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सर्वे में आया सामने, नोटबंदी से बेअसर रहेगा यूपी चुनाव का खर्च

 Girish Tiwari |  2016-12-26 10:16:37.0

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तहलका न्‍यूज ब्‍यूरो
लखनऊ:
चुनावों के खर्च के पैटर्न और संभावित तरीेकों पर चुनाव सुधार के लिए काम कर रही संस्‍था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिर्फाम (एडीआर) इलेक्‍शन वाॅच के सर्वे के अनुसार उत्‍तर प्रदेश में अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव नोटबंदी के बाद और भी मंहगा हो जाएगा। सर्वे के मु‍ताबिक चुनावों का खर्च नोटंबदी से बेअसर रहने वाला है। कालेधन के ठेकेदारों ने चुनाव में धन खपाने के रास्‍ते खोज निकाल लिए हैं।


एडीआर यूपी के संयोजक संजय सिंह ने बताया कि प्रदेेश केे 10 मंडलों झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, बनारस, गोरखपु, इलाहाबाद, आगरा और बरेली की 30 विधानसभा सीटों पर एडीआर की रिसर्च टीम ने संभावित प्रत्‍याशियों, पार्टी पदाधिकारियों और चुनाव में काम करने वाले कारोबारियों व कार्यकत्‍ताओं के साथ मिलकर ये सर्वे किया गया है।


वोटरों के खरीद फरोख्‍त पर कोई असर नहीं पड़ेगा
सर्वे के मुताबिक, विमुद्रीकरण के बाद भी यूपी के इस बार के विधानसभा चुनावों में बीते सालों के मुकाबले 10 फीसदी ज्‍यादा धन खर्च होगा। सर्वे में संभावित प्रत्‍याशियों और पार्टी पद‍ाधिकारियों में से 69 फीसदी ने का कि विमुद्रीकरण का चुनाव प्रचार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वहीं, 65 फीसदी ने माना कि इससे वोटरों के खरीद फरोख्‍त पर कोई असर नहीं पड़ेगा।


चुनाव प्रचार में होगी काफी कठिनाई
सर्वे के दौरान 70 फीसदी संभावित प्रत्‍यशियों ने कहा कि वो चुनाव जीतने के लिए पुराने तरीकों का ही सहारा लेंगे। हालांकि नोटबंदी के चलते सर्वे में शामिल 80 फीसदी लोगों ने माना है कि इसकी वजह से चुनाव प्रचार में काफी कठिनाई होगी।


कैशलेस व्‍यवस्‍था से नहीं पड़ेगा असर
चुनाव प्रचार सामाग्री का कारोबार करने वाले 70 फीसदी व्‍यापारियों का मानना है कि इसके चलते उनके ग्राहक कम हुए हैं। कैशलेस व्‍यवस्‍था लागू कि जाने और नंबर एक में भुगतान पर जोर के चलते 60 फीसदी ने माना है कि इससे उनके व्‍यापार पर कोई असर नहीं होगा, जबकि 30 फीसदी का कहना कि थोड़ा बहुत असर होगा।


सर्वे के सामने आया कि:-


- बड़ी तादाद में चुनावी पैसा जनधन खातों में जका कराया गया है।
- संभावित प्रत्‍याशियों ने तमाम कालाधन चुनाव के लिए खर्च के रूप में एडवांस में दे डाला है।
- राजनैतिक दलों की और ग‍ाडि़यां, कीमती सामान, साडि़यों और मोबाइल आदि की खरीब भी हो चुकी है।
- विमुद्रीकरण के बाद नए दलाल पैदा हो गए हैं, जो चुनावों के काला धन खपाने में लगे है।
- चुनावों के दौरान मीडिया पर भी अघोषित रूप से खर्च किया जाएगा, इसके बड़ी हिस्‍सेदार सोशल मीडिया की होगी।




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