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29 दिसंबर को होगा दीनदयाल उपाध्याय वांग्मय का लोकार्पण

 Girish Tiwari |  2016-12-28 14:12:26.0



deen dayal wangmay

तहलका न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ. सिद्धांतविहीन मतदान, सिद्धांतविहीन राजनीति का जनक होता है। वर्तमान परिदृष्य में यह प्रासंगिक भी है। एकात्म मानवतावाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय के इन्हीं उद्बोधनों को लेकर एक वांगमय संकलित किया गया है। जिसका लोकार्पण 29 दिसंबर को गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होगा। राज्यपाल रामनाईक कार्यक्रम के अध्यक्ष और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मुख्य अतिथि होंगे। इस मौके पर डाक टिकट का भी लोकार्पण किया जाएगा।


एकात्म मानवदर्षन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डा. महेष चन्द्र शर्मा ने गोमतीनगर स्थित एक रेस्टोरेंट में पत्रकारों से बातचीत करते हुए बताया कि इस संपूर्ण वांगमय का लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों से 9 अक्टूबर को दिल्ली में हुआ। अब इसका अलग-अलग राज्यों में भी लोकार्पण कराया जा रहा है। इसी कड़ी में प्रदेष की राजधानी में इसका लोकार्पण गुरूवार को कराया जा रहा है।


शर्मा ने बताया कि इस वांगमय में दीनदयाल जी ने वर्ष 1942 से 1967 तक जो भी लिखा और बोला। उसका 15 खंडो में संग्रह किया गया है। इसका हर खंड किसी न किसी महापुरूष को समर्पित है। सुखद संयोग यह है कि यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष भी है और इसी वर्ष उनके वांगमय का प्रकाषन हो रहा है। इसके प्रथम खंड की भूमिका सरसंघचालक डा मोहन भागवत ने लिखी है।


इसके अलावा हिमाचल प्रदेष के पूर्व सीएम शांता कुमार, बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने भी इसके अलग-अलग खंडों की भूमिकाएं लिखी हैं। आने वाले समय में इसके अंग्रेजी संस्करण का भी प्रकाषन किया जाएगा। पंडित जी ने अपने लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा मूलतः अंग्रेजी में लिखा। लगभग तीन दषक की तपस्या के बाद उनके विचारों के संकलन व संपादन का काम पूरा हुआ है।


शर्मा ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवनकाल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि द्विराष्ट्रवाद की छाया ने जब भारत की आजादी की लड़ाई को आवृत्त कर लिया था, तब 1942 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के माध्यम से उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन प्रारंभ किया। 1951 में जब जनसंघ की स्थापना हुई, तभी उनका राजनीति में प्रवेश हुआ।


देश की अखंडता के लिए कश्मीर आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन और बेरूबाड़ी के हस्तांतरण के विरूद्ध आंदोलन चलाकर उन्होंने देष की राजनीति में स्वतंत्रा संग्राम के मुद्दों को जीवित रखा और अपना पूरा जीवन देश की अखंडता के लिए लगा दिया। विदेशी वादों की जगह उन्होंने एकात्म मानववाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं भारतीयकरण का आहवान किया। अंततः उनके द्वारा विकसित किया गया दल भारतीय जनता पार्टी ही देश में राजनैतिक विकल्प बना।

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