Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

खुद के लिए संघर्ष करें स्त्रियाँ

 Utkarsh Sinha |  2017-02-19 09:40:22.0

खुद के लिए संघर्ष करें स्त्रियाँ


शिखा सिंह
( स्वतंत्र लेखिका )

कभी कभी तरस आता है उन बेचारी स्त्रियों पर, जो पत्नी भी है बेटी भी, और माँ भी ,और दोहरी भूमिका पर जो समाज में दिखना कुछ और चाहती है और बनना कुछ और करना कुछ और । व्यक्ति की एक पहचान जिन्दगी बदल देता है पर दोहरी तिहरी भुमिका या मानसिकता कई रास्ते बना देता है जहाँ से अपना सही रास्ता ढूंढना मुश्किल हो जाता है ।वे स्त्रियां जो समाज को आगे बढ़ाने की बात करती हैं समाज को बदलने की बात करती है अपना हक पुरुषसत्ता के बराबर खड़ा होने का चाहती है पर खुले विचारों को जीवन तो देना चहाती है पर जिन्दा नही रखना चहाती बर्दाश्त भी नही करना चाहती ।

अगर बेटा है तो उसकी कितनी भी बड़ी गलती पर पर्दा डाल कर जीवन बचाने की कोशिश करती हैं लड़का अगर लड़की के साथ कुछ भी करे तो कहा जाता है वह पुरुष है लड़का है उसका कुछ नही बिगड़ेगा अपनी बेटी को बचाये या समझाएं वो तो साफ सुतरा रहेगा बदनामी या गन्दी नजरे लड़की पर की जायेगी.
ओहो स्त्रियों तुम्ही तो हो अपनी खुद की परवह न करने बाली अगर किसी का पति किसी दूसरे की पत्नी से सम्बन्ध रखे या मजाक करे तो बहुत सी स्त्रियां या पत्नियाँ कहती है अपने रिश्तों को बचाने के लिये ,वो तो मर्द है उसे तो कुछ चाहिए मनोरंजन के लिये स्त्रियां खुद अपना अस्तित्व खो देती है उनका का बिगडे़गा वो मर्दा है ....अगर जिन्दगी मर्दो के हिसाब से चलती है और उनके सुख के लिये एक पत्नी एक माँ एक बेटी अपना सब कुछ खोने को बर्दाश्त कर सकती है तो इससे बडा उसके लिये कर्म क्या होगा ? धन्य हो ऐसी प्रगतिवादी स्त्रियों धन्य हो तुम ही सभा की शोभा बढाओगी ।

धन्य हो वो स्त्री जो पुरुषसत्ता को हर गंदे गलीचे में लपेट कर बैठाना चहाती है और शामिल है खुद उस मानसिकता में जो उनको खुद अपनी पहचान बनाने से पहले खोने की परवाह नही करती । जीना चाहती है वो स्त्रियां खुले माहोल में खुले वस्त्रों में पर बर्दाश्त नही करना चाहती नही चाहती समाज की रोगी मानसिकता को दूर करना नही चाहती अपने पल्लू को साफ कर खुला रखना नही चाहती सांस को खुद लेना , चाहती है तो बस दूसरे के द्वारा दी गयी नसीहत नही है कोई अपनी सोच आज भी कितनी स्त्रियां है जो बदलते समाज के दौर में भी पिछड़े समाज का एक छूटा हुआ हिस्सा बन कर रहना चाहती है ।

शिक्षा व्यक्ति को पढ़ना लिखना सिखा सकती है नया करना सिखा सकती है पर जीना नही वो अपने हौसलों के बुलन्द होने पे ही सीख सकती हैं । हम कमियाँ पुरषों मे ढूंढ लेते है पर उस कमी को दूर करने की बजाहे बड़ा और बना देते है खुद की परवह नही करते हरते है तो रिश्तों की जो व्यक्ति को अपराध करने को बढावा देता है. कौन क्या कहेगा ये छोड़ कर हम क्या करेगें ये सोचे कल्पनाएँ तो बहुत है करने के लिये, पर कालपनिकता से बाहर निकल कर जियो.

Tags:    

  Similar Posts

Share it
Top