गंगा तुम मैली बहती हो क्यों ?

 2017-02-25 13:52:01.0

गंगा तुम मैली बहती हो क्यों ?


डॉ. सीमा जावेद



गंगा की गोद में पूरे उत्तर भारत के संस्कृति और सभ्यता पली बड़ी और परवान चढी और यही उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप साबित हो रहे हैं. इस नदी के आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व की तुलना प्राचीन मिस्र वासियों के लिए नील नदी से की जा सकती है. लेकिन समय के साथ इस संस्कृति और सभ्यता की अब दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक हो गई है. दरअसल बरसों की कवायद और करोड़ों रुपया बहकर भी गंगा हो या यमुना या फिर देश की अन्य प्रमुख नदियां सभी सीवेज का मैला ढोते-ढोते एक गंदा नाला बन चुकी है. मैला ढोने की प्रथा से भारत की निम्न जातियों को भले ही मुक्ति मिल चुकी हो पर भारत की नदियों को नहीं मिली. इनकी स्थिति आज भी दयनीय बनी है.

यूईसीपीसीबी (UECPCB) अध्ययन के अनुसार, जबकि पानी में मौजूद कोलिफोर्म (coliform) का स्तर पीने के प्रयोजन के लिए 50 से नीचे, नहाने के लिए 500 से नीचे तथा कृषि उपयोग के लिए 5000 से कम होना चाहिए. हरिद्वार में गंगा में कोलिफोर्म का वर्तमान स्तर 5500 पहुंच चुका है.

2071 कि.मी तक के आपने सफर में भारत तथा उसके बाद बंगाल में अपनी लंबी यात्रा करते हुए गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है. सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है. ऋषिकेश से लेकर कोलकाता तक इसके किनारे बससे 2,367 बड़े मंझले और छोटे शहरों का संजाल है अपने ढाई हज़ार किलोमीटर के सफ़र में यह 29 बड़े शहर, 48 कस्बे और 23 छोटे नगरों का सीवेज ढोने के अलावा, गंगा के किनारे परमाणु बिजलीघर से लेकर रासायनिक खाद तक के कारख़ाने का कचरा अपनी गोद में सम्म्हित करती है. कानपुर तक आते-आते गंगा का पानी इतना गंदा हो जाता है कि उसमें डुबकी लगाना तो दूर, वहाँ खड़े होकर साँस तक नहीं ली जा सकती. गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है. विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है.

भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा आक्सीजन डेवलेपमेंट एडमिनस्ट्रिशन द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन के मुताबिक गंगा किनारे बसे प्रथम श्रेणी के 29, द्वितीय श्रेणी के 23 शहरों और 48 कस्बों में बसने वाली 35 करोड़ से अधिक की आबादी गंगा में 1.3 अरब लीटर मलमूत्र रोज इस पवित्र नदी में उड़ेलती है.

इसी अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 60 लाख टन रासायनिक खाद और 9000 टन कीटनाशक प्रतिदिन गंगा में गिरते हैं. 26 करोड़ टन औद्योगिक कचरा भी गंगा को जहरीला बनाता है.
अपने शैशव काल में ही इसे हरिद्वार से ही सीवेज का बोझ उठाना पद जाता है हरिद्वार शहर में प्रतिदिन 85 एमएलडी सीवेज कचरे का उत्पादन होता है. जबकि शहर के पास सिर्फ 40 एमएलडी का सीवेज शोधन संयंत्र है. उस पर रात में अक्सर यह बंद पड़ा रहता है. गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर बीडी जोशी और सुशील बदौला के अध्ययन के मुताबिक 1968 में बसे शहर हरिद्वार के 16 नाले प्रतिदिन शहर का सारा ऑर्गेनिक कचरा और खाद्य कचरा बिना किसी उपचार के सीधे गंगा में खदेड़ते हैं.

वाराणसी में हर रोज कुल 300 एमएलडी सीवेज जनित होता है. इसमें से दीनापुर, भगवानपुर और डीएलडब्ल्यू एसटीपी में करीब 101.8 एमएलडी सीवेज का उपचार किया जाता है शेष गंगा में गिरा दिया जाता है. वाराणसी में जेएनएनयूआरएम द्वारा 120 एमएलडी का एसटीपी गोइठा में बनाया जाना है. एसटीपी को सतुआ में बनाया जाना था, लेकिन जमीन का विवाद हल होने में छह साल लग गए इलाहाबाद में बनी सीवर लाइन घरों से नहीं जोड़ी गयी है और गैर शोधित पानी सीधे गंगा में जा रही है.

गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य. गंगा की इसी दशा को देख कर मशहूर वकील और मैगसेसे पुरस्कार विजेता एमसी मेहता ने 1985 में गंगा के किनारे लगे कारख़ानों और शहरों से निकलने वाली गंदगी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी.

फिर सरकार ने गंगा सफ़ाई का बीड़ा उठाया और गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई.
अप्रैल1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई और बीस सालों में इस पर 1200 करोड़ रुपये खर्च हुए लेकिन इसके अपेक्षित नतीजे नहीं मिले और गंगा मैली की मैली ही रह गई. यह 15 साल चला. मार्च 2000 में इसे बंद कर दिया गया. इसी बीच अप्रैल 1993 में तीन और नदियों यमुना, गोमती और दामोदर के साथ गंगा एक्शन प्लान-दो शुरू किया गया, जो 1995 में प्रभावी रूप ले सका. दिसंबर 1996 में गंगा एक्शन प्लान-दो को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में विलय कर दिया गया. फरवरी 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) का गठन किया गया. इसमें गंगा के साथ यमुना, गोमती, दामोदर व महानंदा को भी शामिल किया गया. 2011 में इस कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का गठन एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में किया गया. उसके बाद भ्रष्टाचार मुक्त भारत की संकल्पना की ही तर्ज पर ब्रह्म-द्रव गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए वर्षों से अकूत संपदा एक्शन प्लान के रूप में बहायी जाती रही है लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. इस क्रम मंव नवंबर, 2008 में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया.

मगर इससे भी कुछ हासिल नहें हो सका. फिर स्वच्छ गंगा अभियान वाराणसी तथा समीपवर्ती स्थानों में गंगा को साफ़ करने के लिए एक सस्ता और सुरक्षित तरीका निकला गया पर यह भी गंगा को साफ़ करने में नाकामयाब रहा. प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गंगा नदी में प्रदूषण पर नियंत्रण करने और इसकी सफाई के लिया अपना ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में 'नमामि गंगे' अभियान शुरू किया और इस के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने केंद्रीय बजट 2014-15 में 2,037 करोड़ रुपयों की आरंभिक राशि निर्धारित की. इसी परियोजना के हिस्से के रूप में भारत सरकार ने गंगा के किनारे स्थित 48 औद्योगिक इकाइयों को बन्द करने का आदेश दिया है. विभिन्न उपकरणों की मदद से विशेष सफाई अभियान चलाया जा रहा है. जून 2015 से इसे आठ शहरों कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, मथुरा-वृंदावन, पटना, साहिबगंज, हरिद्वार व नवद्वीप में पायलट परियोजना के रूप में शुरू किया गया. यह काम घाटों पर किया जा रहा है. इसमें ट्रेश स्कीमर, एरेटर्स, बूम आदि उपकरणों का उपयोग किया जाएगा. ये मशीनें 50 हजार से लेकर 16 करोड़ रुपये तक की हैं. श्रद्धालुओं को उनके परिजनों के नाम से दान देने के लिए कहा जाएगा साथ ही आधुनिक शवदाह गृह, मॉडल धोबी घाट और अन्य घाटों पर सोलर पैनल आदि बनाए जाएंगे.
कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत सरकार से पूछे जाने पर कि स्वच्छ गंगा परियोजना कब पूरी होगी? राष्ट्रीय प्रशासन ने कहा कि इस परियोजना को पूरा होने में 18 सालों का समय लगेगा. राजग सरकार ने कहा कि उसने जल अपशिष्ट शोधन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन समेत पूर्ण स्वच्छता को हासिल करने के लिए प्रथम लक्ष्य के तौर पर गंगा के तट पर बसे 118 शहरों की पहचान की है.

गंगा पुनर्जीवन, नदी विकास व जल संसाधन मंत्री उमा भारती का दावा जो काम बीते साढ़े तीस साल में नहीं हुआ, 'नमामि गंगे' परियोजनाएं उसे महज दो साल में कर दिखाएंगी और और वर्ष 2018 तक गंगा पूरी तरह साफ हो जाएगी. इस दावे का आधार रुपये 1500 करोड़ लागत वाली वे 231 परियोजनाएं हैं इनमें रुपये 250 करोड़ की लागत वाली 43 परियोजनाएं अकेले उत्तराखंड में आठ स्थानों पर गंगा धाराओं को मलिन होने से बचाने का काम करेंगी; शेष हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 95 स्थानों पर अपनी भूमिका निभाएंगी. ये परियोजनाएं मुख्यतः घाट नवीनीकरण, नाला निर्माण, नाला सफाई, मल शोधन संयंत्र निर्माण, औद्योगिक कचरा निस्तारण, पौधारोपण तथा जैव विविधता केंद्रों के निर्माण से संबंधित है.

इस बीच जर्मनी ने प्रौद्योगिकी के माध्यम से गंगा सफाई अभियान में सहयोग की इच्छा जताई और यूरोप के महत्वपूर्ण जलमार्गों में शुमार राइन नदी को साफ करने में इस्तेमाल की गई प्रौद्योगिकी को उत्तराखंड में गंगा के एक हिस्से के पुनर्जीवन में प्रयोग करने पेशकश की. कुल मिलकर जीवनदायिनी गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है.

सभ्यता की पालनहार नदियों को प्रदेश में सीवेज रूपी गरल अरसे तक पीना पड़ेगा. वजह यह है कि सूबे की नदियों में गिरने वाले कुल सीवेज लोड के 40 फीसदी को ही शोधित करने की क्षमता फिलहाल उपलब्ध है. सीवेज शोधन संयंत्रों (एसटीपी) के निर्माण और सीवर लाइन बिछाने के भारी-भरकम खर्च से निपटने में संसाधनों की कमी आड़े आ रही है. कुछ स्थानों पर एसटीपी निर्माण के लिए जमीन का बंदोबस्त कर पाना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. जो एसटीपी चालू हैं वे भी विभिन्न तकनीकी कारणों से अपनी क्षमता के अनुरूप सीवेज का शोधन नहीं कर पा रहे हैं. नदियों को प्रदूषणमुक्त करने के मकसद से प्रदेश में गंगा कार्य योजना के पहले और दूसरे चरण के तहत बनाये गए 33 एसटीपी की कुल सीवेज शोधन क्षमता सिर्फ 1193.85 एमएलडी है. यह नगरों से निकलने वाले कुल सीवेज लोड का सिर्फ 40 प्रतिशत है. नगरों का 60 फीसदी सीवेज लोड नदियों में यूं ही बहाया जा रहा है. प्रदेश में निर्माणाधीन 39 एसटीपी की कुल शोधन क्षमता भी 1370.05 एमएलडी ही है. इन 39 एसटीपी के बनकर चालू हो जाने पर भी प्रदेश में कुल सीवेज शोधन क्षमता 2563.9 एमएलडी ही रहेगी जो कि मौजूदा सीवेज लोड से भी कम है. जब तक नये एसटीपी बनकर तैयार होंगे तब तक सीवेज लोड और बढ़ जाएगा. जल निगम का आकलन है कि सन् 2025 तक इन नगरों का कुल सीवेज लोड 4264.27 एमएलडी हो जाएगा. जब तक गंगा में हम अपना मल मूत्र बहाते रहेंगे तब तक गंगा को मैले होने के अभिशाप से मुक्ति मिलने की संभावना नहीं है.

नगर निगमों द्वारा संचालित एस टी पी करोडों बहाकर भी कभी पूरी तरह काम नही करेंगे इस काम को यदि पूरी इमानदारी के साथ अंजाम देना है तो उसके लिए एक विकेन्द्रीकृत प्रणाली ही निकालनी पड़ेगी. पूरे शहर के सीवेज शोधन की जगह हर मोहल्ले का शोधन उसी मोहल्ले में हो और नदी में नालों का बस साफ़ पानी ही वापस डालने की इजाज़त दी जाये.गंदे पानी से भरे नालों को नदी में उंडेलने से रोके बिना इस समस्या का हल संभव नहीं इस क्रम में सिटी सैनिटेशन प्लान की विकंद्रित व्यवस्था ही एक दिशा दिख रही है.

हर दिन138 नालों का 6,000 करोड़ से अधिक लीटर सीवेज गंगा में बहता है. गंगा बेसिन क्षेत्र 7301 मिलियन लीटर (एमएलडी) अपशिष्ट जल उत्पन्न करता है. उसके महज 2,125 एमएलडी का ही इलाज कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) के एक अध्ययन का कहना है कि मल कीचड़ और सेपटेज प्रबंधन ही गंगा को निर्मल बनाने का ह्सही हाल है और एस टी पी से कुछ नहीं होने वाला.

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