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विकास की गंगा बहाने से पहले प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की ज़रुरत

 Avinash |  2017-03-20 15:18:38.0

विकास की गंगा बहाने से पहले प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की ज़रुरत

डा सीमा जावेद( स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरणविद )

जनसंख्या के आधार पर 20 करोड़ लोगों की आबादी वाला उत्तर प्रदेश देश अपने 75 जिलों में 814 ब्लॉक और 97607 गांवों के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य है उत्तर प्रदेश की आबादी ब्राजील देश के बराबर है, जो भारत की आबादी का 16.2 प्रतिशत है. साथ ही यह देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री और कद्दावर नेता देने वाला राज्य भी है. इनमें जवाहर लाल नेहरु, लाला बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, वी पी सिंह, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेई सहित वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हैं पर मानव विकास के मामले में यह अपनी धीमी विकास कि रफ़्तार और गरीबों उच्च एकाग्रता के चलते देश के पिछड़े राज्यों में शामिल है

ऐसे में राज्य के नये प्रथिनिधित्व से सब से पहले विकास की गंगा बहाने की उम्मीद वाजिब है पर विकास के दौड़ से भी पहले बात बुनयादी जरूरतों के आती है जैसे साँस लेने के लिए साफ हवा, साफ पीने का पानी, पेट भर भोजन, बेरोजगारों के लिए रोज़गार के अवसर, अँधेरे में डूबे गावों के लिए रोशनी एवं सहित स्वास्थ्य सेवाओ की स्थिति में सुधार की ज़रूरत है.
पिछले 15 वर्षों के दौरान जहाँ उत्तर प्रदेश की जनसँख्या में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, वहीं दूसरी ओर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में 8% की गिरावट आई है। देश में बीमारियों से हुई मौतों के मामलों में उत्तर प्रदेश बाकी राज्यों से कहीं आगे है। भारत में टाइफाइड से हुई मौतों में से 48 प्रतिशत मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं। कैंसर से मरने वाले लोगों में उत्तर प्रदेश की भागीदारी 17% है जबकि टीबी से मारने वाले कुल लोगों में 18% लोग उत्तर प्रदेश से होते हैं। प्रदेश में गर्भवती महिलाओं की दयनीय स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज़ादी के 72 सालों बाद भी यहाँ 42% महिलाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं है।

दिसंबर 2016 में जारी किए गए, 2015 के लिए नवीनतम नमूना पंजीकरण प्रणाली बुलेटिन के अनुसार, 36 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर, प्रति 1000 जीवित जन्मों पर होने वाली मौत) के मामले उत्तर प्रदेश नीचे से तीसरे स्थान पर है। अपेक्षाकृत कई गरीब राज्य उत्तर प्रदेश की तुलना में काफी बेहतर हैं।
नवीनतम उपलब्ध राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 71वें दौर के आंकड़ों के आधार पर एक संस्था 'ब्रूकिंग्स इंडिया' द्वारा हाल के एक शोध के अनुसार उत्तर प्रदेश प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य पर हर साल 488 रुपये खर्च करता है। उत्तर प्रदेश के 20 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा 4 फीसदी तक पहुंचा है। इस मामले में अखिल भारतीय औसत 15 फीसदी है। वर्ष 2006 से लेकर 2014 तक विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों में उत्तर प्रदेश की गिनती स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे पिछड़े 8 राज्यों में होती थी।

देश भर में दर्ज हुए जापानी इन्सेफेलाइटिस (जेई) मामलों में से 75 फीसदी से अधिक मामले उत्तर प्रदेश में पाए गए हैं। वर्ष 2016 में, देश भर में 1,277 एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) मौतों की सूचना मिली थी, जिसमें से 615 मामले उत्तर प्रदेश से थे। इसी तरह देश भर में दर्ज हुई 275 जेई मौतों में से 73 मामले उत्तर प्रदेश से थे। यहां पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में, जहां हर साल जेई / एईएस से कई लोगों की जान जाती हैं और हर वर्ष आखबार की सुर्खियाँ इस की दास्ताँ बयां करती हैं पर अगले वर्ष नतीजा फिर वही ढ़ाक के तीन पात नज़र आता है यह वर्ष 1978 ले लेकर अब तक पिछले लगभग तीन दशक से प्रदेश के पूर्वी शहरों के एक महामारी के रूप में चुनौती बना हुई है. इनमें गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, संत कबीर नगर शामिल हैं. ऐसे में श्वसन रोग, अस्थमा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, कैंसर जैसे अनेक रोगों का ज़िक्र करना और उनकी देखभाल के सरकारी प्रयासों की बात करने का कोई मतलब नज़र नहीं रह जाता. रही बात प्राइवेट इलाज की जो समान्य नौकरी पेशा लोगों के लिए पहुँच से उपर पर मजबूरी नज़र आता है क्योंके सरकारी सुविधाओं के आभाव में कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता. अव्वल प्रदेश में हेल्थ बिमा का प्रतिशत नगण्य है ऐसे में जो लोग सक्षम है वह भी बीमारी के चपेट में आकर लूट जाते हैं जो ग्रामीण जनता है वह अक्सर अपनी ज़मीन बेच कर या गहने रख कर इलाज भले ही करवा ले पर आगे उसके लिए जीविकोपार्जन के रास्ते नहीं रहते. कुल मिलाकर बीमारी से मरे या फिर इलाज करा कर भूख से मरे .

यूपी में गर्भवती महिलाओं की मदद के लिए बनी एनआरएचएम (नेशनल रूरल हेल्थ मिशन) में करीब 50 हजार करोड़ रुपये घोटाले के बाद उसके क्रियान्वयन की बात बेमानी हो जाती है। गौरतलब है कि इस योजना का उदेश्य पंचायती राज संस्था नों का सुदृढ़ीकरण करके और प्राधिकृत महिला स्वाकस्य्रत कार्यकर्ताओं (आशा) के माध्यहम से उच्चीयकृत स्वासस्य्नो देखभाल तक पहुंच को बढ़ावा देना है। इसके द्वारा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा में सुधार कर उसे ऐसा रूप देना जिससे प्रा‍थमिक स्वस्थालय केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य मिशनों को सुदृढ़ बना कर गाँव गाँव तक अच्छी स्वास्थ्य देखभाल मुहैया करवाना है हाई रिस्क प्रेग्नेंसी महिलाओं की तादाद उत्तर प्रदेश में बढ़ती जा रही है। हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं के लिए प्रदेश सरकार करोड़ों रूपयें खर्च करती है, लेकिन उसका लाभ ऐसी महिलाओं तक नही पहुँच पा रहा है। जब मात्र एवं शिशु कल्याण एवं फॅमिली प्लानिंग स्वास्थ्य सेवा में सुधार में सफलता अभी बाकी है तो फिर और स्वास्थ्य चुनातियों की बात क्या करें. दरअसल राज्य के द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर कम खर्च और निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की दमदार मौजूदगी की वजह से 80 फीसदी स्वास्थ्य खर्च परिवारों द्वारा स्वयं किया जाता है। जो न केवल प्रदेश की बीपीएल या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली आबादी के लिए समस्या है बल्कि निम्न माध्यम वर्गीय परिवारों के लिए भी एक क़र्ज़ का बोझ बन जाती है .

रोग की रोकथाम और उपचार के लिए आज हमारे पास जिस स्तर की सुविधाएं, ससांधन एवं तकनीक उपलब्ध हैं उन्हें देखते हुए प्रदेश में व्याप्त असमय मृत्यु, अनावश्यक बीमारियां और अस्वस्थ परिस्थितियों को एक विडंबना कहना ही उचित होगा. बुनियादी ढांचे की आपूर्ति में चिकित्सा पर व्यय का 86 प्रतिशत तक लोगों को अपनी जेब से चुकाना होता है. स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं का असमान वितरण एक और चुनौती है कुल मिलाकर शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति ज्यादा बदतर है। इसके अलावा बड़े निजी अस्पतालों के मुकाबले सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का घोर अभाव है। प्रदेश में तीव्र और अनियोजित शहरीकरण के कारण शहरी निर्धन आबादी और विशेषकर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। आबादी का यह हिस्सा सरकारी और निजी अस्पतालों के समीप रहने के बावजूद स्वास्थ्य सुविधाओं को हासिल कर पाने में आज भी अक्षम दिखता है. हालाँकि सरकारी घोषणाओं में तो राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत सभी चिकित्सा सेवाएं सभी व्यक्ति को निःशुल्क उपलब्ध हैं.

वर्ष 2000 में बनी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मुख्य उद्देश्य 2045 तक स्टेबल पॉपुलेशन की स्थिति हासिल कर करना था, जिससे आर्थिक और सामाजिक विकास हो और सबके लिए समान रूप से स्वच्छ वातावरण उपलब्ध हो सके. लेकिन जो स्थिति है, उससे प्रदेश में इस स्थिति तक कब पहुंच पाएंगे यह एक यक्ष प्रश्न है.

लगभग यही हाल प्रदेश में जनम पंजीकरण दर की है भारत में बच्चों के जन्म के पंजीकरण का समग्र स्तर 2013 में 85.6 फीसदी से बढ़ कर 2014 में 88.8 फीसदी हुआ है। उत्तर प्रदेश में जन्म पंजीकरण प्रगति नहीं हुई है। राज्य में 68.3 फीसदी से ज्यादा जन्मों के पंजीकरण नहीं हुए हैं।जनम पंजीकरण दर के मामले में 39.1 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश का जन्म पंजीकरण सबसे नीचे है, जबकि राष्ट्रीय औसत 71.9 फीसदी है।

उत्तर प्रदेश में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में आधे से ज्यादा डॉक्टर हैं। यह अनुपात देश भर में सबसे अधिक है। यह शायद अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के पर्याप्त संख्या नहीं होने का एक नतीजा है। उत्तर प्रदेश में, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी सबसे कम है। यह संख्या करीब 19.9 फीसदी है, जबकि भारतीय औसत 38 फीसदी है। प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 50 फीसदी नर्सिंग स्टाफ की कमी है।ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी- 2016 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरुरती की तुलना में मात्र पचास फीसदी स्टाफ हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इलाज को हर नागरिक का बुनियादी अधिकार बनाने का सुझाव रखा है। इस सिफारिश के मुताबिक- राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अधिनियम- बना तो इलाज से वंचित कोई नागरिक कोर्ट की पनाह ले सकेगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2015 के मसविदे में धन जुटाने के लिए शिक्षा अधिभार की तर्ज पर ही नया टैक्स लगाने का सुझाव दिया गया है। ये अधिभार तंबाकू, शराब आदि जैसी सामग्रियों की बिक्री और ऐसी परियोजनाओं पर लगाने को कहा गया है जिनसे लोग विस्थापित होते हैं या जिनसे प्राकृतिक परिवास पर प्रतिकूल असर होता है। मसविदे में सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने की अनुशंसा की गई है- यानी प्रति नागरिक 3,800 रुपए प्रति वर्ष। ध्यानार्थ है कि 2002 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में जीडीपी का 2 फीसदी हेल्थकेयर पर खर्च करने की बात कही गई थी, लेकिन वो लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ। विकसित देशों ने अपने नागरिकों के अनिवार्य इलाज की व्यवस्था की है। इसके दो चर्चित मॉडल हैं। ब्रिटेन का नेशनल हेल्थ सर्विस, जिसमें सारा इलाज सरकारी अस्पतालों में होता है।

दूसरी ओर अमेरिका में सबको मेडिक्लेम की सुविधा मुहैया कराई गई है। भारत ने निजी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देकर अमेरिका की तर्ज़ पर चलन तो शुरू कर दिया पर उत्तर प्रदेश बिहार झारखण्ड जैसे राज्यों में यह तर्ज़ क्या गुल खिलाएगी यह छिपा नहीं है, जहाँ स्वास्थ्य बीमा तो दूर की बात है लोगों को खाने के लाले हैं और कुपोषण एक गंभीर समस्या है .बच्चों के स्वास्थ्य एवं उनमें कुपोषण के सम्बन्ध में समय-समय पर कराये गये नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-।।। के अनुसार उत्तर प्रदेश में 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं तथा प्रदेश में हर दूसरा बच्चा कुपोषित पाया गया है। कुपोषित बच्चों में मृत्यु की सम्भावना सामान्य बच्चों की तुलना में 09 गुना अधिक होती है। विष्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बच्चों में लम्बाई के अनुपात में कम वजन होना, किसी भी देश/प्रदेश में स्वास्थ्य और पोशण सेवाओं की गुणवत्ता का आंकलन करने का एक महत्वपूर्ण मापदण्ड है।

प्रदेश में राज्य पोषण मिशन एवं बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के अन्तर्गत समन्वित बाल विकास योजना के माध्यम से आंगनवाड़ी केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं और बच्चों, किषोरी, बालिकाओं, गर्भवती/धात्री महिलाओं के लिए अनुपूरक पोषाहार का वितरण कराकर कुपोशण की समस्या को दूर किये जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी प्रकार चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा भी ग्राम स्वास्थ्य एवं पोशण दिवस पर बच्चों एवं माँ की प्रसव पूर्व जाँच, टीकाकरण एवं आयरन/फोलिक एसिड गोलियों का वितरण किया जाता है तथा चयनित जनपदों में पोशण पुर्नवास केन्द्र स्थापित कर गम्भीर कुपोषित बच्चों का उपचार किया जाता है। इस क्रम में जनपद स्तर, विकास खण्ड स्तर तथा ग्राम स्तर तक कुपोषण का वास्तविक आंकलन, आँकड़ों का रखरखाव तथा रणनीति बनाकर इस समस्या का समाधान किया जाना है। फिर भी प्रदेश में कुपोषण की समस्या जस की तस ऐसे में निजी स्वास्थ्य व्यय कम से कम उत्तर प्रदेश के लिए तो प्रगति का संकेतक नहीं बन सकता.





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