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एक सरकार तो बनी, मगर क्या घट गया मोदी का जादू ?

 Tahlka News |  2016-05-19 13:25:53.0

उत्कर्ष सिन्हा
लखनऊ. 5 राज्यों के नतीजे आने के बाद असम में मिली सफलता दिल्ली और बिहार के बाद भाजपा के लिए संजीवनी की तरह आई है. साथ ही पश्चिम बंगाल में मिली 2 नयी सीटे और केरल में पार्टी का खाता खुलना भी पार्टी को उत्साहित करने के लिए काफी है.

modi nirash

उम्मीद के मुताबिक इसका श्रेय नरेंद मोदी और अमित शाह की जोड़ी को ही दिया जा रहा है. सोशल मीडिया से ले कर पार्टी नेताओं के बयान तक इसी दिशा में आ रहे हैं , कहा जा रहा है कि ये नतीजे मोदी मैजिक के बरक़रार रहने के संकेत हैं मगर एक तरफ जहाँ मोदी समर्थक खुश हैं वहीँ सियासी आंकड़ो को समझने वाले विश्लेषको का नजरिया इसके उलट है.


इस नजरिये की वजह 2014 की तुलना में वोटो के प्रतिशत में आई बड़ी कमी है जो पार्टी के रणनीतिकारो के माथे पर बल डाल रही है. असम के अलावा बाकी 4 राज्यों में भी पार्टी का प्रदर्शन वैसा नहीं रहा जैसा उम्मीद थी. सबसे बड़ा झटका तमिनाडु और बंगाल के नतीजो से लगा है.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के मामले को उछालने की रणनीति भी पार्टी के पक्ष में नहीं गयी. खुद नेताजी के पोते चन्द्र कुमार बोस को ममता बनर्जी के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा. दरअसल ममता बनर्जी ने नेताजी की फाईले पहले सार्वजनिक कर भाजपा के हांथो से यह मुद्दा ही छीन लिया.

असम की जीत का श्रेय निश्चित रूप से भाजपा के रणनीतिकारो को जाएगा. स्थानीय स्तर पर जिन भी दलों से गठबंधन किया गया उन्होंने बड़ी सफलता हासिल की. इसके साथ ही 15 सालो से असम में जारी कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भी एक बड़ा कारण रहा. लेकिन वही दूसरे 4 राज्यों को समझने में भाजपा चूक कर गयी.

केरल में मिली एकमात्र सीट पर पार्टी के राज्य अध्यक्ष राजगोपालन ने विजय प्राप्त कर भाजपा का खाता खोला. इसे भी राजगोपालन की व्यक्तिगत जीत ही माना जा रहा है. वे जनसंघ के ज़माने से पार्टी का परचम उठाये हुए हैं पर अपनी सीट से लगातार हारते रहे . पार्टी उन्हें राज्यसभा में ले कर आई थी. इस बार राजगोपालन ने कड़ी मेहनत की और सहानुभूति की लहर ने उन्हें विजय पताका थमा दी.

तमिलनाडु और पांडिचेरी में मिले शून्य ने भी भाजपा के रणनीतिकारो को निराश किया है. पार्टी यह मान कर चल रही थी कि जयललिता के खिलाफ भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर काम करेगा. तमिनाडु की राजनीति में बीते 30 सालो से कोई भी पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं आई थी. वही करूणानिधि परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को ले कर पार्टी हमलावर रही. मगर जयललिता ने तमिनाडु में इतिहास बना दिया.

2014 के लोकसभा चुनावो के मत प्रतिशत से इन नतीजों की तुलना स्वाभाविक रूप से की जा रही है. 2014 का चुनाव पूरी तरह से नरेंद्र मोदी पर आधारित था. तब पार्टी को जो अभूतपूर्व सफलता मिली उसका श्रेय भी नरेन्द्र मोदी के जादू को देने में कोई कमी नहीं छोड़ी गयी थी. इसके बाद जो भी चुनाव हुए उन्हें भी मोदी फैक्टर की कसौटी पर ही रखा गया. इसी लिए झारखण्ड, महाराष्ट्र और हरियाणा में सफलता के बाद जब दिल्ली और बिहार के विपरीत नतीजे आये तब यह कहा जाने लगा था कि मोदी मैजिक कमजोर पड़ रहा है.

गुरुवार को आये नतीजो को देखें तो असम में 2014 में 36.5 प्रतिशत मतों की तुलना में इस बार 30.1 प्रतिशत , पश्चिम बंगाल में 16.8 की तुलना में 10.3 प्रतिशत, तमिलनाडु में 5.56 की तुलना 2.7 प्रतिशत मत भाजपा को मिले हैं. सिर्फ केरल में 10.33 से बढ़ कर यह मत प्रतिशत 10.7 हुआ है. इससे साफ़ संकेत मिल रहे हैं.

पहला संकेत तो यह कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के 1 साल बाद पार्टी के मत प्रतिशत में काफी कमी आई है और दूसरा यह कि पार्टी वहाँ तो सफलता पा रही है जहाँ वह सीधी लडाई में है मगर तिकोने और बहुकोणीय संघर्षो में वह बहुत पीछे रह जा रही है.

vote percent

इन नतीजो के बाद अब अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं. भाजपा के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव होगा. यहाँ पार्टी को चतुष्कोनिया मुकाबले में उतरना है. बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में स्थानीय पार्टियों से मुकाबले में वह हार गयी थी. यूपी में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से उसका सामना है. गुरुवार को ही आये यूपी विधान सभा उप चुनावो के नतीजे भी भाजपा के खिलाफ गए हैं. 2017 तक मोदी सरकार भी लगभग तीन साल पुरानी हो चुकी होगी और उसके विकास का लेखाजोखा भी जनता जरूर चाहेगी.साथ ही साथ जातीय समीकरणों पर बटी यूपी की सियासत में भाजपा के रणनीतिकार जातीय पार्टियों से किस तरह का गठबंधन करते हैं इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है.

इन सबके बीच एक बात तो तय है की महज 2 वर्ष पूर्व धूमकेतु की तरह भारतीय राजनितिक क्षितिज पर उभरे नरेंद्र मोदी की चमक अब इतनी नहीं रही कि वे सिर्फ अपने छवि के बूते पार्टी को हर जगह विजय दिला सके.

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