राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विरोध में बनने वाले दो राजनीतिक संगठन

 2017-03-30 15:16:23.0

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विरोध में बनने वाले दो राजनीतिक संगठन

आचार्य राधेश्याम द्विवेदी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना :- 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी. सांप्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7.8 दशक हो चुके हैं. दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी. वह भी बिना किसी आधार के. संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है. जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था. तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था. 

संघ के कुछ उल्लेखनीय कार्य

1. कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय :- संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी. यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे. विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे. जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था. तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहर लाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था. 

2. 1962 का युद्ध :- सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा. स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी- सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता. जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा. मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा. यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया.

3. कश्मीर का विलय :- कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो 'हम क्या करें वाली मुद्रा में' मुंह बिचकाए बैठी थी. सरदार पटेल ने गुरु गोलवलकर से मदद मांगी गुरुजी श्रीनगर पहुंचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया.

4. 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली :- पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था. शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके. घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे. युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था?

5. गोवा का विलय :- दादराए नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी. 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई. संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहरायाए पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया. संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ.

6. आपातकाल :- 1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा हैण् सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं-नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला. जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं.

7. भारतीय मज़दूर संघ :- 1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आंदोलन थाए जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता थाण् कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था. आज यह विश्व का सबसे बड़ाए शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है.

8. ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा एवं लोक जनकल्याणकारी कार्य :-  जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं. संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने. भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है. केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं. अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है. लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं. उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं.

9. सेवा कार्य :- 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तकए 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंपए सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक. संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है. भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में.

मोहन भागवत का योगदान :- मोहन भागवत एक पशु चिकित्सक और 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक हैं। उन्हें एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। के एस सुदर्शन ने अपनी सेवानिवृत्ति पर उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था। मोहनराव मधुकरराव भागवत का जन्म महाराष्ट्र के चन्द्रपुर नामक एक छोटे से नगर में 11 सितम्बर 1950 को हुआ था। वे संघ कार्यकर्ताओं के परिवार से हैं उनके पिता मधुकरराव भागवत चन्द्रपुर क्षेत्र के प्रमुख थे जिन्होंने गुजरात के प्रान्त प्रचारक के रूप में कार्य किया था। मधुकरराव ने ही लाल कृष्ण आडवाणी का संघ से परिचय कराया था। उनके एक भाई संघ की चन्द्रपुर नगर इकाई के प्रमुख हैं। मोहन भागवत कुल तीन भाई और एक बहन चारो में सबसे बड़े हैं। मोहन भागवत ने चन्द्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा और जनता कॉलेज चन्द्रपुर से बीएससी प्रथम वर्ष की शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा और पशुपालन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1975 के अन्त में, जब देश तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गान्धी द्वारा लगाए गए आपातकाल से जूझ रहा थाए उसी समय वे पशु चिकित्सा में अपना स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अधूरा छोड़कर संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गये। एक पशु चिकित्सक और 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक हैं।

उन्हें एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। के एस सुदर्शन ने अपनी सेवानिवृत्ति पर उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था। मोहनराव मधुकरराव भागवत का जन्म महाराष्ट्र के चन्द्रपुर नामक एक छोटे से नगर में 11 सितम्बर 1950 को हुआ था। वे संघ कार्यकर्ताओं के परिवार से हैं उनके पिता मधुकरराव भागवत चन्द्रपुर क्षेत्र के प्रमुख थे जिन्होंने गुजरात के प्रान्त प्रचारक के रूप में कार्य किया था। मधुकरराव ने ही लाल कृष्ण आडवाणी का संघ से परिचय कराया था। उनके एक भाई संघ की चन्द्रपुर नगर इकाई के प्रमुख हैं। मोहन भागवत कुल तीन भाई और एक बहन चारो में सबसे बड़े हैं। मोहन भागवत ने चन्द्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा और जनता कॉलेज चन्द्रपुर से बीएससी प्रथम वर्ष की शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा और पशुपालन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1975 के अन्त में, जब देश तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गान्धी द्वारा लगाए गए आपातकाल से जूझ रहा था, उसी समय वे पशु चिकित्सा में अपना स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अधूरा छोड़कर संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गये। 

राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवक संघ की स्थापना :- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए पूर्व ओलंपियन  और पूर्व केन्द्रीय मंत्री असलम शेर खान ने घोषणा की है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में साल 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर देने के लिए वो 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की तर्ज पर 'राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवक संघ' यानी आरसीएसएस बनाएंगे. उन्होंने 'राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवक संघ' के गठन की घोषणा की और कहा ये संगठन ठीक उसी तरह से कांग्रेस की मदद करेगी, जैसे आरएसएस चुपके-चुपके चुनावों में बीजेपी की सहायता करती है. उन्होंने कहा कि आरएसएस स्वयंसेवकों की तरह आरसीएसएस के स्वयंसेवकों का कोई परिधान नहीं होगा. असलम ने बताया, 'मैने आरसीएसएस बनाने का निर्णय लिया है, क्योंकि जमीनी स्तर पर कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की भारी कमी है, जबकि एक राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतने के लिए जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का होना जरूरी है.

उन्होंने कहा कि आरसीएसएस में उन लोगों को स्वयंसेवकों के रूप में शामिल किया जाएगा, जो किसी राजनीतिक दल से न जुड़े हों और धर्मनिरपेक्ष होने के साथ-साथ कांग्रेस के समान विचार रखने वाले हों. हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणामों से स्पष्ट हो गया है कि यदि कांग्रेस केवल अल्पसंख्यक वोटों के बल पर ही सत्ता में आना चाहती है, तो यह संभव नहीं है. जब उनसे सवाल किया गया कि वह आरसीएसएस क्यों बना रहे हैं, जबकि आरएसएस के पहले ही 'कांग्रेस सेवा दल' बनाया था, इस पर उन्होंने कहा, कांग्रेस सेवा दल लगभग खत्म हो चुका है. कांग्रेस नेता असलम ने बताया कि कांग्रेस सेवा दल की स्थापना एनएस हार्डिकर ने अंग्रेजों से देश की आजादी हासिल करने के लिए किया था. उन्होंने कहा, 'यह उद्देश्य हमने कई साल पहले वर्ष 1947 में हासिल कर लिया है, इसलिए अब यह (कांग्रेस सेवा दल) लगभग खत्म हो गया है.' असलम ने बताया कि आरएसएस की स्थापना के. बी. हेडगेवार ने भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए किया है और उनका यह सपना अब तक पूरा नहीं हुआ है. इसलिए आरएसएस बहुत ज्यादा सक्रिय है और अब भी काम कर रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश की कमान संभालने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर मोदी आरएसएस के इस सपने (भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का) को साकार करने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं. असलम ने कहा कि हेडगेवार ने आरएसएस का गठन मात्र चार लोगों से किया था और वह भी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का काम कर रहे थे. उन्होंने दावा किया, 'अगले साल तक आरसीएसएस में एक लाख तक स्वयंसेवक हो जाएंगे' असलम ने बताया कि आरसीएसएस की मदद से कांग्रेस आने वाले दिनों में भाजपा को चुनावों में कड़ी टक्कर देगी.

धर्मनिरपेक्ष सेवक संघ की स्थापना :- तेज प्रताप यादव एक राजनेता तथा वर्तमान बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री है। वे बिहार विधानसभा में महुआ से विधायक है। वे राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव तथा राबड़ी देवी के बड़े पुत्र है।  वह 12वी कक्षा विहार राज्य शिक्षा बोर्ड से पास किये हैं। चुनाव के शपथपत्र के अनुसार छौटा भाई तेजस्वी तेज प्रताप से बड़ा दिखाया गया है। लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने अपनी शपथ में दो बार गलती कर दी। तेज प्रताप ने पहले अपेक्षित की जगह उपेक्षित बोल दिया बाद में तब की जगह जब बोल दिया था। उनकी गलती को राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने ठीक कराया और गोपनीयता की शपथ दिलाई।  बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तर्ज पर बिहार में धर्मनिरपेक्ष सेवक संघ (डीएसएस) का गठन किया है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद के पुत्र तेजप्रताप ने 28.03.2017 को नए संगठन की घोषणा करते हुए कहा कि डीएसएस को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया जाएगा. उन्होंने कहा कि डीएसएस में हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई सभी धर्मों के लोग शामिल होंगे और यह संगठन आरएसएस और योगी आदित्यनाथ के संगठन 'हिन्दू वाहिनी सेना' का मुकाबला करने को तैयार है. तेजप्रताप ने कहा कि डीएसएस आरक्षण के मुद्दे पर आरएसएस को खदेड़ देगा. आरक्षण हमारा जन्मसिद्घ अधिकार है. हम आरएसएस की मनमानी नहीं चलने देंगे.
 
तीनों की तुलना :- डीएसएस के गठन को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तेजप्रताप को पहले आरएसएस का प्रशिक्षण लेने की सलाह दे दी. उन्होंने कहा कि तेजप्रताप को पहले आरएसएस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए, उसके बाद कोई संगठन बनाने की बात करनी चाहिए, प्रशिक्षण लेने के बाद संगठन की असफलता का शक कम हो जाएगा, बिना प्रशिक्षण के असफलता का भय बना रहेगा. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आरएसएस की विचारधारा को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार मानते हैं. उनके इस आशय के बयान पर पुणे की अदालत में मानहानि का मुकदमा भी चल रहा है. नाथूराम गोडसे ने आरएसएस छोड़ने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी. इन संगठनों में अंतर यह है कि आरएसएस बीजेपी की मातृ संस्था है जबकि कांग्रेस सेवादल और डीएसएस कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के संगठन हैं. यानी की इन संगठनों की मातृ संस्था यह राजनीतिक पार्टियां हैं.

काश ! ये नव गठित संगठन हवा हवाई ना बन जायें. जब ये आरएसएस को सही जानते नही तो उसे रोकेंगे कैसे? यदि उसको रोकने के क्रम में इनकी एक प्रतिशत भी तैयारी हो तो भी वे जनता के कुछ काम में आ सकते हैं। केवल राजनीतिक प्रोपोगण्डा से ना तो देश का भला होगा और ना ही इन दोनों संगठन के आकाओं का. भाषण देना तथा बाप की बपौती के बल पर किसी पताके के शिखर पर टंग जाना आसान है परन्तु सम विषम परिस्थिति में जमें रहना, टिके रहना तथा कुछ सकारात्मक कर पाना आसान नहीं होता हैं. आज के युग में आरएसएस जैसा त्याग व परिश्रम खुद भाजपा भी नहीं कर सकती तो ये नव अंकुरित संगठन क्या करेंगे? वहां सेवा एधर्म, त्याग और तपस्या को प्रधानता दी जाती है. यहां तो मुख में जबरत हलवा या मलाई ठेला जा रहा है। इनकी ना तो तुलना की जा सकती है और ना ही समानता. ये ना तो भारत के हित में होगा ना ही दलित या पिछड़े के, बल्कि यह एक छलावा ही दिख रहा है, जो महत्वाकांक्षा के लिए एक निरर्थक प्रयास मात्र ही बन सकता है.    


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