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परम्परागत अनोमा नदी की बदहाली

 Avinash |  2017-02-28 16:40:45.0

परम्परागत अनोमा नदी की बदहाली

डा. राधेश्याम द्विवेदी

वर्तमान आमी नदी का पुराना नाम अनोमा है। अनोमा का मतलब सामान्य होता है। हो सकता है कि इस नदी के सामान्य आकार और स्वरुप के कारण इसका अनोमा जैसा छुद्र नाम रहा हो। छोटी नदी होते हुए भी इस नदी में हमेशा कुछ ना कुछ पानी जरुर रहता है। यह बौद्ध साहित्य में वर्णित एक प्रसिद्ध नदी है। बुद्ध की जीवन-कथाओं में वर्णित है कि सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु को छोड़ने के पश्चात इस नदी को अपने घोड़े चन्दोखा या कंथक से पार किया था और यहीं से अपने परिचारक छंदक को विदा कर दिया था। इस स्थान पर उन्होंने राजसी वस्त्र और आभूषण उतार कर अपने केशों को काट कर फेंका था। किंवदंती के अनुसार उत्तर प्रदेश के पुराने बस्ती जिला के खलीलाबाद रेलवेस्टेशन से लगभग 6 मील दक्षिण की ओर जो कुदवा नाम का एक छोटा-सा नाला बहता है वही प्राचीन अनोमा है। और चूंकि सिद्धार्थ के घोड़े ने यह नदी कूद कर पार की थी इसलिए कालांतर में इसका नाम कुदवा भी हो गया। कुदवा स्थानीय शब्द है जिसका तात्पर्य होता है-कूदना। कुदवा कठनइया नदी का एक प्राचीन नाला भी कहा गया है। यह कठनइया के सामानान्तर में बहती है। यह केवल पांच किमी. ही तय करती है।

कुदवा से एक मील दक्षिण-पूर्व की ओर एक मील लम्बे चौड़े क्षेत्र में खण्डहर हैं जहाँ तामेश्वरनाथ का वर्तमान मंदिर है। युवानच्वांग के वर्णन के अनुसार इस स्थान के निकट अशोक के तीन स्तूप थे जिनसे बुद्ध के जीवन की इस स्थान पर घटने वाली उपर्युक्त घटनाओं का बोध होता था। इन स्तूपों के अवशेष शायद तामेश्वरनाथ मंदिर के तीन मील उत्तर पश्चिम की ओर बसे हुए महायान डीह नामक ग्राम के आसपास तीन ढूहों के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। यह ढूह मगहर स्टेशन से दो मील दक्षिण-पश्चिम में हैं। श्री बी0 सी0 लॉ के मत में गोरखपुर जिला की ओमी नदी ही प्राचीन अनोमा है। प्रसिद्ध पुराविद ए. फ्युहरर के कथन का समर्थन कालाइल ने भी किया है। यह नाला उत्तर में बानगंगा या बान नदी कहलाती है तथा यह दक्षिण में कुदवा या आमी कहलाती है। वान संस्कृत का शव्द है। बाद में इसे अनु-वान्या कहा गया जो कालान्तर में अनोमा बना। राप्ती एक धारा बेरार बनकटा के पास आमी में मिलता है। जिससे यह एक चौड़ी नदी का आकार पा लेता है। इसी में कुदवा नाला मीरगंज के पास मिलता है। वाद में आमी गोरखपुर में राप्ती में बिलीन हो जाती है।

गौरवमयी आमी की बदहाली:- आमी या अनोमा नदी सदियों की गौरवगाथा का दस्तावेज है। अनोमा नदी बौद्ध साहित्य में प्रसिद्ध नदी है। बुद्ध की जीवन कथाओं में वर्णित है कि सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु को छोड़ने के पश्चात् इस नदी को अपने घोड़े कंथक पर पार किया था और यहीं से अपने परिचारक छंदक को विदा कर दिया था। इस स्थान पर उन्होंने राजसी वस्त्र उतार कर अपने केशों को काट कर फेंक दिया था। यह गौतम बुद्ध के गृह त्याग की गवाह है। कबीर की आखिरी यात्रा की भी साक्षी है। महान गुरू गोरक्षनाथ और कबीर के शास्त्रीय संवाद की प्रतीक है। यह गाँव की गंगा है। सैकडो गाँवों के लोगों के लिए जीवनदायिनी रही है, लेकिन समाज की संवेदनहीनता ने इसे जहरीला कर दिया है। अब आमी के जहरीले पानी से जीवन टूट रहा है। जो बच्चे इसके पानी में छपछपा छप छैया करते हुए जवान हुए वे इसे मरते हुए देख रहे हैं। लगभग 80 किलोमीटर लम्बी यह नदी सिद्धार्थ नगर जिले के डुमरियागंज तहसील के रसूलपुर परगना के पास राप्ती के छादन से निकल कर संतकबीर नगर जिले से होते गोरखपुर जिले के सोहगौरा के पास राप्ती नदी में मिल गयी है। इसके तट पर रसूलपुर से लेकर सोहगौरा तक 400 से अधिक गाँव बसे हैं।

इनमे मगहर से आगे कतका, मंझरिया, विनायका, सोहराम, बरवाल्माफी, जराल्ही, गादर, बेल्वादादी, तेनुआ, सोह्रा बेल्दांड, धरौना, रक्षा नाला, भाम्सी, बड़ा गाँव, भदसार, तेलियादीह, आदिलापार, जगदीशपुर, लालपुर, गोद्सरी, भिठामरअय्न्तीपुर, कुइकोल, शाहीदाबाद, सोहगौरा प्रमुख है। मगहर से लेकर गीडा तक की औद्योगिक इकाइयों ने इस पौराणिक नदी को अपना गटर बना लिया है। इसका चमकता जल काला हो गया है। लेकिन दुखद तथ्य यह है कि गाँव की इस गंगा को बचाने के लिए कदम नही उठ रहे हैं। इसे बचाने के नाम पर जो आवाज गूँज भी रही है वह सरकार प्रशासन और राजनेताओं के बंद कानों को सुनाई नही दे रही है। इतिहास गवाह है कि आमी की धारा ने कई प्रतिमान बनाए हैं। कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ का नश्वर संसार से मोह भंग हुआ तो वे ज्ञान की तलाश में निकल पड़े।

अनूपिया नामक स्थान पर उन्होंने तब की अनोमा नदी को पार किया। इस नदी के दूसरे छोर पर उन्होंने अपना मुकुट उतारा और राजसी वस्त्र त्याग कर सारथी को सौंप दिया। राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान मिलने पर गौतम बुद्ध बने। इसी अनोमा नदी को इतिहासकारों ने आमी नदी के रूप में पहचाना है। बौद्ध धर्म के विस्तार के समय इस नदी के किनारे कई बौद्ध विहार बने। इन बिहारों से बुद्धं शरणम गछामि का उदघोष होता था। गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के दो हजार वर्षों तक इस नदी का पानी ज्ञान और बौद्धिक ऊर्जा का स्रोत बना रहा। इसी नदी पर कबीर ने आखिरी साँस ली। रूढियों के खिलाफ जब कबीर ने अपनी आखिरी यात्रा के लिए मगहर को चुना तो इस नदी के तट पर उन्हें ऊर्जा मिली। यहीं पर गुरू गोरक्ष से उनका संवाद हुआ। अब यह नदी मैली हो गयी है। सूख रही है। सिमट रही है और लोगों से टूट रही है। डुमरियागंज से निकली आमी नदी रुधौली, बस्ती, संत कबीर नगर, मगहर एवं गोरखपुर जिले के करीब ढाई सौ गांवों से होकर बहती है। यह नदी कभी इन गांवों को हरा-भरा रखती थी। गोरख, कबीर, बुद्ध एवं नानक की तपोस्थली रही आमी आज बीमारी और मौत का पर्याय बन चुकी है। यह नदी 1990 के बाद तेजी से गंदी हुई।

रुधौली, संत कबीर नगर एवं 93 में गीडा में स्थापित की गईं फैक्ट्रियों से आमी का जल तेजी से प्रदूषित हुआ। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला कचरा सीधे आमी में गिरता है। आमी के प्रदूषित हो जाने के चलते इलाके से दलहन की फसल ही समाप्त हो गई। गेहूं और तिलहन का उत्पादन भी खासा प्रभावित हुआ है। पेयजल का भीषण संकट है। नदी तट से तीन-चार किमी तक हैडपंपों से काला बदबूदार पानी गिरता है। आमी तट के गांव में जब महामारी आई तो सीएमओ की टीम ने अपनी जांच में पाया कि सभी बीमारियों की जड़ आमी का प्रदूषित जल है। आमी के प्रदूषण के चलते मगहर, सोहगौरा एवं कोपिया जैसे गांवों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। यह पानी पशुओं के पीने के लायक तो माना गयाए मगर इन नदियों के तट पर बसे गांवों के लोग पशुओं को यह जल नहीं पीने देते। हमें इस विलीन हो रहे नदी को अविरल प्रवाहित होने के साथ साफ सुथरा बनाने में सहयोग करना चाहिए। इसके मिथकीय इतिहास से लोगों को परिचित कराते हुए इसके प्राचीन गौरव को पुनः दिलाने के लिए प्रयारत होना चाहिए।

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