर ब्याज का भुगतान किया जाना चाहिए ऐसे में पीएलएफ़ गिर जाने पर उच्च ब्याज लागत परियोजनाओं को मार सकता है।

वहीँ दूसरी तरफ भारत में कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता का करीब 60.8 प्रतिशत (167.2 गीगावाट) हिस्सा कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से प्राप्त होता है। स्थायित्वपूर्ण,पर्याप्त तथा किफायती बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये भविष्य में भी कोयला आधारित बिजली का उत्पादन जारी रहेगा। हालांकि एक अनुमान के मुताबिक अगर अक्षय ऊर्जा की क्षमता को योजना के अनुसार बढ़ाया गया तो वर्ष 2026-27 तक कुल बिजली उत्पादन में कोयला आधारित परियोजनाओं का योगदान घटकर 39 प्रतिशत रह जाएगा।

ऐसे में भारत अगर वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट (एक गीगावॉट 1000 मेगावॉट के बराबर है) उत्‍पादन के अपने अक्षय ऊर्जा लक्ष्‍य को हासिल कर लेता है, जैसा कि उसने वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के तहत संकल्‍प लिया था,तो उसे उसके बाद मौजूदा समय में निर्माणाधीन 50 गीगावॉट की परियोजनाओं को छोड़कर वर्ष 2027 तक कोयला आधारित नयी ऊर्जा क्षमता की जरूरत नहीं होगी।

भारत सरकार ने पहले ही कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की क्षमता में सुधार तथा उनके कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने के लिये अनेक कदम उठाये हैं। बिल्कुल नये और बड़े कोयला आधारित बिजली उत्पादन केन्द्रों की स्थापना की जा रही है ताकि अत्यन्त दक्ष सुपरक्रिटिकल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जा सके। पुराने बिजली संयंत्रों के पुनरुद्धार एवं आधुनिकीकरण तथा उनका जीवन बढ़ाने का काम चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। करीब 144 पुराने बिजलीघरों को उत्पादन क्षमता में सुधार के अनिवार्य लक्ष्य दिये गये हैं। कोयले के लाभकारीकरण को अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा कोयले का कम इस्तेमाल करने और अक्षय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिये जाने से प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके अलावा तापीय परियोजनाओं के लिये उत्सर्जन सम्बन्धी कठोर मानकों पर भी विचार किया जा रहा है। बहरहाल, अधिसूचना जारी होने के काफी समय बाद भी किसी भी तापीय विद्युत परियोजना में नये नियमों के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली नहीं लगायी गयी। प्रणाली की अधिक लागत और उद्योगों की लामबंदी इसके प्रमुख कारण हैं।

ज्ञात हो कि ऊर्जा मंत्रालय हर पांचवें साल एक राष्‍ट्रीय विद्युत योजना बनाता है,जिसमें वह पिछले पांच वर्षों के दौरान की गयी प्रगति की समीक्षा करता है और अगले 10 वर्षों के लिये व्‍यापक कार्ययोजना बनाता है। इसमें एक व्‍यापक उद्देश्‍य भी होता है जिसके तहत पूरे भारत में बिजली की पहुंच तथा वाजिब कीमतों पर ऊर्जा की दक्षतापूर्ण आपूर्ति का लक्ष्‍य होता है। एनईपी3 में इसका खाका खींचा गया है कि सरकार वर्ष 2017 से 2022 तक तथा उसके बाद के पांच सालों में 2027 तक भारत के ऊर्जा क्षेत्र विकास की किस प्रकार उम्‍मीद कर सकती है।
एक कडवी हकीकत यह भी है कि तापमान बढ़ते ही बिजली का संकट मंडराने लगा है। आए दिन बिजली कटौती की गाज जब देश की राजधानी दिल्‍ली पर गिर रही हो, तब अन्‍य जगहों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मई-जून आते-आते छोटे-मोटे शहरों में तो दो-चार घंटे भी बिजली नसीब होने के लाले पड़ जाते हैं।

आजादी के बाद से अब तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को थर्मल पावर उत्‍पादन के सहारे पूरा करने के कोशिशों में हमें नाकामयाबी हाथ लगी है।हर साल ही ग्रिड फेल होने की घटनाओं ने संकेत दे दिया था कि जीवाश्म ईंधन और कोयले पर आधारित बिजली बहुत भरोसे लायक नहीं है और यह कभी भी धोखा दे सकती है।

गौरतलब है कि करीब 210 गीगावाट क्षमता के साथ भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा बिजली उत्‍पादक देश है और इसकी 66 फीसदी बिजली का उत्‍पादन कोयला दहन से होता है। जाहिर है कि बिजली संकट का समाधान दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही कोयला दहन वाली प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता बढ़ाकर संभव नहीं है। बिजली संकट के टिकाऊ और दीर्घकालिक हल के लिए हमें अक्षय ऊर्जा के स्रोतों जैसे सौर और बायोमास में निवेश बढ़ाकर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का एक ठोस बुनियादी ढांचा बनाने की दिशा में तत्पर होना होगा।

कोयला आधारित बिजली उत्पादन कितना घातक है, इसका पता एक रिपोर्ट से चलता है, जो बताती है कि 2011-12 में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन के कारण देश में एक लाख लोगों की असमय मृत्यु हो गई। इनमें से 8,800 लोग दिल्‍ली और हरियाणा के हैं। रिपोर्ट ने यह भी खुलासा किया है कि कोयला विद्युत संयंत्रों से होने वाले इस उत्सर्जन से अन्य करोड़ों भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन से पता चलता है कि कोयला आधारित बिजली स्टेशनों से उत्सर्जन के कारण दमा, श्वसन समस्या और हृदय रोग के लाखों मामले सामने आए हैं। बिजली संयंत्र की स्थापना हवा के रुख और जनसंख्या घनत्व पर केंद्रित होती है, इसलिए दिल्ली-हरियाणा और पश्चिम बंगाल-झारखंड क्षेत्र में समस्या सबसे गंभीर है। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़-झारखंड-ओडिशा क्षेत्र (कोरबा, सिंगरौली और तालचेर का इलाका) भी खतरनाक जोन में आता है। इसके अलावा मुंबई और पश्चिमी महाराष्ट्र, पूर्वी आंध्र प्रदेश और चंद्रपुर-नागपुर विदर्भ क्षेत्र में भी मृत्यु दर अधिक है।

गौरतलब है कि पिछले पांच साल में देश में नई कोयला खदानों और कोयले पर आधारित ताप बिजली घरों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। अगर 2007 से पहले की स्थिति और 2007 से 2011 के बीच कोयला खदान लीज एरिया और कोयला उत्पादन क्षमता पर नजर डालें, तो वह करीब-करीब दोगुना हो चुका है। इन सभी नई कोयला खदानों और प्रस्तावित बिजली घरों में ज्यादातर मध्य भारत के उसी क्षेत्र में हैं, जहां घने जंगल है। यानी ये वन क्षेत्रों और उनमें बसे आदिवासियों की आजीविका के लिए खतरा हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी वन संसाधनों का विनाश किया गया, तब इन समुदायों को विस्थापन और दरिद्रता के दलदल में धकेल दिया गया।

ग्‍लोबल वार्मिंग के खतरे को देखते हुए भी कोयला आधारित बिजली घरों का समर्थन नहीं किया जा सकता। दुनिया में सालाना लगभग 11 अरब टन कार्बन डाई ऑक्‍साइड कोयला दहन से पैदा होती है। यह सच है कि अब अक्षय ऊर्जा के विकास के बाद कोयला बाजार में उपलब्ध सबसे सस्ता जीवाश्म ईंधन नहीं रह गया है, इसकी वास्तविक कीमत और भी बहुत अधिक है। मानव और पर्यावरण को यह भीषण नुकसान पहुंचाता है, लिहाजा कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर अंकुश लगाकर ही हम जलवायु परिवर्तन को रोक सकते हैं।

अगर राजधानी दिल्ली की ही बात करें, तो यहां तीन-चौथाई बिजली अन्य राज्यों में स्थित कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से आती है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कोयले का दाम बढ़ने के कारण पिछले साल 32 मुख्य पावर प्लांट और दिल्ली को बिजली की आपूर्ति करने वाले पांच पावर प्लांटों मेआठ सौ मेगावाट बिजली के उत्पादन में कमी आई। दूसरी ओर ठीक इसी वक्त सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र ने अनुमान से अधिक बिजली उत्पादन किया। कोयले की कमी के चलते एनटीपीसी की उपयोगिता क्षमता में 7.8 अरब किलोवाट की गिरावट आई है। कोयले की कमी के कारण इस समय एनटीपीसी द्वारा चालित थर्मल पावर प्लांट के उत्पादन में बीस प्रतिशत गिरावट आई है। मतलब साफ है कि आने वाली भीषण गर्मी में भरोसेमंद और टिकाऊ बिजली के लिए सिर्फ कोयला जलाकर बिजली उत्‍पादन से काम नहीं चलने वाला। लेकिन विडंबना यह भी है कि दिल्ली देश के उन राज्यों में से है, जिनके पास पवन व सौर ऊर्जा तथा बायोमास जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने की कोई नीति नहीं है।

इस मसविदे को दिसम्‍बर 2016 में जब जारी किया गया था,तब भारत में केवल 50 गीगावॉट से कुछ ज्‍यादा ही अक्षय ऊर्जा क्षमता थी। उसमें भी वायु आधारित बिजली का हिस्‍सा 57.4 प्रतिशत तथा सौर ऊर्जा का हिस्‍सा 18 प्रतिशत था। इससे भारत की कुल स्‍थापित 314 गीगावॉट क्षमता में अक्षय ऊर्जा की हिस्‍सेदारी 15 प्रतिशत थी,वहीं कोयला आधारित बिजली की हिस्‍सेदारी 60 प्रतिशत थी। बाकी हिस्‍सा बड़ी पनबिजली परियोजनाओं, परमाणु,गैस तथा डीजल आधारित बिजली का है। अक्षय ऊर्जा उत्‍पादन को वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट तक बढ़ाने के वर्ष 2015 के राष्‍ट्रीय लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिये बहुत तेजी से काम करना होगा। इसमें 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा, 60 गीगावॉट हवा आधारित ऊर्जा तथा बाकी हिस्‍सा जैव ईंधन तथा बायोमास जैसे लघु स्रोतों से जुटाना होगा। एनईपी3 के अनुमानों के अनुसार न सिर्फ वर्ष 2022 का लक्ष्‍य प्राप्‍त होगा,बल्कि वर्ष 2027 तक अक्षय ऊर्जा क्षमता भी 275 गीगावॉट तक पहुंच जाएगी। यह एनईपी2 में व्‍यक्‍त अनुमानों का तीन गुना है,जिसमें 70 गीगावॉट की बात कही गयी थी। साथ ही एनईपी3 सार्वजनिक रूप से घोषित लक्ष्‍यों के मुकाबले उल्‍लेखनीय रूप से अधिक महत्‍वाकांक्षी है।

यह हमारे योजनाकारों के लिए चेतावनी की तरह है। कोयला खनन देश के जंगलों, आदिवासी समुदायों और लुप्तप्राय प्रजातियों को नष्ट कर ही रहा है, कोयला जलाने से हो रहा प्रदूषण हजारों लोगों को असमय काल के गाल में धकेल रहा है। इसके बावजूद वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में हम कोई काम नहीं कर रहे। जबकि अपने देश में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। जरूरत सिर्फ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहित करने की नीति की है।

एनईपी3 निश्चित रूप से अधिक महत्‍वाकांक्षी है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2021-22 तक भारत अपनी संचयी स्‍थापित ऊर्जा क्षमता का 46.8 प्रतिशत हिस्‍सा और 2027 तक 56.5 प्रतिशत हिस्‍सा गैर जैव-ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों से प्राप्‍त करेगा। अगर एनईपी3 के लक्ष्‍यों को अनुमानित समयसीमा में हासिल किया जा सका,तो भारत की कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता वर्ष 2024 के करीब कोयला आधारित क्षमता से ज्‍यादा हो जाएगी।

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