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घड़ियाली आंसू बहाना बंद करें प्रधानमंत्री : मायावती

 Sabahat Vijeta |  2016-08-08 17:48:47.0

mayawati profile


लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने गुजरात राज्य के ऊना में दलितों की बर्बर पिटाई एवं अमानवीय व्यवहार के लगभग एक महीने बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भावुक होकर यह कहने पर कि ‘मारना है तो मुझे मारो, दलितों को नहीं‘ पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा कि यह पूरे तौर से शरारतपूर्ण व राजनीति से प्रेरित बयान है. प्रधानमंत्री बात-बात पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिये भावुक ना बनें बल्कि देश व राज्यों में कानून का राज सख़्ती से स्थापित कर लोगों को इन्साफ देना सुनिश्चित करें और यह कोई एहसान नहीं बल्कि यह उनकी संवैधानिक जि़म्मेदारी बनती है.


मायावती ने आज यहाँ जारी एक बयान में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक तो देश की ज्वलन्त समस्याओं पर कभी बोलते नहीं हैं, जिस कारण मामला काफी ज्यादा बिगड़ता जाता है और जब काफी देर से कुछ बोलते हैं तो ऐसा बोलते हैं कि उससे समस्या सुलझने के बजाय और ज़्यादा उलझ कर मुश्किल हो जाती है.


इसी क्रम में उनका कल हैदराबाद में दिया गया यह बयान कि ’मेरे दलित भाईयों को मारना बन्द करो. यदि मारना ही है तो मुझे मारो’ पूरे तौर से शरारतपूर्ण व राजनीति से प्रेरित बयान है. इस प्रकार के बयान से अख़बारों की सुर्खियाँ तो बटोरी जा सकती हैं, परन्तु उससे समस्या का असली समाधान सम्भव नहीं होता है.


पूरे देश में आये दिन दलितों पर जो जातिवादी जुल्म-ज़्यादती, अत्याचार, शोषण व गौरक्षा के नाम पर जो अमानवीय व्यवहार व आतंक की घटनायें घट रही हैं उन मामलों में दलितों को भाजपा सरकार व ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘‘सहानुभूति‘‘ की ज़रूरत नहीं है, बल्कि दोषियों के खि़लाफ सख़्ती से क़ानूनी कार्रवाई करने व कराने की ज़रूरत है. बी.एस.पी. दलितों के उत्पीड़न के मामले में खासकर देश में कानून का राज चाहती है. देश के दलितों व गरीबों को मानवीय अधिकार दिये जाने की ज़रूरत है.


उन्हें उन पर होने वाले अत्याचारों पर सहानुभूति से ज्यादा कानूनी संरक्षण व इन्साफ दिये जाने की जरूरत है और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जि़म्मेदारी है कि वे राज्यों को इस सम्बन्ध में पत्र लिखकर सख्त निर्देंश जारी करें, परन्तु ऐसा होता हुआ बिल्कुल नज़र नहीं आ रहा है.


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस वास्तविकता से इन्कार नहीं कर सकते हैं कि जबसे केन्द्र में उनके नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी है तबसे देश भर में दलितों पर जुल्म-ज्यादती व अत्याचार की बर्बर व सनसनीखेज घटनायें काफी ज्यादा बढ़ी हैं और ख़ासकर राज्यों की भाजपा सरकारें इन मामलों पर पर्दा डालने का ही काम करती रही हैं. पीडि़त लोगों को इन्साफ दिलाने के लिये दोषी लोगों व ख़ासकर


मुख्य दोषी व षड्यंत्रकारी लोगों पर कानूनी कार्रवाई करना तो बहुत दूर की बात है. इन मामलों में ख़ासकर दलित स्कालर रोहित वेमुला की आत्महत्या व ऊना का दलित काण्ड ताज़ा उदाहरण है. जहाँ इन्साफ होता हुआ नज़र नहीं आ रहा है.


इतना ही नहीं बल्कि दलितों पर अत्याचार व शोषण होता रहा और प्रधानमंत्री खामोशी से सब कुछ देखते रहे, जबकि देश में सर्वसमाज के लोग इन मामलों पर काफी उद्वेलित हुये.


उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री अगर आज से दो वर्ष पहले इन अत्याचारों के खिलाफ बोलते व दोषियों को सजा सुनिश्चित करवाते तो शायद आज हालात इतने नहीं बिगड़ते कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ऐसी बयानबाज़ी करनी पड़ती. वास्तव में  उत्तर प्रदेश के साथ कुछ अन्य राज्यों में विधानसभा आमचुनाव के मद्देनजर दलितों का वोट हासिल करने के स्वार्थ में ही मजबूर होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कल यह बयान देना पडा़ है, जो कि लोगों को ड्रामेबाजी व पूरी तरह से घडि़याली आँसू ही लगते हैं. उन्हें चाहिये कि इन गम्भीर मामलों में केवल खानापूर्ति करने के बजाय ठोस कार्रवाई करना सुनिश्चित करायें.


मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में ‘‘नकली गौरक्षकों व असली गौरक्षकों‘‘ की भी बहस छेड़ी है तो उन्हें देश की आमजनता को बताना चाहिये कि गुजरात के ऊना दलित बर्बर काण्ड के पीछे गौरक्षक असली थे या नकली तथा उस घटना का मुख्य दोषी व षड्यंत्रकारी को अभी तक क्यों नहीं गिरफ्तार किया गया है?


बसपा मुखिया मायावती ने कहा कि इसी गौरक्षा के नाम पर गौरक्षकों द्वारा मुस्लिम समाज के लोगों की हत्या कर दी जाती है, उनकी महिलाओं के खिलाफ सरेआम बर्बर व्यवहार किया जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चिन्तामुक्त  होकर खामोश रहना पसन्द करते हैं. इसी ही गलत सोच का परिणाम है कि अब मुसलमानों के बाद दलितों को देश भर में गौरक्षा के नाम पर अत्याचार व आतंक का शिकार बनाया जा रहा है.


इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री बतायें कि इसे कौन रोकेगा? इस प्रकार के ज्वलन्त समस्याओं के मामले में केवल बयानबाजी करने से काम नहीं चलने वाला है बल्कि इसके लिये ठोस व सख्त कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है.

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