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तेजी से पिघल रहा है आर्कटिक

 Utkarsh Sinha |  2017-04-10 09:35:02.0

तेजी से पिघल रहा है आर्कटिक

डा.सीमा जावेद
(लेखिका पर्यावरणविद और वरिष्ठ पत्रकार हैं )

आर्कटिक या उत्तरी हिम-शैल धरती पर बचे चंद सबसे खूबसूरत और आदिकालीन पर्यावरण तंत्रों में से एक है जो तेजी से पिघल रहा है। आर्कटिक पर जमी बर्फ धरती को वातानुकूलित बनाने में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती आयी है। उसके बिना तापमान बढेगा और धरती तपने लगेगी ऐसे में दुनिया का क्या हाल होगा, यह बताने की जरूरत नहीं। । पिघलते हिम-शैल भविष्य में होने वाले बडे बदलाव की कहानी कह रहे हैं और हमें चेतावनी भी दे रहे हैं।

अंटार्कटिका पृथ्वी का दक्षिणतम महाद्वीप है, जिसमें दक्षिणी ध्रुव अंतर्निहित है। यह चारों ओर से दक्षिणी महासागर से घिरा हुआ है और अपने 140 लाख वर्ग किलोमीटर (54 लाख वर्ग मील) क्षेत्रफल के साथ यह, एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के बाद, पृथ्वी का पांचवां सबसे बड़ा महाद्वीप है, अंटार्कटिका का 98% भाग औसतन 1.6 किलोमीटर मोटी बर्फ से आच्छादित है।यहाँ सिर्फ शीतानुकूलित पौधे और जीव ही जीवित, रह सकते हैं, जिनमें पेंगुइन, सील, निमेटोड, टार्डीग्रेड, पिस्सू, विभिन्न प्रकार के शैवाल और सूक्ष्मजीव के अलावा टुंड्रा वनस्पति भी शामिल है।

हालांकि अंटार्कटिका या टेरा ऑस्ट्रेलिस (दक्षिणी भूमि) के बारे में विभिन्न मिथक और अटकलें सदियों से प्रचलित थे पर इस भूमि से पूरे विश्व का 1820 में परिचय कराने का श्रेय रूसी अभियान कर्ता मिखाइल पेट्रोविच लाज़ारेव और फैबियन गॉटलिएब वॉन बेलिंगशौसेन को जाता है।

दुर्भाग्य से तेल कंपनियां हिमखंडों के पिघलने में भी अपना फायदा देख रही हैं। रूसी कंपनी गैज़प्रोम, स्काटलैंड की केयर्न इनर्जी कंपनी आर्कटिक क्षेत्र के समुद्री किनारे को खोदने में जुटी है। यह वह इलाका है जो ज्यादातर समय समुद्री बर्फ से घिरा रहता है। यहां पानी काफी गहरा है और कई हिम-शैल मौजूद हैं। यहां का पर्यावरण कठोर और अनिश्चितताओं से भरा है। ऐसे में यहां खुदाई के बेहद घातक परिणाम हो सकते हैं।
तेल के लिए आदिकालीन और नाजुक पर्यावरण में टिकाऊ तरीके से खुदाई क्या संभव है ? दुर्भाग्य से यह सरलता से संभव नहीं है।। ग्लोबल वार्मिंग में तेल की भूमिका जैसा बडा मुद्दा भी क्‍या मायने नहीं रखता। हकीकत यह है कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के अलावा इस तरह के निष्कर्षण अभियान स्थानीय पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक और जोखिम भरे हैं। आर्कटिक में भी तेल के बहने के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। तेल उद्योग मुनाफे के लिए इस धरती को नर्क बनाने में जुटी हुई हैं। भले ही इसकी हमें चाहे जो कीमत अदा करना पडे।

आर्कटिक में वसंत ऋतु शुरू होने के साथ अंटार्कटिक में सर्दियां उतार पर आ जाती हैं। आर्कटिक सागर की बर्फ का फैलाव सर्दियों में अपने चरम पर पहुंच जाता है। वहीं अंटार्कटिका में यह विस्तार गर्मियों के अपने न्यूनतम स्तर तक सिकुड़ जाता है। दुनिया के दोनां ध्रुव यूं तो वार्षिक चक्र के लिहाज से एक-दूसरे के ठीक विपरीत हैं लेकिन मार्च 2017 में इन दोनों में एक चीज बिल्कुल समान रही वह है समुद्री बर्फ के फैलाव में आयी रिकार्ड गिरावट।

नेशनल स्नो एण्ड आइस डेटा सेंटर (एनएसआईडीसी) ने 22 मार्च को घोषित किया कि पृथ्वी के दोनों ही धु्रवों पर समुद्री बर्फ के मौसमी फैलाव में रिकार्ड गिरावट आयी है। आर्कटिक सागर में बर्फ का फैलाव गत सात मार्च को अपने शीतकालीन अधिकतम स्तर यानी 55 लाख 70 हजार वर्ग मील (एक करोड़ 44 लाख 20 हजार वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया। वहीं अंटार्कटिक सागर में पिछली तीन मार्च को बर्फ का फैलाव अपने ग्रीष्मकालीन न्यूनतम स्तर यानी 813000 वर्ग मील (21 लाख 10 हजार वर्ग किलोमीटर) पर रहा। दोनों ही धु्रवों पर समुद्री बर्फ के अधिकतम मौसमी फैलाव में पिछले 38 वर्ष के सैटेलाइट रिकार्ड के दौरान आयी यह सर्वाधिक गिरावट है। आर्कटिक सागर में हिम के अधिकतम विस्तार में वर्ष 2015 और 2016 की न्यूनतम सीमा के मुकाबले और गिरावट आयी है। वर्ष 2015 में आर्कटिक सागर में यह सीमा अधिकतम 56 लाख 5 हजार वर्ग मील (एक करोड़ 45 लाख 17 हजार वर्ग किलोमीटर) और साल 2016 में यह 56 लाख 6 हजार वर्ग मील (एक करोड़ 45 लाख 20 हजार वर्ग किलोमीटर थी।

यह सिकुड़न एक प्रक्षेपवक्र में हो रही है, जो वर्ष 2016 के अंत में तब दिखना शुरू हुआ है, जब पृथ्वी के दोनों धु्रवों पर विचलन की अनुमानित सीमा से कहीं ज्यादा कमी पायी गयी। लेकिन जरूरी नहीं है कि इन दोनों ही धु्रवों पर दिखे बर्फ के विस्तार में गिरावट का एक ही अर्थ हो। अंटार्कटिक सागर में सर्दियों के दिनों में बर्फ के विस्तार की रेखा हर साल नीचे झुक रही है, जबकि आर्कटिक सागर में बर्फ के विस्तार की रेखा 21वीं सदी के शुरू से ही लगातार नीचे गिरती दिख रही

गिरावट के इसस्तर पर पहुंचने से करीब ढाई साल पहले अंटार्कटिक सागर में बर्फ के फैलाव में काफी बढ़ोत्तरी देखी गयी थी। एनएसआईडीसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक टेड स्कमबास का अनुमान है कि वैश्विक जलवायु के रुख का अंटार्कटिक सागर की बर्फ पर कम प्रभाव हो सकता है और यह दक्षिणी महासागर में होने वाले क्षेत्रीय तथा अल्पकालिक जलवायु बदलावों से अधिक गहराई से जुड़ा है।

मार्च 2017 में उत्तरी तथा दक्षिणी धु्रवों पर समुद्री बर्फ के फैलाव में आयी संयुक्त गिरावट इस साल इस समय रिकार्ड किये गये न्यूनतम फैलाव के स्तर तक या उसके नजदीक तक पहुंच चुकी है। लेकिन अंटार्कटिक के हिम विस्तार में रिकार्ड गिरावट के कारणों को लेकर बनी अनिश्चितता की वजह से निम्न वैश्विक विस्तार का महत्व स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।

हाल यह है कि अंटार्कटिक या बर्फ का महासमंदर में ऑस्ट्रेलिया ने शोध के लिए कैसी, डेविस और मॉसन नाम के तीन शोध केन्द्र बना रखे हैं लेकिन इन केन्द्रों तक पहुंचाने वाली हवाई पट्टी पिघल रही है अंटार्कटिका के गर्म होने ने यह चिंता बढ़ा दी है कि सैंन फ्रांसिस्को से शंघाई तक सागर में पानी का स्तर और बढ़ेगा, जो जमीन को डुबो देगा दुनिया भर के पर्यावरण में बदलाव के औसत की तुलना में अंटार्कटिका में तापमान तीन गुना ज्यादा प्रभावित हुआ है. तापमान में यह इजाफा इंसानी गतिविधियों के कारण है.

अंटार्कटिका प्रायद्वीप में किनारों पर मौजूद कई हिमखंड हाल के वर्षों में टूट कर पिघल गए हैं. एक बार यह हिमखंड पिघल जाएं तो उनके पीछे ग्लेशियर भी समुद्र में आ मिलते हैं और फिर पानी का स्तर बढ़ जाता है. पश्चिमी अंटार्कटिका के लिए पाइन आइलैंड ग्लेशियार उतना ही पानी समुद्र में लेकर आता है जितनी की यूरोप की राइन नदी लेकर आती है. अंटार्कटिका हर साल समुद्र के जलस्तर में 0.3 मिलीमीटर इजाफा कर रहा है. यह ग्रीनलैंड के 0.7 मिलीमीटर की तुलना में कम है. उत्तरी ध्रुव के सबसे नजदीकी भूखंड ग्रीनलैंड का लगभग पूरा हिस्सा पिघल गया है. जो इलाका सफेद बर्फ से ढंका होता था, वह अब हरा दिख रहा है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो के ओशनसैट उपग्रह के नतीजे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं ग्रीनलैंड के पास एक बड़ा आइसबर्ग पीटरमैन हिमनद से टूट गया .

ध्रुवों में दुनिया की सभी पर्वत श्रेणियों से ज्यादा बर्फ है. लिहाजा इनका पिघलना समुद्र के जलस्तर को बढ़ाने के लिए काफी है. 2007 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन पैनल ने कहा था कि समुद्र का जलस्तर 1.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से उठ रहा है नतीजों के हिसाब से अनुमान लगाने पर आशंका जताई जा रही है कि 2050 तक समुद्र का जलस्तर 32 सेंटीमीटर यानी एक फुट दो सेंटीमीटर बढ़ जाएगा.
यहाँ एडेली और चिनस्ट्रैप नाम के दो पेंग्विनों की प्रजातियों और उनके पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में की गई रिसर्च के अनुसार इनकी संख्या घाट रही है साथ ही झींगे की एक किस्म क्रिल की तादाद में नाटकीय रूप से गिरावट आई है. क्रिल प्रजनन के लिए समुद्री बर्फ पर निर्भर है. क्रिल की संख्या में आई गिरावट ही पेंग्विनों की संख्या घटने की वजह है. रिपोर्ट के मुताबिक पेंग्विनों की तादाद में करीब 50 फीसदी की कमी आई है.

एडेली पेंग्विन जाड़े के दिनों में समुद्री बर्फ को अपना आवास बनाते हैं. पिछले दशक में इन पेंग्विन की संख्या हर साल 2.9 फीसदी के हिसाब से कम हुई है. चिनस्ट्रैप पेंग्विनों खुले पानी में रहना पसंद करते हैं, उनकी संख्या इसी दौर में करीब 4.3 फीसदी के हिसाब से कम हुई है. कुछ वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि हवा और पानी का तापमान बढ़ने के कारण समुद्री बर्फ में कमी आई है जिसका एडेली पेंग्विनों की संख्या पर नकारात्मक असर हुआ है. इस अनुमान को अगर सच माना जाए तो एडेली पेंग्विनों की तुलना में चिनस्ट्रैप पेंग्विनों की तादाद बढ़नी चाहिए थी जो खुले पानी को अपना आवास बनाती हैं. लेकिन ताजा रिसर्च से पता चला है कि क्रिल में आई कमी के कारण दोनों तरह की पेंग्विनों की तादाद लगातार घट रही है.

क्रिल समुद्री बर्फ के नीचे पैदा होने वाली वनस्पति को अपना भोजन बनाते हैं रिसर्च में सामने आया है कि इन इलाकों में क्रिल की तादाद 80 फीसदी तक कम हो गई है. यही क्रिल इन पेंग्विनों को भोजन है. अब जब भोजन ही नहीं होगा तो पेंग्विन कहां से होंगी. समुद्री पक्षियों पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक वायने ट्राइवलपीस कहते हैं, "भोजन चक्र में क्रिल पेंग्विन और दूसरे जीवों के नीचे आता है. आवास के बारे में उनकी पसंद चाहे जो हो लेकिन हम पेंग्विन की घटती तादाद के पीछे उनके भोजन के प्रमुख स्रोत के खत्म हुए आवास को वजह मानते हैं.

पृथ्वी पर अन्टार्कटिक सबसे गर्म होते पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है.. रिसर्च में कहा गया है, "अगर तापमान बढ़ना जारी रहा तो समुद्री बर्फ इस इलाके से गायब ही हो जाएंगे इसके साथ ही क्रिल और पेंग्विनों की संख्या भी घटती चली जाएगी.

वैसे क्रिल के खात्म के पीछे केवल समुद्री बर्फ का घटना ही वजह नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक क्रिल का शिकार कारोबारी उद्देश्यों के लिए भी किया जा रहा है. इसके अलावा व्हेल और सील भी इसका शिकार करते हैं. 1930-1970 के दौरान जब इंसान ने सील और व्हेल का ज्यादा शिकार किया तो क्रिल की तादाद बढ़ गई नतीजा ये हुआ कि पेंग्विनों की तादाद में भी इजाफा हुआ. अब इंसान सील और व्हेल का शिकार नहीं कर रहे तो उसका एक असर इस रूप में भी लोगों के सामने आ रहा है.

कोई नहीं जानता कि गर्मी की कितनी मात्रा 'सुरक्षित' है। पर हमें ये जरूर पता है कि जलवायु परिवर्त्तन लोगों एवं पारिस्थितिक तंत्र को पहले से ही नुकसान पहुंचा रहा है । इसकी सच्चाई ग्लेशियरों के पिघलने, ध्रुवीय बर्फ के खंडित होने, परिहिमन क्षेत्र के विगलन, मानसून के तरीके में परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते जल स्तर, बदलते पारिस्थितिक तंत्र एवं घातक गर्म तरंगों में देखी जा सकती है।

इन परिवर्तनों के बारे में बात करने वाले अकेले वैज्ञानिक ही नहीं हैं, हिमाचल के सेब उत्पादकों से लेकर विदर्भ के किसानों तथा सुंदरबन के लुप्त हो रहे द्वीपों पर रहने वाले लोग भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे हैं।

लेकिन यह तो महज शुरूआत है ।

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