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लड़कियों को सुनने को मिलीं सिर्फ गालियां, फिर भी नहीं उड़ी 'उड़ता पंजाब'

 Abhishek Tripathi |  2016-06-20 04:57:17.0

udta_punjab_flop_showअभिषेक त्रिपाठी
लखनऊ. फिल्म 'उड़ता पंजाब' बॉक्स आफिस पर उड़ नहीं सकी। रिलीज होने से पहले विवादों में आयी इस फिल्म ने मुफ्त की पब्लिसिटी तो खूब बटोरी, लेकिन दर्शकों को लुभाने में नाकाम रही। रविवार को 3 से 6 के शों में इस फिल्म को कुछ खास दर्शक नहीं मिले। जो दर्शक गए भी, उन्हें फिल्म में सिर्फ गालियां सुनने को ही मिलीं। फिल्म में गालियों की इतनी बौछार थी कि लड़कियों को शर्मसार होना पड़ा। आधे से ज्यादा थियेटर और मल्टीप्लेक्स खाली रहे। ऐसे में एक बार फिर यह साबित हो गया कि फिल्म में दम न हो तो उसे सस्ती पब्लिसिटी नहीं चला सकती। फिल्म से सब कुछ बिखरा बिखरा सा है, जो दर्शकों को बांध नहीं पाती। हालांकि, फिल्म का विषय अच्छा है, लेकिन कोई मनोरंजन नहीं है।


'उड़ता पंजाब' को लेकर इतना हाइप बन गया था कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जो संस्कारी बोर्ड इसे देश को देखने के लिए मना कर रहा है। अगर सेंसर बोर्ड इतना बवाल न मचाता तो यह बिलकुल साधारण फिल्म बनती।' इस फिल्म की एक ही खास बात है कि निर्देशक अभिषेक चौबे ने अपने अंदर निर्माता अनुराग कश्यप की आत्मा को नहीं आने दिया है।


पंजाब में नशे की लत, युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने के लिए जिम्मेदार है। कश्यप ने इस फिल्म में हर संवाद या कहें गालियों में संवाद रखकर साबित करना चाहा है कि नशा करेंगे तो गाली तो बकना ही पड़ेगा। आखिर पता नहीं निर्देशक की इसमें कितनी सहमति थी।


एक रैप गायक टामी उर्फ गबरू (शाहिद कपूर) पैसे के नशे में नशा करता है। विकट परिस्थिति में बिहार से पंजाब के एक गांव आ गई एक लड़की (आलिया भट्ट) मजबूरी में नशेड़ी है। एक इंस्पेक्टर (दलबीर देशांत) जो नशे के सौदागरों के साथ है और एक एनजीओ टाइप डॉक्टर (करीना कपूर) इस फिल्म को आगे बढ़ाते हैं।


फिल्म की कहानी में कोई दम नहीं
कहानी कहीं भी ऐसा कोई संदेश नहीं देती न मैक्सिको बनने की राह में पंजाब की त्रासदी को व्यक्त करती है। पहले भी ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिसमें सरकार-अपराधी गठबंधन को दिखाया गया है। बिलकुल सपाट कहानी जिसमें अंतरात्मा बड़ी जल्दी जागती है। चाहे वह इंसपेक्टर की हो या फिर रैप गायक टामी की। अगर निर्देशक ऐसे लोगों से मिलते जो सालों से हेरोईन का नशा कर रहे हैं तो उन्हें पता चलता कि शरीर इतना खोखला हो जाता है कि हीरोगिरी दिखाना कठिन होता है।


डायलॉग कम गालियां ज्यादा
फिल्म देखने युवतियां भी पहुंचीं। फिल्म के कुछ डायलॉग ही थे जो उनके चेहरे पर हंसी ला पाए। दरअसल फिल्म में अधिकांश डायलॉग से पहले गालियों का प्रयोग किया गया है। इस वजह से लड़कियां अपने परिवार के साथ इस फिल्म को देखने न जाएं तो ही अच्छा है।


करीना का अभिनय ठीक-ठाक
खैर जब निर्देशक को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने धड़ाधड़ लोगों को मरवा दिया। फिल्म खत्म करने का यही सबसे अच्छा तरीका है। आलिया ने बिना मेकअप काम किया, लगता है उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार की लगन लग गई है। करीना, दलबीर का अभिनय ठीक है। चौबे साहब अगली बार किसी वास्तविक विषय पर फिल्म बनाएं तो याद रखिएगा सिर्फ वास्तविक गालियां रखने से काम नहीं चलता।


डिस्ट्रीब्यूटर्स के चेहरे उदास
एक डिस्ट्रीब्यूटर ने बताया, 'फिल्म की शुरुआत औसत रही और मुझे लगता है कि फिल्म ने पहले दिन सिर्फ 8 से 9 करोड़ रुपये का कारोबार किया। यह उम्मीद से काफी कम है। फिल्म से जुड़े विवादों के बावजूद ऐसी शुरुआत उत्साहजनक नहीं कही जा सकती।' शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म लगभग 2000 सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म की ओपनिंग न सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में और न ही मल्टीप्लेक्स में अच्छी हुई। कुछ ही जगहों पर फिल्म ने अच्छा कारोबार किया है।

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